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८५ कायवाग्बुद्धिविषया ये मलः समवस्थिताः ।
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८ पातञ्ञठमहामाष्यचरकप्रतिसंस्कृतेः । मनोध।क्रायदोष्राणां हर््रऽहिपतये नमः | *
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।४ ङब्दानामनुशासनं विदधता पातञ्चले कुवैता वृत्ति राजमृगाङ्कपंज्ञकमपि व्यातन्वता वेधके |"
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५ तदुक्त चरके पतद्घलिना-.
! सेन्द्रियं चेतनं दभ्यं निरिन्दियमचेतनम् । ! "
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५ सूत्राणि योगश्ाह्चे वेयकराल्ञेः च वार्तिकानि ततः । कृत्वा पतज्ञलिपुनिः प्रचारयामास जगदिदं त्रातुम् ॥
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1. ब्रह्मस्युत्ररकरत तस्म वद्व्यास्ाय वधस |
ज्ञानश्चक्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ 2. नत्वा पतज्ञलिमूषिं वेदव्यासेन भाषिते | सं्िप्तस्पष्टबहथौ भाष्ये व्याख्या विधास्यते ॥ 3. श्रीपातज्ञरुभाष्यदुग्धजूपिर्विज्ञानरल्ञाकरो बेदव्यासयुनान्द्रब् द्धिखनितो योगीन्द्रपेयाम्तः |
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1. इत्ति श्रीगोविन्दभगवप्पूञ्यपादशिष्यस्य परमहसपरि्रास- काचायस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतो श्रीपातज्ञखयोगश्चास्त्रविवरणे प्रथमः पाद्ः। 2. (०7276 {€ 10110 ५17 -अआमिदयतद्क्षरमलयाद्य्टाध्याया छान्दोग्योपनिषत् । तस्याः संक्षेपतः अथजिज्ञासुभ्यः ऋलजुविवरणमस्पम्रन्थ- मदम।रभ्यत । (1270062 (0४1158५. _ , अथ “ आभ्यास्िकान् योगान् ` इयाद्यध्यात्मपटलस्य संक्षेपतो विवर्ण प्रस्तूयत । 270४510४ [)113117025प्१7६.
अथेयादिपतज्जल्योगशास्लविवरणमारभ्यते । १०६२५०८२. 0125 ४९४1९ ९72108.
31४
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(५) योगङ्चक्चेषु (अथ तच्वदशेनाभ्युपायो योगः ' इति सम्य ग्दशेनाभ्युपायत्वनेव योगोऽङ्गीक्रियते । धध८य ५४८ 59४ एतेन योगः प्रस्युक्तः (11--3)
2. सम्यग्द्शौनामभ्युपायो हि योगो वेदे विहितः) ‹श्रोततव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः: इति । "त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम् इयादिना च आसनादिकल्पनापुरस्सरं बहुपरपच्च योगविधानं शेत खतसे-
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पनिषदि दश्यते । लिङ्कानि च वेदिकानि योगविषयाणि सहखशः उपरभ्यन्ते, ‹ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् इति £ विद्यामेतां योगविधि च कतस्नम् ` इति चेवमादीनि । योगक्षाल्ञेऽपि ¢ अथ तत्त्वदकानाभ्युपायो योगः इति सम्यग्दशोनाभ्युपायतवेनैव योगोऽङ्गीक्रियते ॥
1. निराकरणंतु न साङ्ख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निदभ्रेयसमाधिगम्यत इति । श्रुतिर्हि वैदिकादासेकस्वविज्ञानाद्न्यन्नि- दभ्रेयससाधनं वारयति; (तमेव विदित्वा अतिभ्र्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय › इति । दैतिनो हि ते साङ्ख्या योगाश्च नासमैकस्वदर्धिनः । येन स्वंशेन न विरुध्यते तेतेष्टमेव साङ्ख्ययोगस्मरयोः सावकाशत्वम् । तद्यथा (असङ्गो हयं पुरुषः? इ्येवमादिश्रातपर्िद्धमेव पुरुषस्य विद्यद्धस्वं निशंणपुरंषनिरूपणेन साङ्ख्येरभ्युपगम्यते ¡ तथा योगैरपि (अथ परित्राद् विवणेवासा सुण्डोऽपरिग्रहः› इयेवमादिश्रुतिप्रसिद्धमव निवृत्तिनिषठत्वं भन्रञ्यादुपदेशेनादुगम्यते ॥
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1. नानेन योगक्चास्त्रस्य हैरण्यगभंपातज्ञलादेः सवथा प्रामाण्यं निरा- क्रियते, किन्तु जगदुपादानस्वतन्त्रप्रधानतद्धिकारमह दह ।रपच्छतन्मात्रगो चरं प्रामाण्यं नास्तीर्युच्यत । न वैतावतैषामप्रामाण्यं मवितुमहैति। यत्पराणि हि तानि. तच्राप्रामाण्येऽप्रामाण्यमरनुधीरन् । न चैतानि प्रधानादिसद्धाव- पराणि, किन्तु येोगस्वरूपतस्साधनतद्वान्तरफलविभूतितःपरम रुलकैवस्य- व्युल्पादनपराणि । तच किच्चिननिभित्तीकरत्य व्युत्पा्यमिति प्रधानं सविकारं निमित्तीकरृत, पुराणष्विब सगेप्रतिसगवंश मन्वन्तरवंशानु चरित तत्मतिषादन- परेषु, न तु तद्िवक्षितम् । अन्यपराद्पि चान्यनिमित्तं तत् प्रतीयमानम् अभ्युपेयेत यदि न मानान्तरेण विरुध्येत । अस्ति तु वेदान्तश्रुतिभिरस्य विरोध इत्युक्तम् । तस्मात् प्रमाणभूतादपि योगशाशान्न प्रधानादिसिद्धिः । अत एव योगक्चाखं उत्पादयिता आह स्म भगवान् वाषगण्यः--शुणानां परम्र रूप न दृष्टिपथमृच्छति । यत्त रीष्टपथप्राप्त तन्मायेव सुतुच्छकम्॥ इति । योगे व्युतिपिपाद्यिषतता निमित्तमात्रेणेह् गुणा उक्ताः; न तु भावतः, तेषामतास्िकतादियथेः
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1. बहुं हि योगशाख्ञाणां वेदेन सह सवादो दयते । उपनिषदुपा- यस्य च तच्त्वज्ञानस्य योगापेक्षास्ति। न जातु योगञ्चाखविहितं यमनियमादिष- दिरङ्गमुपायमन्तरङ्गं च धारणादिकमन्तरेण ओंपनिषदात्मतसव साक्षात्कार उदेतुम्ेति । तस्मादोपनिषदेन तन्तजानेन अपक्षणात् , सवादबाहुल्याश्च बेदेन, अष्टका दिष्मृतिवत् योगस्युतिः प्रमाणम् ॥
2. योगशाखे योगनिरूपणं _ अ्चताश्चतरोपरिनषदादयुदिष्टयोगपरपश्च-
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1. कश्च (कृताथ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्? इति पातञ्जरसूत्रम् । अनेन च प्रङृतिप्राकृतिकात्मकं जगत् सुक्तापेक्षया नष्ट तदितरापेक्षया विद्यमानमेतरेतति पुरुषविशेषापेक्षया तस्य अभावसद्भावो प्रति- पायते .। एतच्च तन्मिथ्यासेऽत्रकस्पते । पुरुषविशेषमपेक्ष्य एकस्यैव वस्तुनः सद्धावासद्भावयोः शुक्तिरूप्याद दशनात् । तत्र हि काचकाम ङादिदोषदूषितनेत्रः पुरुषः शुक्त रूष्यसद्भाव प्रतिप्यते । तदितरस्ु. ञयुक्ति-
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स्वरूपमेव जानन् तत्र रूप्याभावमवगच्छति। न हि पारमाथिकं घटादि पुरुष- विशेषं प्रति सद्भावासद्भावौ युगपत् प्राप्रोति । तस्मात् स्वरूपज्ञानपयेन्त- मनुवतेमानस्य तत उध्वेमप्रतिभासमानस्य प्रपञ्चस्य वेदान्तिनामिव साङ्ख्यादीनामपि अविक्षेषान्मिभ्यास्वं सिद्ध ॥ | अथापि कर्मान्न व्यवहरन्तीति चेत् , श्रोतुबद्धिसमाधानाथभिति चूमः। स खु प्रथमतः से मिथ्येप्युक्त कथमेतत् घटत इति व्याङुटितमनस्को भवेत्, तन्मा भूदिति सत्यत्वन्यचहार एव केवलम् । आस्मनानाव्वस्य जीवे्रभेदस्य च मुक्तावनभातस्वेनघ प्रपव्चव- न्मिथ्यातम्। यदि न्यवहारदक्ायाम् एक एवत्मेयभिधीयेत जवेश्धरव्यवस्था सुखदुःखादिष्यवस्था च प्रयाससमथेनीया स्यादियभिप्रायेणेव तन्नानाल- वणनम् । सक्तौ तु येदान्तिनामिव साङ्ख्यादौनामपि केवलात्मस्वरूपम्रति- भास एव सम्मत इति परमाथेतोऽद्वितीयरत्वमात्मनः सिद्धम् ॥ . ऽ॥॥258111011६-1¶ 2108719 207015--- ४ 2102४81014 एतए, 1610111 44115252,
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005 शध पगा अथवा सर्वं चेतनावत् । एवं हि आह; कंसकाः सर्प॑न्ति, शिरीषोऽयं स्वपिति, सुबर्चैखा आदित्यमनुपर्यैति, आस्कन्द कपिल्केत्युक्ते तृणमास्कन्दति, अयन्कान्तभयः सङ्क्रामति, ऋषिः पठति, श्रुणोति ग्रावाण इति । (81४६६, 17 113 €3{140211011 01 111८5८६ 5ऽ€ाा1†€116€5 185 7161111 00567९५ {118६ 2६ (2071211'5 ५९उऽदा1[ए0ा 04 दश्टा अ।त्पलाादा$ 210 77ठ.71171216 {1111९05 25 5€1111ला{ 15 9256 01 {116 0111050711$ 07 11९ 1111119 ०1 {€ 50प].1
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सवैस्येवेति । आस्माद्वैतदशेनेनेति भावः ॥ वेद्ान्तश्चाल्लमरखिक् बिरोकय शेषस्तु जगत आघारः । आया पञ्चाश्या बबन्ध परमाथसारमिदम् ॥ एतदेवाभिपरेय भगवान् शेष आह-- ‹ तीर्थ शपचगृहे वा नष्टस्मुतिरपि परियजन् देहम् । ज्ञानसमकालमुक्तः केवस्यं याति हतश्चोकः ॥
210 क्ेषोंऽपि खडङृतायापद्चाक्षीत्यामिदमाह-- हयमेधक्षतसहसाण्यथ कुरुते ब्रह्मघातरक्षाणि । परमाथोवेन्न पुण्येने च पैः स्परडयते तिमः ॥ 4. तदुक्तं परमाथंसोर शेषनगेन-- मृगतष्णायामुद्क,.. .....1
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आरण्य ) नतु साक्षात् श्चासनप्् 1--5872021581185911&19112-221201218 08152118. त
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पृञ्यान् पतञ्चलिन्यासशङ्करांल्लीन् गुरून् चमः । योगरा{स्रस्य वेदान्तशास््रस्यापि प्रवर्तकान् ॥
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| श्रीः ॥ ॥ प्रास्ताविकम् ॥
स्तुवे पतन्ञ डि व्यासं राङ्कुरं च मुनिन्नयम् | कत् सूत्रस्य भाष्यस्य क्रमादिवरणस्य च ॥
इदमिदनीम् इदम्प्रथमतया मुद्रयित्वा प्रकारापदवीमानीयते मद्राष- नगरस्थराजकीयप्राच्यपुस्तकागाराध्यक्षः श्रीपातन्नटयोगशाञ्च[सूत्रमाष्य | विवरणाभिषं अन्थरत्नम् ॥
अस्य च निभातारः श्रीमगवखादा इति महदिदं प्रमोदस्यानम् ॥ .
यद्यप्यत्र विवदेयुर्विमश्चकाभिमानिनः- ° विवरणस्यास्य प्रणेतारः श्रीभगवत्पादा वा अन्ये वा? इति । किम्त्र॒विशेषितेन, यत् एतदोयमूलग्रन्थयोः योगसूत्रतद्भाष्ययोः प्रणेतृविषरयेऽपि सम॑स्सयेव विप्रति. पर्तिवहूनां मप्रन्थकैकार्योविंमशंकानाम्--' किमयं सूत्रकृत् महामाप्यकर्तव पतन्नङिः १ उतान्य: १ इति, किमयं माध्यकृत् ब्रह्मसूत्रकृदेदव्याप्त एव ? उतान्यः इति च । ते यथामतिकौशङ बहूनुषटेखवु्िखन्ति च ॥
अत्र च इत्य प्रतिमाति--शब्दन्रह्मवित् मगवान् भर्तृहरिः स्वीये व।कंधपदीये ब्रह्मकण्ड--
^“ कायवागबुद्धिविषया ये मलाः समवस्थिताः । [ज क । 9 (५ चिकितपालक्षणाध्यात्मश्ञस्तेषां विदयुद्धयः ॥"" इति पचेन यत् शचत्रयै करणत्रयगतमठ्त्रयवि्ोधकम् अवेद्यति, तत् दा्ञत्रयमपि भगवान् पतञ्जलिः प्रणिनायेति प्रतिपादयति प्राचीनपारम्पर्यागतं परिद्धं प्मिदम्--
‹ योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मरं शरीरस्य च वैकेन । योऽपाकयेत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्रटिं प्राज्ञछिशनतोऽस्मि ॥' इति ।
ॐअ
पातञ्ञल्येगमुत्रहत्तिकृत् भोजदेवे ऽपि-- ^“ वाक्चेतावपुषां मः फणसूृतां मत्व येनोद्रतः" इति पतज्जटिप्ुपमार्नीकृ्य स्वस्य प्रन्यत्रयेण मलत्रयोद्धारकलस्रमाचष्ट ]
तच्च रात्रय पातज्नलम् , मह् भाष्यम् , चरकप्रतिसस्कृतं च इति चरकतन्त्रटकाकृत् चक्रपाणिदत्त अवेदयति--
“" पातज्ञरमहामाष्यचरकपरतितस्छृतेः । प ५५ च [१ „स् [९ । 1) मनोवाद्षायदषाणां ह्रेऽदहिपतये ममः ॥' इति ॥
अत्र॒ च भगवदृत्रेयरिष्येण अश्चि्ररोन मह्िंणा प्रणीतमेव वैधकतन्त्र विीभूतं चरकनाश्ना पतन्नलिना प्रतिपस्छृतघ्वात् चरकप्रतिततस्कृतपदेन ग्यपदिहयते ˆ । ` निरुपपदेन पातज्ञ रमिति पदेन च योगसूत्रमुच्यते । अत एव योगसूत्रवृत्तौ भोजः-- ध
«५ श॒ब्दानामनु्षासनं विदधता पातञ्नरे कुर्वता वृत्ति राजमृगाङ्कसंज्ञकमपि ग्यातन्वद्ना वैके ॥"
इति पातक्चल्पदेन निरुपपदेन योगसूत्र निरदिक्षत् ॥
योगे सूत्रस्य, व्याकरणे भाष्यस्य, वैद्यके वार्तिकस्य च कर्मृत्ात् पतज्ञठिः सूत्रकृत् , भाष्यकृत् , वर्तिकञच इति पतक्नलिचसिति रामभद्र- दीक्षितः प्रतिपादयति--
८८ सूत्राणि योगशास्त्र वैदयकशास््रे च वार्तिंकानि ततः । कृत्वा पतञ्नलिठुनिः प्रचारयामास जगदिदं त्रातुम् ॥' इति ।
तत्र च पथे ततः इति पदं महामाभ्यप्रणयनानन्तरम् हद्यथैकम् । लघुमञ्जूप्रायां “तदुक्तं चरके पतञ्चछिना'' इति पुनःपुनः ` चरकवक्यानि उदाहरन् नागेशमदृ: चरकतन्त्र॑पतञ्जलिप्रणीतमवनोधयति । चरकनामक- पतन्नटिकृतस्य प्रन्थस्यापि चरकमिति भ्यपदेशः । कतृना्ना भ्रन्धम्यपदेशश्च बहुरं दृर॑यते ॥
तदित्थं महामाष्यकर्तैव श्रीरोषावतारभूतः पतञ्जलिः योगसूत्रकर्तेति निर्णये भवितुमदति सदहदयानाम् ॥
एवं ब्रह्मसूत्रकतैव च वेदम्याप्तः योगसूत्रमाप्यकर्तेति नि्णयेऽपि समस्ति प्रमाणम् । यतः-
351.
^ ब्रहमसुत्रकृते तस्मे वेदव्यासाय वेते । ज्ञानशक्त्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ ” इति भामल्याम् , ५ नसा पतन्नठिपृपि वेदव्यासेन भाषित । सक्षिपतस्पष्टवहथा भाष्ये व्याख्या विधास्यत्॥ "” इति योगभाष्यटीकायां तखविारथां च, ब्रह्मसूत्रकृतं योगभाष्यक्ृतं च वेदन्यास- शाब्देन व्यवहरन् श्रीवाचस्पतिमिश्रः ब्रह्मसूत्रकृत् श्रीमनारायणावतारः वेदव्यास रव योगभध्य्कत् इस्यवेदयति ॥
«५ श्रीपातञ्नलभाष्यदुगधजठपिर्विज्ञानरलाकरः
वेदव्यासमुनीन््रबुद्धिखनितो योगीन्द्रपेयाृतः । ” इति विज्ञानमिक्ुप्रणीतयोगवार्तिकस्यं पवमपि अघुमभिग्रायं परिोषयति ॥
ठघुमञ्जूषायाः कलाल्यटीकाकृत् पायगुण्डै्नायभदः (काङीभुदित- पुस्तके (३२१) पटे) “योगसूत्र भाध्ये वेदान्तसुत्रकुदुक्तत्वात् `” इति वाक्येन स्पष्टमेव योगभाष्यकर्ती (मेव ब्रह्मतूत्रकर्तरिमवगणमयति ॥
इत्यमेव ॒विवरणकतौऽपि श्रीपरमेश्वराव्तारभूतः भगवसाद एवेति निर्णेतुमस््मवकाशः । यतः प्रस्थानत्रयमप्यप्रन्धेन्विव अत्रापि प्रतिपादम् प्रन्थत्तमाप्तौ “इतिं श्रीगोविन्दभगव्पूञ्यपादशिप्यस्य परमहसपरि व्राजकाचायेस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतो श्रीपातज्ञल्योगशाक्च(सूत्रभाध्य) विवरणे प्रथमः पादः ` इ्यादि स्फुटं विटिखितमादर्शकोरे ॥
यपि योगपूत्रतद्धाष्ययोः म्रन्थान्तरेषु पतन्नल्विदव्यास्तकर्वकतष- व्यवह्(रवत् अत्र विवरणे भगवरत्पादकतृकखन्यवहार; इयदवधि नोपरकम्यते, तथाऽपि प्रन्यक्तमप्तै भगवत्पादकृतव्वनिर्देश एव परमे प्रमाणे यावद्रधकानुपलम्भं प्रमाणानां स्वतःप्रामाण्यवादिनामल्म. |
किंञ्च, “भमिस्येतदक्षरमिलयायषाध्यायी छन्दोग्योपनिषत् । तस्याः सक्षपताञ्थजज्ञासुभ्यः ऋजुविवरणमल्पग्रन्थमिदमारभ्यते इति छन्दोग्योपनिषद्राष्योपक्रम इव, “ अथ 'आध्यासिकान् योगान् ? इत्याचध्या- त्मपटरस्य सेक्षेपत। विवरणं प्रस्तूयते ” इति अआपस्तम्बधर्मसूतरीयप्रथम- प्रशना्टमपटलतिवरणोपक्रम इव च, अत्रपि 'अथेलयादिपातज्रटयोगङ्चाञ्च- विवरणमारम्यतेः इति प्रन्यारम्भशेठीसाटशये, प्रन्धस्य विवरणनाम-
ॐ311
साजाव्य, त्रह्सूत्रमाप्ये “' स्मरन्ति च '' (४-१-१०) इत्र ५ अत एवं पश्यकादीनामासनविरेषाणापरुपदेशो योगाने ” इति, “ प्रदीपवदावेशस्तथा हि दरयति” (४-४-१५) इयत्र “एषैव च योगशाक्चेषु योगिनामनेकश्चरीरयोगप्रक्रिया'” इति, “' एतेन योगः प्रसयुक्तः" (२-१-२३) इयत्र “ योगज्ञाञ्चेऽपि अथ तत्वदरेनाभ्युपाये योगः ईति सम्यग्दश्शना- स्युप।यत्वेनेव योगोऽङ्गीक्रियतेः इति च बह स्थरेष्विव अत्रापि ध्योगशाविवरणमारभ्यतेः इति येोगराज्लपदेनैव योगप्रन्यनिर्देशः, प्रमेयप्रतिपादनरैरीमाम्ये चेद्ादिकं विमृश्यमनं भगवत्पादध्रणीतव्वं विवरणग्रन्थस्य अभ्यूहितु कियन्तमिव अवकारां ददाति । विमरकामिमानिनः इयतैव च तुष्येरन् ॥
अत्रेयं शङ्का केपराश्चित् उदियात्- त्रह्मसूत्रकृत् वेदभ्यास एव योग- भाष्यकत, ब्रहमपूत्रमाष्यकृत् भगवत्पाद एव च योगमाष्यविवरणकर्ती इ्यभ्युप- गमो न युज्यते, वेदान्तदद्ेने “एतेन योगः प्रल्युक्तः” इति योगदशेन- निराकरणात्, अप्रमाणलेनाम्युपगतस्य योगसूत्रस्य निराकरवृम्यामरेव वेदग्यास्- भगव्पाद्।म्यां माष्यतद्विवरणत्रणयनायेगात्--इति ॥
तस्या इत्थं समाधाने प्रतिभाति--योगदशनं न तु सवया निराकृतम् , अग्रमाणलवेनाभ्युपगते च, ब्रह्मसूत्रतद्भाष्यकृदृम्याम् । यतः योगब्रलुक््यधिकरण एव वेदभ्यापहदयव्रिद मगव्प्पादाः-(सम्थग्दरनाभ्युपायो हि योगो वेदे विहितः- “श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (ब्ह.उप.२-४-५-)8ति । ^ ्रिर्त्रतं स्थाप्य समं शरीरम्" (खेताश्च. २-८-) इत्यादिना च आसनादिकल्पना- पुरस्सरं वहप्रपञ्च योगविधानं शेताश्चतरोपनिषदि दर्ये । लिङ्गानि च वैदिकानि योगत्रिषयाणि सहर उपकम्यन्ते- “नतां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्दरियधार- णाम्!" (का.उ.२-६.११) इति, “ विद्यामेतां योगविधिं च कृस्स्नम्?” इति चैवमादीनि । योगशाज्ञेऽपि--' “अथ तत्वदशेनाभ्युपायो योगः" इति सम्यग्दज्चनाभ्युपायलेनैव योगोऽङ्गीकरियते' इत्यादिना वाक्येन योगम् ओपनिषद- सम्यग्ञानसाधनम् अभ्युपागमन् । ननिराकरणं तु न साङ्ख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निःप्रयप्तमाधिगम्यते इति । श्रुतिर्हि वेदिकादाघैकतविज्ञानादन्य- ननिःश्रेयससाधनं व।रयति--““ तमेव विदित्वा अति पर्युभेति नान्यः पन्था
विचतेऽयनाय" (धर. उ.२.८)१ति, रेतिनो हि ते प्ताङ्ख्या योगाश्च नक्तैकल-
द्वन; ध्येन वंशेन न विरुध्यते तेनेष्टमेव साङ्स्ययोगस्मृव्योः सावकारात्वम्
भ.
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तथया--““असंगो ह्ययं पुरषः" ब,उ. ४-२-१६) इ्येवमादिश्रुतिप्रतिद्धमेव पुरृष्य विश्ुद्धवं निशुणपुरुषनिख्पणेन साङ्ख्यैरम्युपगम्यते । तथा च योगेरपि-- “अथ प्रि्ाद् विवभैवाा मुण्ड ऽपरिग्रहुः" (जाबाल. ३-५} इस्येवमादिश्रतिप्रसिद्धमेषव निदृत्तिनिषटव्वे प्रतञ्यायुपदेशनानुगम्यते' इ्यादिना च वाक्येन हेयोपादेयधिषयरविभागेन योगद दीनस्य ग्राह्यत्वं व्यवस्थापयामघुः ॥
मगवदादह्टदयवित् भामतीकरद पि तात्रैवाधिकरणे- नानेन योगश्ाक्च- स्य हैरण्यगर्मपातज्ञलदेः सर्वथा प्रामाण्ये निराक्रियते । रि तु, जगदुपादानस- तन्त्रध्रधानतद्विकारमहदहंकारपश्चतन्मात्रगेचरं प्रामाण्यं नास्तीदयुच्यते | न चैतावता रएषामप्रामाण्यं भवितुमर्हति । यदयराणि हि तानि, तत्राप्रामाण्ये अप्रामाण्यमदनुवीरन् । न चैतानि प्रधानादिसद्भध्रपराणि | किं तु, योगस्वूप- तत्साधन - तदवान्तरफलटविभूति - तप्परमफलेकवल्यन्युपादनपराणि । तच किञ्चित् निमित्तीकृत्य ब्युत्पा्यमिति प्रधानं सविकारं निमित्तीकृतम् । पुरणेष्िव स्गप्रतित्तमौव॑रामन्वन्तरवनानुचरितं तस्रतिपादनपेरेषु । न तु तद्विवक्षितम् । अन्यपरादपि चान्यनिमित्तं तत् प्रतीयमानम् अभ्युपेयेत, यदि न मानान्तरेण विरुष्येत । अत्ति हि वेदान्तश्रुतिभिरस्य विरोध इष्युक्तम् | तस्मात् प्रमा भूतादपि योगा्रात् न प्रधानादिस्िद्धिः.। अत एव योगशतं ब्युत्पाद्यिता आह् स्म भगवान् वाप्गण्यः--
“ गुणानां परमं सूपं न दृष्िपथगृच्छति । यत्त द्टिपथं प्राप तन्मयेव सुतुच्छकम् ॥' इति ।
व
गं॑ब्युत्िपाद्यिषता निमित्तमत्रिण इह गुणा उक्ताः, न तु भावतः), तेषामताखिकत्वात् इत्यथः । अलोकतिद्धानामपि प्रधानादीनाम् अनादिपूतपक्षन्यायामसिसरे्नितनाम् अनुवा्त्मुपपननम् › ८^‹ उपनिषटुपायस्य च तच्न्ञानस्य योगपिक्ना अस्ति । न नातु योगराच्विहितं यमनियमादि- बहिरङ्कुपायमपहाय अन्तरत च धारणादिकमन्तरेण ओपनिषदासतखसाक्षात्कार उदेतुम्हेति ।? “यदि प्रधानादिसत्तापरं योगशा भवेत्, भवेत् प्रलक्षवदान्तश्रुतिविरोधेनप्रमाणम् । तथा च तद्विहितेष्र यमादिष्वप्यनाश्च।स स्यात् । तस्मात् न प्रधानादिपरः तव् । किं तु तनिमित्तीकृल्य योगव्युत्पादनपरमिष्युक्तम् । न॒ चाविषये अप्रामाण्यं विषयेऽपि प्रामाण्य मुपहन्ति । न हि चक्षू रसादवरप्रमाणे स्पेऽप्यप्रमाणं भवितुमर्हति ।
तस्मात् वेदान्तश्रुतिविरोधात् प्रधानादिरस्याविषयः न प्रामाण्यमिति £.
अप
परमाः ।' भ्न साङ्ख्यज्ञानेन वेदनिरपक्षणेति- प्रधानादि- वरिषयेणेल्ेः । द्वैतिनो दहि ते साङ्ख्या योगाश्च--ये प्रधानादिपरतया तत् रान्लं व्याचक्षते इव्यधः ।; इव्यादिग्रन्येन मगवत्पादारायेद्वा्नेन योगज्ञाखस्य प्रामाण्यं प्रसतिष्टिपत् । प्रधानादिपरतया साङ््ययोगरान्ञ व्थाचक्षाणानमित्र परमनाप्ततम् , न योगादिशाल्ञप्रामाण्यम्, इति च
स्फुटी चकर ॥
ततैव परिकेऽपि ““ योगराल्ञे योगनिूपण श्रेता्रतरोपनिषद।युपदिष्ट- योगप्रपश्चनरूपम् ” ह्युक्तम् ॥
इत्थमोपनिषदाप्मतच्वज्ञानं प्रति शान्नान्तरपेक्षया विशिष्योपकारकताति- शयसद्धाबदेव च हेतोः वेदान्तदस्चनप्रवतैको भगवान् बेदभ्याप्तः तद्भाप्यकरत् भगत्रत्पादश्च उभयेऽपि योगमाष्य तद्विवरणे च चक्रतुरिति षद्दं विश्वसिमः ॥
न केवर भगवान् वेदव्यासो मगवत्पादश्च योगभाष्यतद्िवरणकतरौ ओपनिषदात्पद्वैतदरनावलम्बिनौ, योगसुत्रक्ृत् भगवान् पतन्नछ्िरिपि हि तथेव । यतः तेन “क्तार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणतात् "' (यो. सू. २-२२) इति सूत्रे जगन्मिथ्यालवं व्यवहूतम् । अस्य च सूत्रस्य जगन्मिथ्याल्वामिप्रायकतव प्रदर्दितं श्रीमाधवाचर्यैः सूतसंहितातासयदीपिकायां यज्ञवैभवखण्डाष्टमप्यायनिवरणावसर--' यथपि ग्यवह्।रदशायां प्रकृति- प्राकृतलक्षणप्रपञ्चस्य सल्यत्वम् आत्मनानाघ्े च व्यवहरन्ति (साङ्ख्यपातन्नलदयः) तथाऽपि कैबल्यदशा्ां स्वरूपप्रकाङष्यतिरेकेण तस्य सवेस्यानवभाने वर्णयन्ति । आत्मयाधात्मयज्ञानरक्षणायाः प्रकृतिपुर्षविवेकद्यातेहिं केल्यम् । तथािध्ञानेत्तरकाठं प्रकृतिप्रङृताथौलसकं जगत् सवथाऽनवमातं चेत् तदस्ति कथं निश्वीयेत ? ्ेयपिद्धेः ज्ञानाधीनत्वात् । अतः आप्यायास्य- ज्ञानेन निवतितमेव तत् ¡1 तस्मात् प्रपञ्चस्यानवभातस्य ज्ञाननिवर््त्ेन निथ्याखपवरयमम्युपगन्तम्यम् । ज्ञाननिवरयानां क्तिख्प्यादीनां मिध्यात्व- दरानात् ॥
विच, “कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष् तदन्यसाधारणलतात् इति प।तन्चठे सूत्रम् । अनेन च प्रकृतिप्राकृतिक।सकं जगत् सुक्तपिक्षया नष्टं तदितरपेक्षया विधमानमेवेति, पुरुषविरोषपक्षया = तस्यामवसद्भाव प्रतिपायेते । एतच्च तन्मिथ्य।तेऽवकल्पते । पुरुषविशेषभपेक्ष्य एकस्थव
१. 9,०१।
वस्तुनः सद्धावासद्धावयोः शुक्तिरूष्यादौ दशनात् । तत्र हि काचकामखादि- दोषदूषितने्तः पुरुषः क्तौ द्प्यसद्धाव प्रतिपद्यते । तदितरस्तु शुक्तिस्व- रूपमेव जानन् तत्र दप्याभावमवगच्छति । न हि पारमार्थिकं घटादि पुरूषविरोषरं प्रति सद्धावाप्तद्वावौ युगपत् प्रपोति । तसमात् स्वरूपन्ञानपर्थन्त- मनुवतमानस्य तत॒ ऊध्वमप्रतिभासमानस्य प्रपश्चस्य वेदान्तिनामिव साङ््यादौनामपि अविशेषात् मिथ्यात्वे सिद्धम् । अथापि कसमात् न व्यवहरन्तीति चेव्--षरेतुवद्धिसमाधाना्मिति ब्रूमः । स खलु प्रथमत एव सवं॑मिश्येयुक्ते, कथमेतत् घटत इति. व्याङ्ुहितमनस्को भवेत् › तन्मा भूदिति सव्यतन्यवहर एव केवलम् । आलनानाच्वस्य जीवेश्वरभेदस्य च मुक्तावनव- भातस्वेनैव प्रपञ्चवन्मिथ्या्वम् | यदि भ्यवह।प्दशायामेक एव॒ अन्मिल्य- भिधीयेत, तदा तत्तदुपाधिपरिकल्पनेन जीवेशटरम्यवस्या सुखद ;खादि- व्यवस्था च प्रयास्तसमर्थनीया स्यदिव्यमिप्रयेणेव तन्नानात्ववणैनम् । मुक्तौ तु वेदान्तिनामिव सांस्यादीनामपि केवरात्मस्वरूपप्रतिमास एव संमत इति परमार्थतोऽद्वितीयलगात्मनः सिद्धम्? इति ॥
यपि पातज्ञलपुत्े (नष्टम्! इव्यत्र नागरोऽदरनम् इवयर्थो वणयि शक्यते, व्याख्यातं च तथा व्याद्यातृमिः, तथाऽपि मानाधीनघलान्मेयस्तिदधेः पुक्तदृष्टवा ददौनगोचरस्य प्रपञ्चस्यासद्धाव पएवेदयत्र॒विवादायेगात् नडः अदरानं वाऽ्तु, निदृत्तिग्रीऽस्तु, उभयथाऽपि फलमविशिष्टमिति बोध्यम् ॥
एवं महामष्येऽपि पतन्चटिप्रणीते तृतीयाध्यायप्रथमपादप्रथमाह्िके “धातोः करमेणः समानकतृकादिच्छायां बा" इति पाणिनिसतरविवरणाबसेरे-- ““स्वैस्य वा चेतनाषखात् (धा्िकम) अथवा सर्वं चेतनावत् । एवै हि आह- क॑सकाः सर्पन्ति, रिरीषोऽये स्वपिति, सुवर्चखा आदिव्यमनुपर्येति, आस्कन्द कपिलकेद्युक्ते तृणमास्कन्दति, अयस्कान्तमयस्सक्रामति, ऋषिः पटति--भृणोत ग्रावाणः इतिः इत्युक्तम् । तत्र केयटन विदृतम्- ““सुर्वस्य वेति, आग्मदवितदयनेनेति मावः । ऋषिरिति वेदः । सप्रमावानां चेतन्यं प्रतिपादयतीयथैः" इति ॥
एवश्च आपपद्वितं महाभाष्ये स्पुटीङृतम् । एवं तत्रैव स्थलान्तरेष्वपि आसद्वितमाविष्कृतं, विस्तरमिया उपरम्यते ॥
परमाथसारामिवायाम् अयपश्चाशीत्यामपि पतन्नलिना = अद्रैतदरसनं स्फुर्टीकृतम् ॥
६,९५.५] परमार्थसाराभिधश्च म्रन्थः पतन्नटिष्वरूपेणावतीर्गादिरोषकृत इति तत्रेव भ्रन्ये अन्तिमश्चेके व्यक्तम्- - ^“ वेदान्तसा।क्षमखिरं विलोक्य शेषस्तु जगत आधारः । आयाप्राशरीत्या बबन्ध परमार्थसारमिदम् ॥' इति ॥ तत्र च- "८ स॒त्यमिवे जगदसत्यं मूटग्रकृतरिदं कृतं येन । त प्रणिपत्येपेनद्रं वक्ष्ये परमा्थसारमिदम् ॥'” इति उपक्रमे एव॒ जगन्मिथ्या प्रतिज्ञातम् ॥ «५ परृगतृष्णायाघुदकं शुक्तौ रजतं भुजङ्गमो र्ञवाम् । तेमिरिकचन्दरयुगवत् अन्तं निखिरं जगद्रूषम् ॥ " इति सदृष्टान्तम् उपपादितं च ॥ ५८ यद्दधिनक्र एको विभाति सरिकिशयेषु सर्वे§ । तद्वत् पकरोपाधिष्ववस्थिता भाति परमात्मा ॥'” इति च आसद्वितमुपवणितम् ॥ परमायर्पत्रहमप्रातिमाग॑मूतसम्यश्ानसाधनीमूतो योग इति चोक्तं तत्रेव-- ^ प्रमाथेमारगू्ाषनमारस्याप्राप्य योगमपि नाम । सुरठोकमोगभोगी सुदितमना मोदते सुचिरम् ॥' इति ॥ जावन्मुक्तिविवेके च विधारण्यश्रीचरणेः परमायस्तारान्तगीतर्डेकदवयं शेषकृतविनानूदितम--““एतदेवामिप्रेय भगवान् रेष आह-- ५ तुर्यै श्वपचगृहे वा नष्टस्मृतिरपि परियजन् देदम् । ्ञानसमकालपुक्तः कैवल्यं याति इतथोकः ॥ ” इति ॥ डषोऽपि खकृताययौपश्चारीलयामिदमाह-- ट्यमेधशतसदस्ाण्यथ इस्ते ्रह्यषतरक्षाणि । परमाभैविन्न पुण्ये च पपिः स्पृदयते. विमरः ॥ ” इति च ॥ ८४ तदुक्तं परमाधैसोर शेषनागेन ` इत्यादिना प्रन्थेन परमाथत पदे पदे प्रमाणीकसेति श्धुमञ्जूषायां मद्टनगेराः । “ परमथंसारत्रिवरणे प्रपश्चितम- स्मामिः ' इति परमा्साख्या्यौनमपि स्वेन कृते ब्रवीति । मगवयतन्न॑ठि-
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परमभक्तस्य नागेशमद्स्य "नागेश" इति तदीयं नामेव वहतः पतङ्गटि- प्रणीतव्वदिव परमा्प्तारम्रन्ये परमस्समादरः । कलास्यटीकाक्ृदपि परमाध- सारकतीरं पतञ्ञलिमेव स्पष्टमाचचक्षे ॥
एवं च पतञ्ञङिव्यासशङ्कराख्य रशोषदहरिहरावतारभूते महामहिमश।लि मुनित्रयमपि ओपनिषदाद्रिततत्वपरिनिष्ठितम् एकाभिप्रायम् एकन अदरैतासानु- मवसाधनीभूतयोगविषये सूत्रतद्भाष्यतद्विवरणकतरंवेन योगमन्वमूत् इति संशील्यतां सहृदयानां महदिदं प्रमोदस्थानम् इव्यलमियता ॥
अस्थ च योगदाज्ञस्य प्रथमे प्रबतको हिरण्यगभः | ५५ हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः "”
इति योगिया्ञवल्क्यस्मरणाव् । पतञ्जञछिः तदनुसारेण परदचात् यौगश्चा्स्य प्रवर्तकः । अत ए “ अथ योगानुशासनम् ' इति सूत्रयामास । रिष्टस्य हि शासनम् अनुरासनम् । अत एव माधवाचायौः प्रोचुः-- “ननु हिरण्यगर्भ योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः इति याज्ञवस्क्यस्मृतेः, पतज्ञकिः केयं योगस्य शासितेति चेत्-- अद्धा । अत एव तेत्र तत्र पुराणादौ योगस्य विप्रकीरणतया वििष्य दुप्री्याथैत्वे मन्यमानेन भगत्रता दयाधिन्धुना फणिपतिना सारं सन्निषृष्चुणा अनुरासनमार्धम्, न तु पक्षात् शासनम् ।' इति सर्वदर्यनंग्रहान्तर्मतपातन्नल्दर्शनसंप्रहे ॥
^“ पद्युरसामन्नस्यात् ” (२-२-२७) इति ्रहमसूत्रमाष्यगते साङ्हययोग- व्यपाश्रयाः! इति पद् व्याचक्षाणेन भामतीकृता स्सांए्ययोगन्यपाश्रयाः' हिरण्यग्- पतक्षलिप्रश्तयः, इव्युक्तम् ॥
शेवाधगमेष्वेपि चर्याक्रियायोगज्ञाननिरूपकपाद चतुष्टयवधु योगपद योगस्वरूपं सविस्तरमुक्तम् । पुराणेतिहासेष्वपि च प्रपश्चितम् ॥
इ६ च योगराच्ं चिकिताराललवत् चतुब्यूहम् । यथा हि चिक्रिरसा- रान रोगः, रोगहेुः, आरोग्य, मेषञ्य, इति चतुन्यूहव्युत्पादनपरं, तद्वदेव इदमपि ' भवरोगचिकिःताशाक्चरूपं योगराच्रं, हेयः, देयदेतुः, हने, हानेप्राय इति चतुरवयूहव्युत्पादकम् । दुःखप्रचुरः संसारो हेयः, तस्य अत्रिधानिमित्तः ्रषटद्यसंयोगो हेतः, विवेकल्यतिरविष्ठवा हानोपायः, विवेकल्यातो च स्यां अविधानिवृत्तिः, तनिदृत्तौ आलन्तिको द्रषृददयसंयोगोपसमो हानम्, तदेव च कैवल्यम् ॥
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तदिदं योगशा समाधिप्ताधनविभूतिकैवल्याद्यपाद चतुष्टयविशिष्टम् । तत्र॒ प्रथमे पादे (५१) एकपश्चारात्सूत्रोपेते प्राधान्येन प्माधि- प्रतिपादनात् समापिपादाभिये, योगोदेशः, तक्षणम्, चित्तवृत्तिमेदाः, तच्निरोधोपायमूताभ्यापवेराग्ये, चित्तस्थिल्युपायाः केचन, सम्पर्ञाता- सम्परज्ञाताभिधो द्विविषो योगः सोपायः सफलः सावान्तरभेदश्च, देशरस्य स्वरूपप्रमाणप्रमाववाचकरोपाक्षनतत्फखानि च, इत्यादिकं प्रत्यपादि ॥
दितीये (५५) पश्वपश्चराप्ूत्रमण्डिते केवल्यपाधनप्म्यन्दरनसाधन- योगसाधनानां प्राधान्येन प्रतिपादनात् साधनपादमिधे, ङ्शतनकररणदवाय योगमाधनीमूतः क्रियायोगः, शकरमविपाक्राः; तेषां हेयसप्रमोजकं दुःखरूपं, देयतद्धतुमाक्षतद्धेतवः चतारो व्यूहाः; यों प्रति हिरङ्गसाधनीमूतं यमादिपच्चकं सावान्तरफठम् , इष्यादिकं प्रल्यपादि ॥
तृतीये (५५) पञ्चपश्चाशतसुत्रारङ्कृते योगसाधनानुषठानप्रृत्तस्य आनुपरङ्िकतरिमूतेः प्राधान्येन प्रतिपादनात् व्रिभूतिपादाभिपे, धारणादित्रितयं योगं प्रति अन्तरङ्कपधनीभुते सेयमस्ञ, संयमस्य रक्ष्याः परिणाममेदाः, संयमपताघ्याः श्रद्धदवारा कैवल्यफलकयोगपरतरृ्तिदेतवः अतीतानागतज्ञान- सुवनज्ञानकायब्यूहज्नानादिषपाः विभूतयः, इन्द्रियजयादिषरूपाः साक्षा- द्योगाङ्गमूताः सिद्धयः, ग्रोगफलभूता तारक्रपंहितविवेकज्ञनपिद्धिः, इल्यादिकं भ्रलपादि ॥
चतुर्थे (३४) चतुर्जिश्सूत्रमूषिते सकल्योगेश्वर्यम्यो विरतस्य सर्वे पषहारद्ररेण कैवल्यस्य प्राधान्येन प्रतिपादनात् केवल्यपादामिपे, दिविध केवट्यस्वरूष, कैवस्यभागीयं चित्त, पररोकरः, परलोकगामी क्षणिक्र- विज्ञानातिरिक्ताःपा चित्तविक्रारदुखादिमोक्ताः पर्ममेधाख्यसमाधिः, प्रापङ्किकं चान्यत् इयादिकं प्र्यपादि ॥
एवं पाद चतुष्टयवता(१९५)परञ्चनवव्यप्रिंकशतपतूत्रयुजा योगसूत्रेण सूचितं महान्तं प्रमेयरारिं दृदयहारिण्या श्रोत्रपुटपेयया दौल्या विव्रृण्वतः वेदन्याप्त- भाष्यस्य परमगम्भीरस्य।नुख्पं प्रसनगम्भीरमिदं विवरणं विरोषतो माभ्याश्चय- मभिभ्य्ञयत् परमोपकरारकं योगतिजिज्गासूनाम् । कतृगारात् ` विषयविवेचन- रोरीरामणीयकाच पठनमत्रेण हृदयात्रजकं नातीव विशिष्य वक्तव्यतामावहति ॥
9 ५.७१
अत्र च ग्रन्थे अनितरसताधारण्येन, म्रन्यान्तरेष्वचर्चितामिः वहीमि- युक्तिभिः ईश्वरस्थापनं सविरोषम।रचितम् । निरीश्चरादिभिः प्रतिपक्षः प्रदर्दिताश्च बहुषो युक्तयः अन्य निरस्ताः ॥
अत्र च उदाहृताः प्राचीनग्रन्थास्विमे-- १. दसोपरनिषदः २. भगवद्रीता ३. महामारते मोक्षधमपतै ४. विष्णुपहल्लनामस्तोत्रम् ५. मनुस्मृतिः ६, गौतमधमसूत्रम् ७, पाणिनिसूत्रम् ८. महाभाष्यम् ९. शाबरभाष्यम् १०. छे।कवर्तिकम् इदय(दयः ॥
व्यापतभाष्यस्य प्राचीनमपि व्या्यानं विवरणे कचित् नामनिर्देशे विना ^ अन्येषां व्याष्यानम् › इति अनूदितम् ¦! तेन विवरणात् प्रागपि कानिचित् भाष्यन्या्यानानि आसन् इति ज्ञायते । पश्चाच्च १. वाच- स्पतिमिश्चप्रणीता तच्विारदीनाप्नी माष्यटीका २, त्िज्ञानभि्षुप्रणीतें योगवा्तिकापराभिधं मभ्यव्याल्यानम् इद्यपर् भ्याष्याद्रये भाष्यस्य मुद्रितमस्ि ॥
योगसूत्रोपरि बहथः टौकाः सन्ति मुद्धिताः--१. भोजदेवकृता राज- मर्तण्डाभिधा वृत्तिः २. विज्ञानभिक्षुशिष्यभावागणेशकृता योगतूत्रदी पिका ३. तदनुसारिणी नागोजिभद्रीया वृत्तिः । २. ३. उभयमपीदं विज्ञानमिक्षु- मागौनुसारि । ४. श्रीरामानन्दयतिकृता मणिप्रमाद्या वृत्तिः ५. योग. सिद्धान्तचन्दिका ६. सूत्राथबोधिनी, इति श्रीनारायणतीर्थविरचितटीकाद्यम् ७. योगुधाकरो नाम श्रीसदारिषन्रह्मन्दकृता योगसूत्रवृत्तिः इव्याधाः ॥
तदिदं पतञ्जल्योगसत्रमाप्यविवरणम् इदंप्रथमतया सुद्रणपदवी- मरोपितं मद्रासूनगरस्थराजकीयप्राच्यपुस्तकागारष्यक्षैः । अस्य च मातृका एकेव पुस्तकागारस्या संञ्लोधनाय समासादिता, नान्यत् पुस्तकं अन्वेषणेऽपि लन्धम् । तत्र च आदरीकोे टेखकप्रमादाद्रा, टेखकेन ठेखनाय निरीक्षि- तस्य प्राचीनमूल्पुस्तकस्य सम्बन्धिनां बहूनां पुटानाम् अधरोत्तरविपर्यासाद्रा, यतःकुतश्चित् अनिवेचनीयात् हेतोः आदित आरम्य आजन्तं बिंशाति- सङ््यकरषु स्थटेषु सान्तव्येन तिडिवितान् मिथोऽनन्वितावयवान् अत एव दुर्वोधाथान् प्रन्थभागान् निरीक्ष्य कथमिदं ` सुदा, सुद्वितेऽपि निष्फलमेव मवेत् इति चिन्ताभ्याकुलितमानसानामस्माकं दुैचेन महता प्रयासेन वहुपुट- व्यवधानतो विरक्तानां विप्रकीणोनां वाक्यानां मिथोऽन्वययेोग्यानाम् अक्षररो गवेषणेन सिंहवलोकमण्टरकष्टुलादिनीतिमनुप्रय पश्चिमवाक्यस्य
1
वहुदूरस्थेन पूर्ववाक्येनान्वयः, पृ्वाक्यस्य वहदूरस्येन पञ्चिमवाक्येनान्वय इति रव्या विप्रकीर्णवाक्यानां व्यलयपिन मिथोयोजने मतिरुदभूत् भगव्रत्पादानु- ग्रहवशात् | तथाविधयोजने कृते च मिथेङन्वययोग्या्थत वाक्यानामारेच्य प्रमोदभरश्च समजनि । ` एतादृशानाम् अन्विताथानां वाक्यानां मिथो योजन कुत्र कथं कृतम्? आदशचकोशे कमि पुटव्यवधानतः तानि टिखितान्यासन् 2 इत्येतत् › ग्रन्थ एव व्रिंरातिसङ्ख्याके$ तत्तद्राक्यघुद्रणस्थटेषु अधः टिपण्यां परदर्दितम् । तननिरीक्षणेन च परिरोधनपरिघ्रमः कियानभूदिति अवगम्येत सदये; ॥
एवे महता प्रयल्तिन शोधने कृतेऽपि मानुषशेमुषसभावसिद्धेन प्रमादेन
बहवः अद्युद्धयः सम्भन्येरन् । पठनपाठनवदादिव तु ता निरसनीया भवेः सूक्ष्मेक्षिकया सहृदयैः, इति सविनये निवे एतावत। उपसंहियते ॥
पूज्यान् पतक्नरिन्यासहकरास्तीन् मुनीन् चुम: । योगशचा्ञस्य वेदान्त्चास््रस्यापि प्रवेकान् ॥ इत्थम् ‹ शास्त्ररलाकर ° विरुदमूषितः पोरकम् - घु. -शीरामक्ञासत्ी मद्रपुरसष्छृतक्खश्ाठ - वदृान्तसाहयाण्यापक्रः ' न्यायवेदृन्तशिरोमणिः एस्. अर्. कृष्णमूरतिशाखी मद्रपुरसस्कृतकरखशाखन्यायतवदान्तध्य्रापकः || | दयुभम् ॥
॥ सभाष्यविवरणश्रीपातञ्ञख्योगसूत्रविषयायुक्रमणिका ॥
१५. १६. १४७. १८. १९.
२०,
#
२१. २२. २३. २४६. २५. २६. २७. २८.
॥ प्रथमः समाधिपादः ॥
विषयः योगशाख्यारम्भः योगलक्षणम् नियोधकारे चितः स्वरुपमात्राचस्थानम् उ्युस्थानकाङे चितो वृत्तिसारूप्यम् वृत्तीनां पव्वसङ्ख्यत्वम् व्रत््युदेशः प्रमाणविभागलक्षणे विपययलक्षणम् विकर्पलक्षणम् निद्रारक्षणम् स्मृतिलक्षणम् नियोधापायः अमभ्यासटक्षणम् अभ्यासस्य दढभुमिस्वे उप।यकथनम् वैराग्यलक्षणम् परवेराग्यलक्षणम् संप्रज्ञातसमाधिलक्षृणविभागे असप्रज्ञतसमाधिलक्षणम् निरोधसमाध्यवान्तरभेदभवप्रययाधिकारिकथनम् तदवान्तरभेदोपायप्रययाधिक्रारिकथनम् उपायतारतम्यप्रयुक्तफरुतारतम्यम् ईैश्रराराधनस्यापि निरोधसमाध्युपायत्नम् दृ्रलक्षणम् इश्वरस्य सवेज्ञत्वसाधनम् इश्वरस्य सवेश्रेष्ठत्वम् दरवा चकस्वरूपम् ङरप्रणिधानस्वरूपम् दैरपणिधानफलम्
प्रम् १ ९ १३ १४ १५ १८ १9 ३३ २३५ ३८ ३९ य्
2) ४३ १9 4. ५७ ४८ ५० ५१ ५२ १३ ५३ ८५५७ ७ ७६ ७९ ८०
विषयः प्रष्ठम् २८९. अन्तरायकथनम् ८१ ३०. तद््थम् अभ्यसनीयविषयकथनम् ८३ ३१. चित्तपरसादनोपायाः. ९१ ३२. प्रसन्न चित्तस्थेर्योपाथाः ९२ ३३. स्थिरचित्तत्ताऽवान्तरफलम् ९.७ ३४. स्थिरचित्तस्य समापत्तिस्वरूपकरुथनम् 93 ३५. सवितकंसमापत्तिलक्षणम् १०२ ३६. निर्वितकंसमापत्तिलक्षणम् १०३, १०४ ३७. सविचारनिर्विचारसमापत्तिरक्षणम् ११० ३८. सुक्ष्मविषयत्वावधिकथनम् १११ ३९. उक्तसमापत्तीनां सबीजस्वकथनम् ११३ ४०. निर्विचायेत्कषेकलम् 9) ४१. कऋतम्भरप्रज्ञाकथनम् ११४ ४२. ऋतस्भराया विशेषचिषयत्वम् ११५ ४३. निविचारसमापत्तिजन्यसंस्काराणामितरसस्छरपरति-
बन्धकः्वम् ११६ ४४. नि्बीजसमाधिदशाकालः ११७
॥ द्वितीयः साधनपादः ॥
१. क्रियायोगस्वरूपकथनम् १२१ २. क्रियायोगफटम् १२४ ३. शोदश १२५ ध. द्चक्षानामिययाम्र्कत्वम् १२७ ५. अविद्यालक्षणम् १३२ ६. अस्मिताखक्षणम् , १३७ ७, रागलक्षणम् १३९ ८, देषलक्षणम् १४० ९. अभिंनिवेशशषलक्षणम् र १०. शानां परिचमावस्थाकथनम् १४२ ११. तदुकृत्तीनां ्यानहैयत्वम् ५ १२. कमांश्षयस्य छरैतुत्वम् १४३ १३. कमोक्षयविपाकनिरूषणम् १४६ १४. बिपाकरूलकथनम् १५८
१५. सुखस्यापि दुःखार्मकतया देयत्वम १५९.
१६. १७. १८. १९. २०. २९.
२२.
२३. ग्ध,
५.
२६.
२७,
२८
२९.
२०. २१.
२२.
३३. ३४. ३५. २९. २३७० ३८. २९. ०. श १, २, ९३. ८, ८५५. ९. ७, ९८, ४९,
31111
विषयः . हेयस्वरूपम् हेयहेवुस्वरूपम् द श्यस्वरूपम् टेरैयावान्तरतविभागः ्रशस्वरूषम् टइयस्य द्रधूथत्म् मुक्तेतरसंपर्फिस्वाद्रश्यस्यानष्टत्वम् संयो गस्वरूपकथनम् सयोगहदेतुकथनम् हानस्वरूपम् हानोपायकथनम् उत्पन्नाविवेकप्रज्ञायाः सप्रविधरवम् विवेकरूयातिसाधनक्थनम् योगाङ्गकथनम् यमस्वखूपम् यमविशषेष्वरूपम् नियमस्वरूपम् यमनियमप्रतिबन्धबाधनम् वितकरस्वरूपादिकथनम् अर्हिसाप्रतिष्ठारसम् स्तय 39 अस्तेय )) ब्रह्मचये अपरिप्रह )) क्षोचफखम् सन्तोषफलम् तपःफलम् स्वाध्यायफलम् इधरपरणिधानषकम् आसनस्वरूपम् आसनसाधनक्रथनम् आसनक्लम् प्राणायामसामान्यस्वरूपम् प्राणायामविशेषस्वरूपम्
प्रष्ठम् १७१
१५७२
१५७६ १८२ १८८ १५२ १९४ १९५ २०० २०३ २०४ २०५ २०५४ २११ २१२ २१४ ९१५ २१७ २१८ २२९९१
39
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५१२ ग्ग
१3
२२५ २२९ २२७
८ ©, ५ १? = ५५२१
१५. १६९. १५७. १८. १९. २०, २१. म्२. २३. २४८. २५.
२८.
२९.
11४
विषयः प्राणायामावान्तरफलटम् प्र्ाहरस्वर्पम् ` प्रयाहदारफलम्
॥ तृतीये विभूतिपादः ॥
धारणालक्षणम्
ध्यानलक्षणम्
समाधिरक्षणम्
सयमपदाथः
सयमजयफलम् संयमसापेक्षता धारणाऽऽदाीनामन्तरङ्गस्वम् एषामेव निर्बाजबहिरङ्गतम् निरोधपरिणामलक्षणम्
तेन चिन्तप्रश्षान्तवाहितोक्तिः समापिपरिणामलक्षणम् एका्रतापरिणामलक्षुणम् धमोदित्रयपरिणामरक्षणव्याख्यानम् धर्मलक्षणम्
परिणामान्यत्वे हेतूक्तिः परिणामन्रयसयमफुलम् श्ब्दायथप्रयययिवेकसयमफलम् संस्कारसाक्षास्कृतिफलम् प्रययसाक्षात्कृति कछम्
प्रययसाक्षात्कृतो तददिषयस्यासाक्षाकृतिः
कायरूपसयमफलम् कमसयमरुलम् मेञयादिसंयमरूटम् बलसयमरलम् ्ब््यालखोकसयमफलम् सूयेसयमरूलम् चन्द्रसयमफलम् ध्रवसयमरूखम नाभिचक्रसयमफलम्
पषछठम् २२० २२१
२२३३ २३४
११
२३५
११ २३७ २३८ २३९ २०
99 २४१ रधर २५५ २५९ २६२ २६३ २७८ २८० २८१
श्र २८य् २८३ २८४
१ २८५ २८७
99 <£
३०. २१९. ३२. २३. २४. २३५. २६. २७. ३८. ३९.
४१. ४२. ४३. ८४. ४५. ४६. ४७, ८८, ४ ९. ५०. ५९. ४४. ५२. ५४.
॥ © 0 2 ०८ ५ ९) ~
ॐ
विषयः कण्ठकूपसयमफलम् करूमेनाडीसयमफरम् मूधञ्योतिःसंयमकलम् प्रातिभस्यमफलम् हदेयसयमकूलम् पुरुषन्ञान प्ताधनसयमकथनम् प्रातिमादीनां स्वाथसयमणटत्वम् पूर्वाक्तसिद्धीनां समाधिप्रात्तपक्षत्वम् चित्तध्य परदेहावेश्चोपायः दानसयमफटम् समानरसयमकटम् श्रोता काक्चंसबन्धसयम 5ल्म् कायाकाक्षसबन्धस्यमफलम् प्रकाश्चावरणक्षयभूत्तजयोपायौ अणिमादिसिद्धवादयुपायः कायसपत्स्वरूपम् इन्द्रियजयो पायः इन्द्रियजयफलम् सवेज्ञादृतादुपायः केवल्योपायः केवल्यप्रतयुहप्रशमोपायः . क्षणतक्करमसयमफलम् विवेकजज्ञानाविंषयोक्तिः विवेकजज्ञानलक्षणम् सत्वपुरुषान्यताख्यातिकलम्
॥ चतुर्थः कैवल्यपादः ॥
सिद्धिकारणवेविध्यम् जा्यन्तरपरिणामप्रयोंजकोक्तिः धमोदेः प्रकृतिप्रयो जकस्वाभावः निमोणवित्तकथनम् तस्रयोजकवित्तकथनम् नि्भितवित्तस्य वासनाद्युल्यत्वम् कमभेद;
प्रम् २८८
२९२
3 ` 93 २९३ २९४ - 3) २९५ २९६, २९७ ३०१ २०३ ११
३०५
२०९ २३०७ २३०९ ३९१२ ३१४ २१५
२१७ ३१८ ३२० २२१
१०. ११. २१२. १३. १४. १५. १६. १५४. १८. १९. २०. २१. २२. २३. २४. २५. २६. १९७. २८. २९. 2३०. ३१. २३२. २३२. २३४.
1९1
विषयः वासनानां कर्माजुगुणत्वम् व्यबदहितबासनामामप्यव्यवधानो पपत्तिः वासनानामनादिप्वम् अनादित््रेऽपि वासनानामुच्छदः धमोणामष्बभेदपरिणामः धर्माणां गुणल्कथनम् वस्तुगतेकत्वव्यवहारमिमित्तोक्ति अथेज्ञानभदसाधनम् अथेस्य ज्ञानसष्टभाविष्वखण्डनम् चित्तपरिणामितस्यज्ञनम् पुरुषापरिणामित्वोक्तिः चित्तस्य स्वयप्रक्राशव्वाभावः चित्तस्य स्वाभासत्वे दोषः चिन्तान्तरभास्यत्वे च चित्तस्य, दोषः अपरिणामिन्या अपि चित्तितो बुद्धिवदनम् चित्ते सवोौथेत्वस्यो पाधिकरत्वम् चित्तातिरिक्तवेतने हेखन्तरम् आत्मज्ञानाधिकारिपरिचयः आस्मज्ञानाधिकारिचित्तस्वरूपम् विवेकिनो व्युरिथतवचित्तत्वे हेतुः विवेकिनो उयुत्थितचित्तत्वनिराकृतिप्रकारः प्रसरख्याननिरो घोपायः धर्ममेघसमाधिश्कम् धमेमेघकाङे चित्तावस्थाकथनम् गुणपरिणामक्रमसमाप्षिः क्रमरक्षणम् केवत्यस्वरूपम्
॥ समाप्नेयं योगसूत्रविषयासुक्रमणिका ॥
पृष्ठम् ३२४ २२९ ३२८ ३३१ ३३३ २३५७ ३३८ ३४१ ३४४ ३४६ ३४५ २३४९ ३५१९ ३५२ २३५ २५५ ३५८ ३६० ३६१ २९२
१9 २६३ १३
२९४
३६५
११
३६८
श्रीः श्रीपतन्नव्ये नमः श्रीवेदव्यासाय नमः श्रीमच्छङ्करभगवतसादेम्यो नमः
॥ पातञ्जरुयोगसूत्रभाष्यविवरणम् ॥ ॥ श्रीमच्छङ्करभगवतादप्रणीतम् ॥
| समाधिपादः प्रथमः ॥
(पातञ्चट्योगचत्रम् ) अथ योगानुशासनम् ॥ १॥
(व्यास्तमाष्यम्) अयेलययमधिकाराः । योग।ुश्ासनं शाख्चमधिक्रतं वेदितव्यम् ॥
( विवरणम् )
यसिन्न स्तः कर्मविपाक यत आस्तां
ङ्कशा यस्म नाटमरुट्ध्या निखिरानाम् । नावच्छिन्नः कारशा यः कल्यन्या
ठेकेशस्तं कैटभरातरं प्रणमामि ॥ १ यः सर्ववित् सवेविभूतिशक्तिः
विहीनदोषोपहितक्रियाफडः । विश्वोद्धवान्तस्थितिहेतुरशो
नमोऽस्तु तस्मे गुखे गुरोरपि ॥ २
अयेद्यादिपातज्ञट्येगशान्[सूत्रभाष्य]विवरणमारभ्यते । तत्रानास्यात- सम्बन्धप्रयोजने न पुरुषप्रहृत्तिनिदृत्तिम्यां पयौभोतीति, सू्रकारामिप्रेते पुदषप्रवृत्तिनिमित्त मूते सम्बन्धप्रयोजने पूर प्रकरटीक्रियेते ॥
२ पातञ्जल्योगसूत्रभाष्यविवरणे
तत्र॒ प्रयोजने तावत्--चिकिःसाराल्ने तच्चतुन्यूहलप्रदर्शनद्ररिण व्यास्यातम् । तथथा--चिकिःसाश्ास्लं चतुव्वूहं, रोगः, रोगहेतुः+ आरोग्यं, भेषञ्यम् इति । विधिप्रतिषेधनियमद्वरेण [च तत् ] चतुन्यूहविषयन्याल्यान- परम् । एवमिहापि ^“परिणामतापत्तस्कारदुःखैगुणदृत्तिविरोधाच् दुःखमेव सर्व विवेकिनः1, इद्यारभ्य चतुब्यूहलं राक्षस्य प्रदरईदितम् । तथथा-दुःखप्रचुरः संपतरो हेयः । तस्यव्रिधानिमित्तो द्रष्टदस्यसंयोगो हेतुः । विवेक रूयातिरविष्वा हानोपायः । विवेकस्यातौो च सलयामविदानिदृत्तिः, तनिदृत्तत्रान्तिको
दररयसंयोगोपरमो हानम् , तदेव कैवल्यमिति । अगोग्यस्थानीय- केवल्यप्रयुक्तघादस्य तदेव कैवल्यं प्रयोजनम् ॥
ननु च ` हेयतद्धेतू न प्रस्तोतन्ये, निष्प्रयोजनत्वात् । हानप्रयुक्तं हि शाखं, तदुपायभूता वरिवेकस्यातिरेव वक्तव्या । न हि कण्टकविद्ध- चरणतर्स्य तदपनयनं मुक्वा दुःलतद्धेत् चोधेते । नैतदेवं--दहेय- तत्कारणयिक्षत्राद्धानोपायस्य । यावदिदमनेनोपायेन हातन्यं संसारचक्रम् अस्य चाविधानिमित्तो द्रषृददयक्षयोगो हेतुः इति नाल्यायते, तावन्नावि्याप्रतिपक्ष- भूता षिवेकल्यातिरास्यातुं शक्यते । हेयतद्धेतुमतो हनोपायार्थिनो रोगिणो भेषञ्यार्थित्वदशनात् । न हि रोगं रोगहेतुं चानयेक्ष्य चिकितसाशास्- मुपदिस्यते ॥ ॥
सम्बन्धोऽपि-- विवरेकस्यतिह्यनमेव फ साध्ये हानस्यापि बिवेक- ल्यातिरेव साधनमिति साध्यसाधनयेरितरेतरनियम एव, नान्यस्ंबन्धः । तचचथा- -भेषञ्यस्यारेग्यमेव फलम् आरोग्यस्यापि मेष्रञ्यमेत साधनमिति इतरेतरनियमः, स च शाघ्लादिति. । तस्मात् ससब्रन्धप्रयोजनं यागानुशासनम् ।
ननु च यदि हानं प्रयोजनं तदुपायश्च विवरेकल्यातिषिति, तत्र वक्तन्यम् (अथ विवेकस्यात्यनुक्ञासनम्? इति । किमर्थम् “अथ योगानुश्चाप्तनम्' इति सूत्रितम् ए
तदुपायल्वाध्ोगस्य । उपाय एव वक्तव्यः स्यात् । उपेयोपग्रदश्चैने ह उपेयमुपायं प्रति साकाहुमेवे्युपायः साङ्गकरापः पुनरपि वक्तञ्यः स्यात् । तसिमिश्वाभिहिते सवेमभिहितमिति ।
1. पा. 2, चुर 15,
सभाधेपादैः प्रथमः -३
कथं तदुपाद्रत्म् £ यत आह सूत्रकारः--ध्योगाङ्गानुष्ठानादञ्ुद्विक्षये ज्ञानदीपिरात्रिवेकल्यतेः' इति । "निर्विच तेशारवेऽध्यात्ग्रसादः” (ऋतमरः तत्र प्रज्ञा इति च ] तथा माष्यकतिऽ्याह--्यस्तेकप्रे चेतत्ति स॒ भूतमथ प्रचोतयति” इति । भूतार्थावगतिश्च विवक्यातिः । तस्मायुक्तं तदुपाययोगा- नुशासनमेवादौ सूत्रितमिति ॥
नतु च योगाङ्गानुष्ठानाद्विविकस्पातिः, तत्र वक्तव्ये “अथ योगाङ्गानु- शासनम्? इति-न-फकेनेपक्रमात् । योगा्गानुष्ठानस्य हि फं योग इति तदुपक्रमो युक्तः ॥
यथेव हनेनोपक्रम्येत-न-तस्येपेयत्वात्-उपेयमेव दहि तत् । योगः पुनः स्वाङ्गानसुपेयश्च, उपायश्च विवेकख्यतिरणिम।दिप्रातेशचे.लभ्योर्हिततरः । फठतदु पायरूपल्रात् (फड्पयनिमित्तत्वात् ) ॥
उत्तरसुत्रार्थताच्च । न हि (अय येगाङ्गानुङ्ञासनम्! इध्यक्ते ध्योगश्चित्तदृत्तिःनिरोधः' इति युक्तं वक्तुम् । तदा हि भ्यमनिध्यमदिसूत्रमेव पठ्तिध्ये स्यात् ॥
भथ तदेव पठित्यमिति चेत्-न-योगोपे(पफ़याया हानोपायभूताया विवेकस्तिः, फएरस्य च हानस्य, संबन्ध|्र]दरौनाधैलात् ध्योगश्चित्तवत्ति- निरोधः" इद्यस्य ॥
(सोकं पुनरेतत्संबन्धप्रदर्थनाथम् £ यावत निर्बीनसमाधिरक्षणाभिधान- मेतत् । सत्यमेत, तथापि हानतदुपायसंवन्धमत्रथे।तयदेव सूत्रं निर्वीजसमाधि- छक्षणतामापयते | ।
न हि निरेधलक्षणात् समधेरथान्तरं हानम् । वि सेतावता विशेषः, निरोधलक्षणप्तमाध (धेने) पुनः प्रवृत्तिः, हने खाव्यन्तिकी निवृत्तिरिति । समाध्यवस्थायां तु हानाविरेष एव॒ । तथा चह--“्तदा द्रष्टुः स्वखूपेऽव- श्स्यानम्)› [इति] । “सह्यप्रतिष्ठा च चितिशक्तिः कैश्वल्यम्'' इति स्वरूप- प्रतिष्ठत) हि कैवल्यमाह । ततश्च निर्गौजस्माधिना केवल्यमेव राल्ञथ- प्रस्ययद्रदिप्ने सक्षात्ियते ॥
1 अ 1 णण
1. पा. 2. चू. 28. 6. पा. 2, सू. 29. 2. पा. 1. सृ. 47. 7. पा. 1. सू. 2. 3. पा, 1. सू. 48. 8. पा. 1. सू, 3, 4. पा. 1. सू, 1, 9, पा. 4. सू. 34. ६. पा. 1... 2.
४ पातञ्जरयोगसूत्रमाभ्यविवरणे
तस्मादुच्यते कैश्चित् (सत्रीजक्तमाषिः केवस्यसाधनामेति-- तन । कि तर्हि? स्यातिय साधंनमविचयानिवृत्तिदरेण । अविधानिमित्तो हि बन्धः;। तस्माय्पि योगानुशासनं सूत्रितम् + तयापि स्यात्यथत्राचयोगस्य तदूद्ररेण ख्यातिहानसंवन्धमपि दरौयतीति, पुषटून्यते उत्तरसतरसंबन्धार्थं॑च योगानु- रासनमिति सूत्रयितव्यमिति ॥
यपि फलानां तत्फटसाधनं प्रघ्युत्पननाकाङ्घाणां साधनोपदेदोऽप्यत्ि | तथापि न तस्मयोजनम् , सस्य फटेोदेरोन प्रवृत्तस्तदेव प्रयोजनमिति ॥
योग्।तुशाप्तनमिति । यथा रिष्योऽनुशिष्यते विशिष्टप्रदृत्तिनि- वृत्तिनियमद्वरेण, त्तथा विशिष्टसाध्यसाधनतदरङ्गनियममात्र्तद्यादन्तेवास्यनु- श।सनवदोगानुरासनमिव्युन्यते । अनुशिष्टिरनुशसनं, येगेऽनुरिष्यतेऽने- नासिननिति वा योगानुशासनं शाखम् ॥
अथेलययमपिकार्थः । अधिकार आरम्भः प्रस्तावः, अ्थौऽमिघेयोऽस्प ; शिष्टस्मृतिप्रामाण्यातः । ननु चनेन्तयीधस्याधशन्दस्य स्मरन्ति शिष्टाः । तथा चाह--“धृत्तादनन्तरस्य प्रक्रियार्थो "ष्टः, इति । न-- प॒प्रत्रारम्भा्ल्त् । आनन्तरयस्य च गम्यमानलात् । यथा पुत्र इत्युक्ते पिता गम्थते, न च पुत्र शब्दस्यार्थः पिता, तयेहप्यारम्भ एवाभिधीयते, आनन्तय तु प्रतीयते ॥
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अत एव च व्ृत्तादनन्तरस्य प्रक्रियार्थो दृष्टः इत्युच्यते | यदि चानन्त्यार्योऽमविष्यत्तदा व्वत्तादनन्तर्येऽयं प्रक्रियायाः इल्यवदिष्यत् । अनन्तरस्येति चनन्तरभाविन एवामिधानम् ॥
अपि चैवं हि स्पृतिः--“शङिश्विदन्ययः तरिभक्त्ययप्रधानं किञश्चिकिया- प्रधानम् । उचैनीचेरिषयादि विमकत्य्थप्रधानम् , हिरुक् प्रथनिल्यादि क्रेया- प्रवान्” [इति] । न चैतद्ववतिरेकेणान्ययानामर्थो विद्यते । तनाथशग्दस्या- नन्तर्थाथैवे सति वरिभक्सय(क्ति)श्रवणमयुक्तम् , सच्चप्रधानत्वात् । आरम्भक्रियार्थत्े
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तु न विभक्य.थ)श्रवणमयुक्तम् , अप्तचप्रधानत्वादिति ॥
तस्मादथरन्दः प्रप्तावा्थ एवेति युक्तमयेव्यधिंकारायं इति । स्वख्पा- वचोतना्थं इतिशब्दः । यथा गौखिहेति । प्रपिद्धोऽप्यथजञब्दार्थोऽधिक्रियमाण- विषये रिष्यनुद्धिसमाधाना्थ कीव्येते । सिद्धो ह्ययं न्यायः श्रुतौ *ध्याह्यास्यामि
1
ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिष्याप्तस्छ' इति ॥
1, रात्र, भा. अ, 1. पा. 1. पू. }, बर, उ. 2. 4. 4. 2. महाभाष्यं 1. 1, 37.
. समाधिपादः प्रथमः ५
[ भाष्यम् | योगः समाधिः । स च सवैमोपञशित्तस्य धर्मः । क्षिपत, मूढं, विक्षि एकाग्रं, निरुद्धम् इति वित्तभूमयः ॥ [ विवरणम् | | कः पुनर्योगो यस्यानुशासनं प्रस्तुतमिति-भह - योगः समाधिरिति ॥ समाधिग्रहणात् युजिर्योगे" इति निवदय, भ्युज समाधौ" इत्ययं गृहीतः | योगः समाधानम् | ननु च भ्योगः समाधिः? इत्येवमन्तेन व्याए्यति सूत्रे स च सार्वभौमः" इव्यादिभाष्यमतबन्धं ददयते । नैष दोषः । इह समाधिरिव्युक्ते, समाधीयमानप्रक्षत्वात् , समाधीयमानानां च बहूघात् , किमासां समाधीयते ए किं वा शरीरम्, अहोस्िदिन्दरियाणि, इति बहुविदा विप्रतिपत्तेः, स्वविरोषणाक्राह्ताच समाप, कस्यायम् ? रविविसेषणकः १ इत्यनुषक्ते प्रश्ने, इदमाह-स च सार्मैमोमश्चित्तस्य धर्मं इति । चित्तस्य धर्मो नासादीनाम् । तच्च चित्तं खयमेव समाधीयते [समाघात्र)न्तरनिरपेक्षत्रात् ॥
काः पुनभूमय इव्यत आह--क्षिं मूढमियादयो मूमय इति । कषिप्तमिति क्ैक्रि मिष्ठ। ' यथा मिनः कुपूलः स्वयमेवेति । श्षिकतमनिष्ट. विषयासज्चनेन स्तिमितम् । मू्ढं॒निर्विवेकम् । विक्षिप्तं नानाक्षिक्तम् | क्मेकतीर्ये् । विवेकाक्षमं च विक्षिपतत्वदिव । एकाग्रं त॒ल्यप्रययप्रवाहम् । निरुद्धमिति प्रलययदुन्य चित्तम् ॥
नतु च भूमिषु रमषु विवक्षितेषु, किमथ क्िप्तमिव्यादिना घम्बुष्यते नैष दोषः, धर्मिणा घम एवेपदिरयते । धर्माणां धमिंविषयप्वात् । यथा गोले किं लिङ्ग भिति पृष्टे, विषाणी ककरुवान् प्रान्तवाख्धिरिति धरिणा ध्म एवोपदिश्यते । तस्मात् क्षेपादयश्ित्तस्य भूमयो धमी इयर्थः ॥
नतु च भूमीनां चित्तधमेवे समाधेश्च, कथं मूमिमिः समाधिराधारलेन विरेष्यत सारमोम इति ? सामान्यमूतघ्वात् समाधेः! भूमीनां च विशेषत्वात् | यथा क्षिपते तिष्ठति, मूढं तिष्ठति, विक्षिप्तमेकाम्रं चेति, क्षिप्तादिमूमिइ स्थितिरनु- वतते सामान्यम् । स्थितिश्च समाधिः । तस्मात् सामान्यरूपं स्वाघु भूमिषु प्राघान्येन वर्तत इति । 'सवैभूमिपथिषी' शव्येश्चयथीयोऽणाप्रत्ययः । अनुशति- कादित्वादुभयपदबृद्धिः ॥ ये पुनबाद्याध्यासिकान् संयमवरिषयान् भूमय इत्याचक्षते । तषां विक्षिपते चेतक्षिः इति सामानाधिकरण्यानुपपनत्तिः । स्ववचनविरोधश्च कथम् ?
8 पातज्ञर्योगुत्रमाध्यविवरणे
्षिष्यतेऽस्मिन्निति क्षिप्तम् , सुद्यतेऽस्मिननिति मूं, यद् चैवं न तदा संयम- विषयता । तत्र क्ेपाधसंमवात् । एकाम्रावस्यारयां हि सेयम भवति ॥
कि चान्यत्--क्षिपेश्च प्रौव्याचर्थीभावादधिकरणे निष्ठात्रत्ययामावः। किं च- निरुद्धे चेतत्ति सयमस्यापि तत्राभावात् बृत्तिशुन्यत्वात् संयम पिषयाभावः । न हि निरोधे विषयविरेषे चित्तं निरुध्यते ¡ तदा हि व्रिषयित्वाननिषर्तते
परिगिणनानुपपत्तिश्च । न हि क्षिप्तादयः पश्वेव संयमस्य विषयाः । तेषामानन््यात् ॥
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| ननु चान्यथा योगं केचिदिच्छन्ति । तथा चाहुः--“दन्धिषमनोऽध- सन्निकपरीत् सुखदुःखे, तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि, [स)]रारीरस्य इुखदुःखामवः प्राणमनेविनिग्रह पक्षः पतयेगे , योग] इति" । तदिति प्रकृतपिक्षम् । योऽसौ घुखदुःखयोरासेन्धियमनोऽधसनिक्र्षो हेतुः, तस्यानारम्भः तदुत्पत्तिः । स कथं भवति £ आत्मस्ये मन्ति, नेन्दियस्ये । सरारीरस्य अविरीर्णश्षरीरस्य । तदा कारणाभावात् कार्याभाव इति, सन्निकर्षीमव्रि षुखदुःखयेष्प्यभावः तस्यामवस्थायां योऽपो विमोरात्नो मन्ता संयोगः स प्राणमनोविनिग्रहपिक्षः संयोगविरेषो योग इति ॥
अत्रोच्यते--आःमस्थे मनपीव्ययुक्तम् , सर्वदा आलमस्यघ्ानमनसः । इद्दियादिसनिकपरनारम्भपिक्षया आप्मस्ये इति चेत्, तदनारम्भ इव्यव सिद्धतराद मस्थे मनसीत्यनथकं स्यात् ॥
किं चन्यत्-मुक्तस्यापि मनस आलस्यलादिन्दरियसनिकषामावाच योगः प्राप्रोति । तस्यापि हि सवगतत्वात् मनस्तश्च नित्यत्वात् सवंदात्मस्यत्वमेव ॥
क्रि च-आत्मनः प्रदेशभावादात्मस्थ इत्ययुक्तम् । न चघ्युपचरिता- सप्रदेशसंयोगः परमार्थस्य योगस्य हेतुः स्यात् । उपचरितस्य मिथ्यात्वात् ॥ विं चान्यत्-मनोऽधसनिकर्षामाव इव्येव सिद्धेः(द्)शन्धियम्रहणमनर्थकं स्यात् । अथयेद्धियेर्विना . मनोऽथत्तनिकप्ीमावात्तदनारम्भ इति प्राप्त्मभवे प्रतिषेधो न युक्त इति चेत् ] नैतदेवम्, विनेन्दिमेनोऽथसननिकर्षा
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-नास्तीय्यात् सनिकप्रप्रतिषेषं कुवैता विषयत्रात्तिरिन्दियद्यास प्रतिपादिता स्यात् ॥
वि चान्यत्--पवेप्राणमाजामिन्दियमनोऽथसनिकषत् बुखदुःखप्रति- छम्भस्य प्रसिद्धत्वादात्मनः सम्बन्धस्य च निघ्यत्वात् सुखदुःखामवो योग इत्येष सिद्धेः, तत्न [सूत्र] शेषोऽनथकः स्यात् ॥
समाधिपादः प्रथमः ७
भाष्यम् |
तत्र॒ विक्षिप्त चेतमि विक्षेपोपस्रजैनीमूतः समाधि योगपक्षे वैते ॥
[ विवरणम् ]
अथापि स्यादिन्दियमनोऽथसनिकषम्रहणादते हुखदुःखामाव इव्येतावति सति मुक्तस्यपि षुखदुःखाभावायोगिचप्रसङ्ग इति तननिवृस्यर्थ सूत्रोषग्रहणमिति | तच्च न, सुक्तस्य षुखदुःखप्राद्यमवात् , प्रात्तिपूवप्रतितरेधस्य न्याथ्यत्वात् , यस्य इखदुःखभ्र प्तिः, तद्विषयः घुखदुःखाभाव एव योग इति सूत्तरोषभ्र्यास्यानं युज्यते॥
किं चान्यत्--उपत्तेऽपि सशरीरप्रदणे सुक्ताद्विनिदृत्तिनं शक्यते कर्तुम् + निष्प्रयोजनघात् । घुखदुःखामावश्चेधोगः, विधानमपि शरीरं कायाकरणादनर्थकरं स्यात् । कार्यानपेक्षायां हि सुक्तामुक्तयोरविशेष एष ॥
कि चान्यत्- प्राणमनोविनिग्रहपेक्ष इत्यपि न घटते । विधारकस्य प्रयततस्यात्मप्तमवेततादत्रिचमानेऽपि मनसः करिंयावचे इन्दियेणासंयुज्य मनः प्राण. [मनोनिग्रहौ न कर्तुं पर्याप्यते । इन्दियसयोगे च मनसः, तदनारम्भ इत्ययुक्तम् । मनसश्च प्राणनिग्रहे व्यापर(ब)तत्वादनारम्भातुपपत्तिः ॥
न चासति इद्धियवायुसन्निकषे प्राणनिग्रहः । न चनिगृहीते प्रण योगः, आसमस्यविधारकग्रयतद्वारा मनेगतक्रियासंबन्धहेतुत्वात् प्र णनिग्रहस्य | अथापि स्याघोगः सम।धिद्धिति। तच्च न, निष्करियत्वादात्मनो निव्यसमाधानमेव । स्थितिश्च समाधिच्युच्यते । तस्माचुक्तममिधीयते--स॒च सार्वैभोम- शित्तस्य धमः' इति ॥
` - ययेवं समाधिश्ेयोगः, स च सर्वभौमधित्तधमेः, स च सर्वजनानाम- यत्तसिद्धः, क्षिप्ताचनुगतत्वात् । तथा च सतिं; यथेव श्ाप्प्रश्चासादीनां प्रयत्तादते सिद्धतात्तत्करणमदक्षणम)न्थकम् , एवं योगानुञ्चासनमप्यनर्थकं प्राप्तमिलत आह-तत्र | विक्षिप्त (अनविक्षिप्र) चेतमि विक्षेपोपसमेनीसूत सम।धिने योगपक्षे वतत इति ॥ क्षिप्ताचनुगतस्यं योगपक्षेऽनभिप्रेतत्रात् । नं हि क्ेपा्नुगतः समाधिभूतार्थवयोतनादिक्षमः, क्षेपादिप्रधानत्ात् । विक्षेपनिषेधेनैव हि प्रधानमछ्निवर्हणन्यायेन क्षिपतमूढयोरपि निषेध; कृतः । म्रधानतां च विक्षेपस्रमाधेरधिकारयोग्यत्वात् । विक्षेपस्य हि चित्तमपक्षपातादिष्ट विषयमुपने्तं रक्यते । न हि विषयासञ्ञनादिना क्षिप्तमिष्टत्रिषयवियोगादिना वा .मूढमन्यथोपनेतुं पार्यते ॥
८ पातञ्जलयो गसूत्रभाष्यव्रिवरणे
[| भाष्यम् | यस्त्वेक चेतसि स भूत(सद्भूत)मथ प्रयोतयति, क्षिणोति च न
केशान्, क्मेवन्धनानि शयति, निरोपमामभि)युखी(खं)करोति -स स्रज्ञातः(योग)श्याष्यायते ॥
स॒ च वितकौतुगतो विचारायुगत अआनन्दानुगतोऽस्मितातुगत इत्युपरिष्टात् (नि)परवेदयिष्यामः ॥ १ ॥
[ त्रिवरणम् | योगपक्ष इतिं ॥ समाधिवे सल्यपि कायोकरणात् पक्ष इत्युच्यते । यथा गच्छतः प्रतिपदं वि्यमानापिं स्थितिः स्थितिका्यकरणानन स्थितिस्युच्यते । विक्षेपोपसर्जनी भूतत्वं विक्षेपस्येकसमधिन्यक्ल्यमिप्रयिण । सार्वभौम इति तु प्राधान्ये, सामान्येन सर्वभूमिषु वत्तः ॥
यदुपसजनीमावः समापिपक्षाृत्तो करणम् , - इहप्येकम्र एकाम्रतो- पसनेनव्वं स्यात् । ततश्च योगपक्नाटृत्तिरितिं चेदत आह--यस्तेकाग्र इति । नैकाग्रतायां भूम्युपसजनलम् । कुतः 2 कशकर्माप्रनल्लरात् । ऊशकर्माप्रनरतवे न हि विक्ेपादीनामुदयः ॥ .
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एकाग्रतामूमो समाधिर्यः स मूतमथ यथासानं प्रचोतयतिं अवगमयति जयेग्यधज्ञानमयथाभूतत्वगन्धितमेवेति भूतग्रहणम् । क्षिणोति, क्षपयति, पश्च- पवैणोऽविधादीन् डेशान् 1 कमबन्धनानि, कर्माण्यत्र बन्धनानि, धममीधर्मविमिश्र- कमेजातानिं जन्मादिनिनन्धनानि, धयति, शिथिलीकरोति, निरोषमामुखी-
करोति, अमिमुखीकरोति । स सम्प्रज्ञात इत्यास्यायते आचर; ॥ .
स॒ च वितकानुगतो विचारानुगत इलयादिभाष्यम् । सम्भह्नातस्य प्रायम्य्हक्षणामिधाने प्राति, अम्यहिंतत्वादसम्भ्ञातस्यैव लक्षणे युक्तपिह वक्तुमिति सम्भ््ञातमुपरि्टात् प्रवेदयिष्याम इत्युष्यते ॥ -
इतश्वासमपरज्ञातस्य लक्षणमिहैव वक्तव्यं, सम्प्ज्ञातनिरेक्षोऽप्यसम्प्ज्ञातः पर(परङ्ृष्टोवेराग्यविरामग्रसयाम्यासाम्यां सिष्यतीयेत्मदशनार्थम् । इह सम्प्रज्ञात- ठक्षणामिधनि तदुत्तरकाले चासतम्भज्ञातलक्षणामिधाने सम्भ्ज्ञ(तपिक्षयेव असम्भ्र- ज्ञातसमाधावधिकार इया्ङ्क। स्यात् 3 तस्मादु परिषत् प्रवेद्पिष्याम इत्याह ॥ १ ॥
समाधिपादः प्रथमः ९
[ भाष्यम् | वैवृत्तिनिरोषे खपंप्रजञातः (समाषिः) । तस्य रक्षणाभिधिस्सयेदं सुत्रं प्रववृते--
[ सुत्रम् | योगधित्तव्त्तिनिरोधः ॥ २॥ ू [ भाष्यम् | सवशब्दाग्रहणात् तेप्रज्ञातोऽपि योग इयाख्यायते । [ विवरणम् |
सर्ववृत्तिनिरोधे तसेप्रजञात इति । तुरब्दोऽवधारणाधः । तस्य एवंविधस्य समधिरसंपज्ञातस्यैव केवलस्य लक्षणाभिषिरसयेदं सूत्र प्रवधूते रबृं “योगि त्तदृत्तिनिरोधः' इ[ती]ति वक्तम्यम् ॥ |
ननु च तस्य लक्षणममिधातुमेतत् सूत्रं प्रत्त, तथा च सति. ध्योगस्य चित्तवृचिनिराधः) इति वक्तव्यं, सामानाधिकरण्यं न युक्तम् । न हि रश्ष्यमेव क्षणे स्यात् । चित्तवृत्तिनिरोधल्क्षण इति वा वक्तव्यम् । नैपष्र दोषः । रक्षय छक्षणाध्यापात् । यथाअ्यं ण्डो देवदत्त इति रक्ष्ये लक्षणमध्यस्यते (प्रयत्यते) ॥ |
ननु च सव्रत्तिनिरोधे व्वततमप्ज्ञातः, तस्य चेदं लक्षणं, ततश्च भ्योगः सर्धचित्तवृत्तिनिरेधः इति वक्तव्यम् । न चोक्तम् । अतोऽतिन्यापि लक्षणम् । स्रशब्द ग्रहणे तावत्कारणमुच्यते--यदि सर्वग्रहणं त्रियते, तदैकदेशनिरेध- निमित्तस्य सेप्रज्ञातस्य योगतवं निवर्तितं स्यात् । तन्माभूदिति स्वशब्दाम्रहणम् ॥
अस्तु तहिं संप्रज्ञातासंप्रज्ञतयोः सामान्यलक्षणे, विरोषानुपादानात् नैष दोषः । येगे प्रकृते पुनर्योगप्रहणात् । विशेषविवक्षायां हि येगग्रहणे नाथवत् स्यात् ॥
ननु चानुशासने न्यग्भूतत्वाचोगस्य इह योगग्रहणे असति चित्तचृत्ति- निरोध इ्युक्तेऽनुरासनार्थ॑ता। मवेत् सूत्रस्य-नैवं--योगानुरास्तनस्य प्रस्तुतत्वात् । येोगानुञ्चासनं हि प्रारग्धं, नायोगानुश्चाप्तनं, तदछक्षणामिधाने ह्यतिप्रसङ्गः, पदार्थासङ्गतिश्च । न॒हि चित्तदृत्तिनिरोधो योगाुशासनमिति पदाथः सङ्गच्छते ॥
एवमपि योगग्रहणात् कुतोऽरसंपरन्नातस्यैव लक्षणं, न पुनः संप्रज्ञातस्य
रक्षणं स्यात् , येगग्रहणस्याविशिष्टत्वादिति 2 ॥
१० पातञ्ञखयोगसूत्रभाष्यविषरणे
भाष्यम् ] चित्तं हि प्रस्याप्रवृत्तिस्थितिश्चीरत्वात् त्रिगुणम् । प्रस्यासवसूपं हि चित्तपत्त्म् [ विवरणम् ] उच्यते--भग्यमिचारात् । व्यमिचरति न तत्तस्य छक्षणं, निगेधस्वसं- ्रज्ञतिऽपिं वतैते इति रसंप्ज्ञाते भ्यमिचरति । न॒हि विषाणि गोर्न, महिष्य दिभिन्धमिचार।त् ॥
नमु चाकप्रज्ञातमपि व्यभिचरति, संप्रज्ञातस्यापि हेयदृ्तिनिरोधलात् । सत्यमेवं, किं तु न निरोधादन्येन लक्षयितुगसेरज्ञातः शक्यते | निरोध एव तु तस्य लक्षणम् , अन्यस्यामावात् । संप्र्ञातस्य चसाधारणवितकौदिटक्षण- ठक्ष्यघ्रात् । यथा स्पररक्षणमिद्युक्ते बायुरेव।पाधारण्याह्टक्ष्यते स्पर्शवच्वेन, अथ च विदत एर स्पशव तेजःप्र्रतिष्वपि ॥
एवे च सति योगग्रहणमनुवादमात्रम् । अत ए च स॒वरप्रहणं न कृतं सूत्रे । निरेधग्रहणेनैवासतज्ञातलक्षणलरे सिद्धे यदि सवेग्रहणं क्रियेत; तस्प्रज्ञातस्य येगतां निवारयेत् । तस्मादसंप्रह्वातस्यैवेदं ठक्षणम् । तथा चोपसंहरति माष्यकारः-- (न तत्र किचित् संप्रज्ञायते इयसंप्रज्ञातः, स योगश्ित्तदृत्तिनिरोध' ईति ॥
चित्ततदृत्तितन्निरेधन्याचिषए्याक्तया चित्तं हीयादि भाग्यम् । किमात्मकं पुनस्तचित्तं, यस्य ॒वृ्तिनिरोधो योग इव्यत आह- चित्ते हि प्रस्या- रबृत्तिस्थितिसीरलात् त्रिगुणमिति । तत्र चित्तं त्रिगुगमिति व्याख्यायते, ्रयग्रदृत्तिस्थितिीकलादिति दैवः । प्रख्या प्रख्याने प्रकाशनं, स हि सुखगुणस्य धर्मः । प्रवतिः प्रव्षनं व्यापारः, स हि रजोधर्ैः । स्थिति; स्थानं वरणं प्रतिबन्ध इति, स च तमोधमः । एवसीला हिं सत्वादयो गुणाः, चित्तं नच प्रस्यादिशीठं, तस्मात् त्रयाणां गुणानां परिणामश्चित्त भवितुमहति ॥
= अ (~
` तस्य च प्रष्यादिहैतोरपिद्धिमारोक्याह - प्रख्या स्वप हि चित्तसत्व. पिति । दिशब्दः प्रपिद्धावचोतना्थः 1 प्रतिद्धं हि कोके शाल्चे च स्वीव- भाक्तकत्वं चित्तस्य । चित्तमेव सवं चित्तत्वं सचप्रधानगुणपरिणामतात् ॥
अथवा अन्तप्ात्रियोगाम्यामनकदृत्ति रूथातिमात्रे च चित्त स्पष्ट दशयित शक्यत इति ब्रवीति - प्र्यास्वहूपं दहि चित्त्तस्वमिति ॥
समाधिपादः प्रथमः १९
[ भाष्यम् | रजस्तमोभ्यां संसृष्टम् रेशवर्यविषयप्रियं मवति । तत्तमसानुविद्धम् अधर्माज्ञनावेराग्यानेशर्योपगं भवति ।
तदेव प्रक्षीणमोहावरणें सर्वतः प्र्ेतमानमनुविद्धं रजोमात्रया धमेज्ञानवेराग्येशवयोपगं मवति । तदैव रजोठेशमरपितं स्वरूपप्रतिष्ं स्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धमेमेषध्यानोपगं भवति । तत् परं प्रसङ्ख्यान- मिाचक्षते ध्यायिनः ।
चितिशक्तिरपरिणामिनी अप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च|
[ विवरणम् | |
इदानीं वृत्तयो व्या्यायन्ते । तासां चनिकलं रजस्तमसोरुद्वामि-
भव्निमित्त विरुद्धये चेव्याह- रजस्तमोभ्यां संसृष्टे समप्रधानाम्यां यदा
सृष्टं तदनं देशरयव्रिषयप्रिये भवति ॥ प्रीतिः रागः, रेशवयैविषराग- युक्ता ृत्तयो भवन्तीत्य: ॥
तत्तमसानुविद्धं ॥ तदेव प्रख्यास्वरूपं चित्तं यदा गुणभूतरजस्केनो- द्मूतेन तमसानुषिद्ध, तदानामधम॑दि चतुष्ट्विषय। वृत्तयः छ्चिष्ट! जायन्ते ॥
तदेव प्रक्षीणमोदहावरणमिति ॥ न्यगमूततमस्कं तमःश्षयदिव जर्धरा- पगमादिव (परि) रविविम्बे सवतः प्रधोतमानं रजोमात्रया रजोर्रेन अनुविद्ध यदा तदा धमाद्युपगतं । घमौदिचतुष्टयविषया दृत्तये!$्किष्टा भवन्ति ॥
यदा तदेव रजो[ ठेश ]मरपितं स्वरूपप्रतिषठे केवलेन स्वेन प्रस्याः रूपेणावस्थितं, तदा सत्वपुरुष।न्यताख्यातिमात्रे मवति । सत्वं चित्तं पुरुप्रो भक्ता तयोरन्यता विविक्तता तत्ह्यातिः तद्वगमः, तन्मात्रग्रहणं ङ्ेशाघभावप्र- दसनार्थम् । षर्ममेषध्यानोपगं भवति धर्ममेधो नाम समापिः ॥
तदेव प्रस्यानत्रलाद्जस्तमसी तिरस्कृत्य केवटेन सयापयात्मना पुरुष- स्वरूपमात्रदरनिन अवस्थानं ध्याने प्रसंख्यानमिलयाचक्षते, ध्यायिनो योगिनः॥ | एवं वृत्तिखरूपे व्यस्यति ततनिरोधप्रदरीनार्थमाह-चित्त्चक्ति रित्यादि ॥ चितिरेव शक्तिः चितिशक्तिः । यथा पच्यादयः राक्तयः शक्तिमदपेक्षाप्रपणीय - जन्माने न स्वयंशक्तयः । चितिः पुन; स्वयमेव रक्तैः, ना्थान्तरमपेक्षते ।
१२ पातञ्जरयो गसूत्रभाष्यविवणे
[ भाष्यम् | सस्वगुणास्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिरिति ! अतस्तस्यां विरक्तं चित्ते तामपि ख्यातिं निर्णद्धि । तदवस्थं संस्कारों वरति । स॒ निर्बीजः समाधिः । न तत्र किचित् सेंप्रज्ञायत ईइलयतंप्रजञातः । (द्विविधः) स योगच्धित्तवृत्तिनिरोध इति ॥ २॥ [ विवरणम् । तेन॒ निव्यावस्थितव्वम् । चितिराब्दस्य चिन्मत्राभिधायिनः शक्तेशब्देन सामानाधिकरण्ये अविकृतरूपाया एव चितेर्विंषपिखप्रद दनाधेम् ॥ यस्मदिवमतोऽपरिणामिनी । व्यवस्थिते धर्मिणि धममीन्तरतिरोभविन धमान्तैरभ्रादुभोवः परिणामः । न परिणिमितुं शीरमस्या इत्यपरिणामिनी । अत एव अप्रतिपद्क्रमा, परिणामिन एव चित्तदिविषयादौ प्रति- सङ्क्रमदरोनात् ॥ | अत एव द्रितविषया दरितोऽन्तःकरणेन विषयोऽस्या इति । तेनैव शुद्धा । अत एव अनन्ता देशतः कारतश्च | पूर्पूवैमुत्तरस्योत्तरस्य हतेन र्व्यम् । वेधम्य॑दृ्टान्तः चित्तमिद्धिधाणि च । सत्वगुणास्मिका समेव गुणः सच्वगुणः तस्येवासा स्वरूपमवभासो यस्याः सेय सच्गुणासिका अव- भाप्तस्ख्पेयथः । वृष्यविरिष्टवृ्तिादया सलगुणाकिकेद्युच्यते ॥
यदि वा ख्यात्या संबध्यते स्यतिः सच्रगुणालिकेति । अतः चितिराक्तरुक्तलक्षणाया विपरीता विकुक्षणा विवेक्रद्यातिः परिणामादिमती ॥
यस्मात् पुरूप्रादुषृष्टात् परिणामादिगुणव्रिरहितान्िकृश परिामादि- गुणयुक्ता, अतः स्वरूपदोषददनात् तस्यां विरक्तं ` अपरक्तं तामपि रूयातिं आसनो निरुणद्धि ॥
तदवस्थं निरोधावस्थे, प्स्कोपग, संस्कारमात्रावरोषम् । निरुद्वाघ् वृत्तिषु ब्रत्तिजनिताः सर कारा एवावरिष्यन्ते । एतध्यां निरोधमूमो यः समाधिः स निर्बीजः । निगेतं बीजत्र छ्ेशादिनीजं सवैपुत्सनमस्मिननिति। तस्मादसंपज्ञात- समाधिकक्तणाथैमेव सूत्रमिपयुपसंदरति--स योगशचित्तधृत्तिनिरोध इति ॥२॥
क क ५ ४।
योगशचित्तदृत्तिनिरोष हव्युक्तं, तत्र वेद्धृलेनैव पुरुषतद्भावाधिगमः, विषयमूत्त्तिनिरोधे च विषयिणोऽपि बोद्धुः पुरुषस्य निरोधं कशचिदाशङ्कतापि, तथा च॒ सति तवैत्रह्यप्रा्ुपायस्यापि विवेकल्यतेरनर्कलं॑ मन्वीत
समाधिपादः प्रथमः १३
। भाष्यम् | तदवस्थे चेतसि स्वविषयामावात् बुद्धिबोधास्मा पुरुषः कि स्वभाव इति- | सूत्रम् | तद्। द्रद्ुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥ ( भाष्यम् |
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स्वरूपम्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिः, यथ। केवस्ये । व्युस्थानचित्ते तु सति तथापि भवन्ती न तथा ॥३॥
[ विवरणम् ]
योगानुरापनस्यापि तद तस्य॒ निष्फलं प्रतिपयेत, तस्पाप्पुरुषस्य वृत्ति- निरोधादनिरोधं दर्शीयितुकामः स्यातेश्वापि फर साक्षाददयन्नाह-- तदवस्थ चेतसीलयादि ॥ `
तदवस्ये--निरोधावस्थे । स्वविषयाभावात्--स्वविषयशित्तषृत्ति- स्तदभा(वे)वात् । बुद्धिबोधात्मा बुद्ध इत्तिरूपेण परिणतां बुध्यत इति बुद्धा पुरुषः । तद्वोधनमेव हि पुरुषस्य स्वं ख्पं, नान्यो बोद्धा, नान्यद्वोधनम् । बद्धश्च बोधनादन्यतये सति विक्रियात्मकता स्यात्। ततश्च दरितविषयत्वं च न स्यात् । तथा च करणान्तरापिक्षित्वे पुरुषस्य प्रसभ्येत । तस्माद्वोधन बोरू चोपचरितं तदृदृतिसारूप्येण । तया च वक्ष्यति-- द्रष्टा दश्चिमात्रः" इति ॥ तस्मादाह लुद्धिनोधनमेवत्मा खलूपं यस्य स बुद्धिवोधास पुरुषः रिस्वभावः फ नश्वरस्वमावः, सद्भाव वा रविस्वमावः;) कर्थं वा सद्धवर इति१॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽतरस्थानम् ॥ यदा निरुद्धा इत्तयः, स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिः। स्वर्पप्रतिष्ठेयधः । यथां कैवल्ये ॥ तदा सद्भावं तु न तत्स्वाभासे दृश्यतात्?2 इत्येवमादिना वक्ष्यति । तत्र सिद्धे सद्भावे तत आकृष्य प्रापतारङ्का- निव्ृर्यधमुच्यत--सवर्पर्रतष्ति ॥
धिद्धवद्थाख्यातं सूत्रम् । तत्रेदं प्रसक्तमितरत्र न स्वरूपप्रतिष्ठेति । अन्यथा हि तदेति व्रिरेषणानथक्यं स्यात् । न चेदन्यत्न स्वरूपप्रतिष्ठा तत्रावस्था- न्तरयोगात् परिणमि्वादिदोषः प्रापोतीति तत्परिजिदीषयाह --्युल्यानचित्ते तु सति तथ।पि भवन्तीति । [अनेन] अन्यत्रापि खर्पभ्रतिष्तं दर्शयति ॥
1. क-2. चू-20. 2. प~. त-19.
१४ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविरणे
[ भाष्यम् | ` केथं तिं ! दर्वितविषयतात्- | सूत्रम् | वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ ४ ॥ 7; [भष्यम् | | व्युत्थाने याधित्तवृत्तयः तदविरिषटवृत्तिः पुरषः। तथा च सूत्रम्-- (एकमेव दैनं स्यातिरेव दशनम् इति । [ विवरणम् |] न तथेव्यनेन तदेति विंशोषणस्याथवच्वं स्थापयति ॥ २ ॥ इतरस्तु तथपि मवन्तीलयनेन चेस्स्वरूपप्रतिषठत्वमुच्यते, न तयेति च स्वर्पप्रतिष्ठत्विपेधशवदेकस्य॒वस्तुनस्तथामावश्चातयामावश्च विरुष्यत इति वीक्षापनः पृच्छति-- कथं तहि इति ॥ इतर आह-- वृत्ति पाूप्यमितएत्रेति ॥ कस्मात् पुनदृत्तितारूप्यम् ? दरितविषयत्वात् ॥ उभयत्र स्वरूपप्रतिष्ठा. विरेषेऽपि इत्तिपारूप्यापतारूप्यकृते त्रिरेष इति, न तथामावातथामावविरोघः ॥ ननु च ब्ृत्तिसाषूप्ययोगे सति अवस्थान्तरयोगात् परिणमित्वादिदोषः रप्रोेव ] न । दर्चितविषथवेन परिडित्वात् । चिन्तदृस्यव्यरोपितं हि तव्; न स्वतः; स्फटिकाद्युपधानपरागवत् । उदुस्थ(न इति ॥ निरोधादन्यत्र याधित्तस्य छ्िशदयो वृत्तयः ताभिरविरिष्टा सदशी वृत्तिः स्वरूपमस्य, चित्तवृत्तिम्धतिरेकेण स्वरूपभ्यतिरेकेण च पुरुषस्य बृत्यभावात् , सदा ज्ञतविषयत्े परिणमानु- पपत्तश्च ॥ । ` तथा च पूरौचावैतूत्रम् एकमेव दशैन-ुद्धपुरुषयोः । किं तदित्याद--ख्य।तिरेव दीनम् । बुद्धिषृत्तिरेव दशैनम् । एयायते पुरुषेणेति च स्याति; सूयायतेऽनया च बुद्धिपुरूषयोः स्वरूपमिति स्यातिः । मैवा्थीकरेऽनया (कारतया) गृह्यत इति करणे, स्वेन च ल्यातिख्पेण गृह्यत इति कै च भवति | तथा द्यत इति देनं, इईथतेऽनेनेति च, [ज्ञायत इति ज्ञाने, | ज्ञायतेऽनेनेति च सपैमेवमादि द्र्टभ्यम् ॥ यत्तु खयातिकर्तृवे चित्तस्य तदेव ज्ञायते जानाति चेति (ज्ञानादितिचेति) ज्ञानान्तरकल्पनवैयथपरत्ग इति, तस्य "न त्तत्स्वाभासं दृश्यात्" इलतरैव परिदिरि वक्ष्यामः ॥
1. पञ्चाशिखाचाथसूत्रम् ` व्बह्लाचाय्छलम् ` ` ` 2.षा. 4.19. `:
समाधिपादः प्रथमः १५
[ भाष्यम् | (५ [> ( कु (9 क [१ ध [३ [चत्तमयस्कान्तमाणकटप पज्िषमत्रपकार ददयतवेन स्वं भवति
| विवरणम् | ननु च यदि चित्तपरिविजम्मितमेवेदं सवै पुरषशचेदुद(स्ते कथमसौ भोक्तेति? न--कारकवैचित्यात् । कानिचिद्याप्रियमाणानि कारकाणि, कानिचिद्यापारद्ते सनिधिमत्रेण कतृ तं प्रतिपघन्ते ॥ ।
यथा पचतीव्यधिश्रयणादिषु व्याप्रियमाणः पुरुषः कर्तेत्युच्यते । स्थाली सम्भवधारणाम्यामव्याप्रियमानेवर पचतीव्युच्यते । तथा स्थाखीमध्यणतमाकाश- मवकाद ददाति, न तस्य व्यापारं प्रतीमः ॥ ।
यथा च राजा दरौनमत्रेणेव कतं । सवणि च कारकाणि सेए ग्यापृरिषु कर्तृणि । न चादित्यः प्रकाशयन् करणान्तरमपक्षते, व्यप्रियते वा । न दि प्रकार- नमविध्यमानमुत्पादयति गमनादिषत् । प्रकादात्तैव हि तस्य सद्भावः, तथापि सन्निधिमात्रेण पटादीनां प्रकाशरूपेण अभिग्यक्तेः प्रक।शयतीध्युच्यते, एवमिहापि दृशिमत्रेण पुरुषेण दृरयानां चित्तवृत्तीनां चिदात्मना व्याप्यमानलरात् , द्रष्टा परुष इतीममर्थ दरीयति- चिनत्तमयस्कान्तमणिकल्पमिति ॥
यस्याप्यात्ममनस्संयोगात् ज्ञानमुत्पथते, तस्यापि ज्ञनिन ज्ञेय व्यप्नुवन्ात ज्ञातेद्युच्यते, न भ्यत्रियमाण ज्ञानम(स्या)पि गुणतस्रे स्ति निज्ियत्वादातन एवाथ दरयति । नपि क्रियानभ्युपगमात् जानातीषयादि नोपरपधते । ज्ञानेन हि ज्ञेये व्याप्नुवन् जान।तीद्युध्यते ॥
वि चान्यत्--आलममनस्संयेगादपर्वज्ञनोपत्तौ सत्यामासनस्तञ्ानं, न मनसः; । अतेव जानाति) न मन इति को हेतुमेवेत् ? अथापि स्यात्-- आत्मनः समवायिकारणत्वादिति । नैतद, असिद्धत्वात् । यथैव ज्ञानमासममन इति सोध्ये, एवमान एव समव।यिकारणच्वं न मनस इति साध्यम् , अन।मंस्वरूपत्वे सप्युभय्तयोगजलाम्युपगमात् ॥ ~
अथापि स्यात् -ज्ञानाहितसंस्कारस्यामनः|स्मत्येककर्तृखेन प्रतिसन्ध।न- दरीनादिति--न--तस्यापि साध्यत्वात्. । तत्रपि ज्ञानसंस्कारस्परतिप्रति- सन्धानादीन्यास्मन एव, न मनस इति साधनीयानि | फठेन -समानाश्रयत्वादि ष्छादीनामिति चेत्--न-- तत्रापि तुस्यत्वात् । पेयोगजल्े ` सल्याभनः फडच्छादीनि; न मनस इति दुःसाधमेव ॥ ४.
१६ पातञ्जरुग्रोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भष्यम् | पुरुषस्य स्वामिनः । तस्माचित्तव्रत्तिबोपे पुस्परस्यानादिः संबन्धो देतुः॥ ४॥ [ विवरणम् ] 1 कि चास्य ज्ञानस्यापि ज्ञेयखाम्युपगमादनवस्थाप्रसङ्गः । न हि ज्ञानमन्येन करणभूतेन ज्ञनेन विज्ञातुं शक्यं, तदप्यन्येन तदष्यन्येनेव्यनिषटप्रसङ्गात् ॥
अथानवस्थाप्रतङ्गपरिदाराय दुरमपि गत्व। ्िचिजञ््ञानमाघं वा ज्ञानन्तरेण न गृह्यते स्वयम(पनेव गृह्यत इति, तथा ज्ञानवद्र्धस्यापि स्वयं प्रहणप्रसङ्गः ॥
अथ दीपवत् स्वयमवभासते चावभासयति च अवभासासकतात् , भयेस्यानवमाप्तामकलाददोष इति चेत् - तथापि -प्रकारस्वरूपेषवयष विज्ञाने- नाप्रहणप्रसङ्गः ॥
अथ ज्ञानस्यालप्तमवेतत्वामास्तनरूपाम्यां स्वयं प्रहणे, बहिःप्रकाशा- तकानां तु ज्ञानविपरीतघमलाददोष इति चेव्- तच्च न- यदि चातसमवेतल्वं प्रकारात्मकलत्वै च ज्ञानस्य खयंप्रहण हेतुः स्यात् स्वै सवैज्ञाः प्राप्नुवन्ति ॥
अथ ब्राह्माकारखमपि कारणं चेत्--तच्च न ; अन्यस्य च्ञानस्यान्या- कारतया करणत्वे यथा, तथा ज्ञानस्यपि प्राह्मस्यन्याकरिणान्यदेव ज्ञानं करणं स्यात् , तथा चानवस्था दुष्परिहर ॥
किं चान्यत्--न हि कञ्चित् स्वयंग्राह्मप्राहकत्वप्रताधनाय दशन्तो विधते, प्रदीपस्यापि चक्षुरादिग्राद्यत्वात् । न वचाप्यंशाद्यमस्ति ज्ञानस्य, निरवयवत्वात् । सलपि चांशद्रये तयोः प्रकाडातमक्रत्वानन्योन्यग्राह्यप्राहकमावः प्रदीपयोखि द्योः ॥
किं चान्यत्- ज्ञानस्य प्राहयप्राहकलत्ाम्युपगमे सव्याससद्धबोऽपि दुस्तम्पाद एव । तस्मादर्थाकारज्ञानस्मृतिप्रतिसन्धानप्रयकतच्छादीनामनात्मधर्मत्व ्रा्यत्वात् रूपादीनामिव । पराथलवाच्च सद्धाताश्रयतवे रूपदिनिदरनेनैव । तथा आश्रयव्ादनिलतवाच्च प्रयतपूतैकत्वाेलेवमादिम्भोऽनासर्मतसिदिः ॥
अयस्कान्तमणिकस्पम् ॥ अयस्कन्तमणिरिव । यथा भयस्कान्तमणिरयसः स्वासन्यापिं प्रद्युपकरोति सन्निधिमात्रेण, तथा चित्तमपि चित्स्वरूपप्यासनः स्वालव्याप्तिं प्रष्युपकरोति दरयतेन ॥
समाधिपादः प्रथमः १७
. [ भाष्यम् | ताः पुननिरोद्धव्याः बहुले सति चित्तस्य - [ सूत्रम् | वृत्तयः पञ्चतय्यः इ्धिष्टाद्धि्टाः ॥ ५ ॥
[ भाष्यम् ] केशदेतुकाः कर्माशयप्रचये क्ेत्रीमूताः ड्िष्टाः । स्यातिविषया गुणाधिकारविगोधिन्योऽङ्ि्टः । हिषटप्रवाहपतिता अप्यङ्िष्टाः । [ विवरणम् |] नतेकीव दर्दितविषयत्वादन्तःकरणेनेव्यक्तम्- तत्र दरीयितृ्वं चित्तस्य, र्त्वं च पुरुषस्य रकिकृतम् १ स्वस्वापिखकृतम् । कथं पुनः स्वस्वामित्वम् ए वस्तुस्वभावलखात् । कथमिति वचेदुक्त- चित्तमयस्कान्तमणिकलमिति ॥ अय चित्तदृत्तीनां बधे को हेतुः पुरषप्येति? उच्यते - यस्मादेवं सन्निषिमाव्रोपकारि चित्तं ददयतवेन, तसमाचित्तवृत्तीनां चोप पुरुषस्य अयं हेतुः भवति, योऽसौ अनादिसम्बन्धः ॥ ४ ॥
ताः पुनर्निरोद्धब्याः बहुखेऽपि सति चित्तस्य यामिररत्तिभिः व्युत्थाने सारूप्यमुक्तं पुरुषस्य । कस्मात् पुनः निरोद्धन्या इ्याह-- यतो वृत्तयः डिषाहिषः ॥
ननु च बहुखे सति न शक्या निरोदघुमिदयत अ।ह--पञ्चतय्य इति । यद्यपि ह्िशङ्कि्टा इत्तयऽनन्ताः) तथपि प्तय्यः पश्चविधाः, पञ्चकरुखा एव । ततश्च पश्चप्रकारदृत्तिप्रतिपक्षमूताम्यास्तैराग्यप्रयोगदिव निरोधोपपत्तेः, प्रयवयवनिरोधस्ताधनाप्रयोनकलादरततीनां, तद्रहुत्वे न निरोधाराक्यलप्रसङ्ग; । ेशदेतुकाः--डेशनिमित्ताः । अविधादिपच्चङ्राभरयुकतं हि चित्त वृक्तिमिरात्मानं पुनः पुनरवेदयति । कर्मांशयप्रचये कमणि ठुरङक्रुशखविमिश्राणि तान्येव!ऽऽफट्प्रद नाच्छेरत इति करमाशयशब्दवाच्यानि, तेषं प्रचय इतेरेत्युण- प्रधानमविन संहननं, तस्मिन् कर्माशयप्रचये निमित्ते, अविचदिक्षेत्रीभूताः हष्टाश्रया इयर्थः । सर्तष हि ताघु कमौञ्ये विपाकाभिपुखीमवति ॥
स्यातिविषयाः-स्याव्यास्पदाः । गुणानां सखादीनाम् अधिकारः संस्कार्हृत्तिः तद्विरोधिन्यः । स्यतितरिषयघदिव ता अह्िष्टाः, अपवहितुप्वात् ॥
3
१८ पातञ्चछ्योगसूत्रभाग्यविवरणे
[ भाष्यम् | ङ्धि्च्िदरेष्वप्यह्किष्ठा भवन्ति । अद्किषच्छिद्रेषु ङ्धिष्टा इति | तथाजातीयकाः संस्कारा वृत्तिभिरेव क्रियन्ते । संस्करिशच वृत्तय इति । एवं वृत्तिधस्कार- चक्रमनिरमावतेते । तदेवं मूतं चित्तमवक्षिताधिकारमासकल्पेन व्यवतिष्ठते प्रख्यं वा गच्छतीति ॥ ५॥ ताः हिष्ट पचा वृत्तयः--
[ सूत्रम् | प्रमाणविपर्थयविकस्पनिद्रास्पृतयः ॥ ६ ॥ प्रतयक्षाचुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥
| विवर्णम् |
अथ हिष्टपङ्किमध्य(मानु)जन्मानोऽह्ष्टा वृत्तयः रवि हिष्ट एव क्षीरङुम्भग्रक्षिप्ताम्बुजिन्दुवत् ? एवमह्िष्टप्रवाहपतिता अपि ह्ि्ाः किमष्किष्टा एव ? कि चातः; यदि हिष्टप्रवाहगता अष्िष्टाः ङिष्टाः स्युः, तदा वृत्तिसस्का- रानुिधायिनी स्मृतिः, तदनुरूप एव व्यवहारः । स चपि न सिध्यति स्वरूपभ्यमिचरे । तस्मदाह- ्धिष्टच्छिदरेष्वप्यङ्किशः अष्टि एव भवन्ति । अ्धिषटरिद्रे अपि इह्टाः हिष्ठा ए । यसमदेवे तस्मात् तथाजातीयशाः संस्कारा वत्तिभिरेव क्रियन्ते ॥
यद्यपि ज्शादयोऽपि संस्कारमारभन्ते, तथापि वृत्तिद्ौरव तेषामपि संस्कार इति वृत्तिभिरेेव्येवकाराथः । तथा संस्कारेरपि वृत्तयः स्वानुरूपं कीयन्त इयेवं --वृत्तिसंस्कारचक्रमानेशमनवरतमावतेते । तदर्वभूत वत्त- एषं॑देतदेतमदृत्तिसंस्कारधमकम् । भवसित।पिकार- निदृत्तत्रियहितु- प्र(त्तकं देतुमात्रावस्यत्वात् । आसकस्पेन-पुरुषकल्पेन स्यातिमत्रेणेव कञ्चित्कारमवतिष्ठते- प्रारन्धप्तस्काररषाचुदृस्या । प्रख्यं ` वा गच्छति- सष्करवसानादिति ॥ ५ ॥
काः पुनस्ताः हिष्ट्वि्टाः पश्चप्रकार। वृत्तय इ्याह- प्रमाणविपथेथ- विकल्पनिद्रास्मृतय इति ॥
एतावत्य एव वृत्तयः । तत्र--प्रयक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ प्रमाणाह्या व्रत्तिक्िधैव भिघते | तत्र प्रभाणास्याया्चिततवृत्तेः प्रथमो मेदः
समाधिपादः प्रथमः १९
[ भष्यम् | इन्द्रियप्रणारिकया चित्तस्य ब्यवस्तूपरागत्तादषया समान्य. विरेष।सनोऽथेस्य विद्चषविषररणप्रघा्ना वत्तिः म्रक्ष प्रमाणम् । { विचरणम् ] प्रयक्षम् । अतस्तघ्वक्षणमेवाभिधीयते । तत्दूवकत्वात् भेदद्वयस्य ॥ इन्द्रिय- प्रनाडिकया ॥ इन्दियमिति श्रोत्रादिपञ्चकं न कर्मन्धिये, तस्य चित्वरच्यदेतुत्वात् | क्रियाथ हि तत् । तस्मादिन्धियशब्दस्य सामान्याथसेऽपि चित्तवृत्तेरपन्या- चिस्या्िततच्छत्रादिविष्रयतेव । वृ्यधत्वाच श्रोत्रादीनाम् | इन्दियमव प्रनाडिक्। दारं शब्दाद्याकापवरत्तिरूपेण परिणपमानस्य चित्तस्य । अतस्तत् तेनेन्द्ियद्मारेण सामान्यविरोषासकवाह्यवस्त्वराकारतया परिणममानपुपरज्यते | तस्य तदुपरागद्धेतोः चित्तस्य या सुदराप्रतिपुद्रावत् वृत्तिः सामान्यविरोषा्मकवस्तूपरागेऽपि
विशेष वधारणप्रधाना सेव्.प्रयक्चं प्रमाणम् ॥
अथ स्वविषरयसतामान्यविरोषावभासन सामर्थ्य शर ्रादीनां चित्तस्य च विकृतं विंरोषावधारणप्राधान्यमिति £
उच्यते--विरोषग्रतिबन्धत्वात् हनेपादानादीनां विरोषावधारणप्रघान-
नतेति (तेव्याह) | न सामान्यं नावधार्यते, गुणभूतं तु गृह्यत. एव । यथा नीं
रूपमिति नीखवधारणप्राघन्ये स्व्यपि रूपमेव नीलमिति गुणभूतमतवरध।रयति । कक
तथा दुःखशन्दः घुखरन्दा मूढः रान्द इत | तथा च वतराब्रव्रधारणप्रघाना इत्तिरिति ह्यपप्यते ॥
४४
कि च--संशयत्रिपयेयनिमित्तत्वच सामान्यापट्ग्धेः । सामान्ये द्युपरन्धे बुभुस्तितविरेषस्य संशयो जायते, .समुपडन्धसमान्यान्यस्मृतेवां _ विपर्ययः, >
समधिगतविशेषस्य तु संशयविपर्ययौ न स्वितिमुपदनुवति, इति विजेषावधारण-+ प्रधानतेच्यते ॥ ^:
यत्रपि सामान्यमेवावदिधारयिषितं नैरिति बा अश्न इति वा, तत्रप्यन्यतरपस्ियिगेनन्यतरावधारणेति विङ्ेषावधारणप्रधानतैव । सवमेव हिं वस्तु वस्त्वन्तरपेक्षया सामान्यं विरोषश्च ॥ ,
यस्य॒ पुनः सामान्यमवस्तध्यारोपितमेवेोषरामबुवत् › नेन्दिय- ्िषयपरिति, . तस्य प्रतिनियतस्तामान्या्यारोपणानुपपत्तिः । न द्यनुपरन्धपृषै-
२० पातञ्जख्योगसुत्रभाष्यविवरणे
मुख्ये संभवद्यध्यारोपणा, स्मृ्यसंभवात् । न कदाचददृष्टमुख्येदकस्य सलिलखध्यारोपणमूष्र्र विधते । अथास्मरनप्यध्यारोपयत् रूपस्ठक्नणे शब्दला- चप्य्यस्येत् । अथेन्धिान्तरविषयघलादरूपस्वक्षणे रान्दत्वाचप्यासो विरुद्ध इति चेत्---अवस्तुत्रे सद्यविरोषात् । विरोषाभ्युपगमे च वस्तुत्प्रसङ्गः | राब्दस्वलक्षणादिव खूपस्वरक्षणस्य ॥
0 (५
वि चान्यत्ू-देशकालान्यविशिषटप्रयक्षा [न] भ्युपगमे समस्तरोक- प्यवहारव्रिछापः स्यात् । न हीदमहममुभिन्नवकारो कलि चास्मिनदरक्षमे- तस्मानिपित्तादेवंविशेषणमिति च स्पृद्युपपत्तिः | न च प्रयक्षाष््टेषु विरोष्यवद्धिरोषणेइ स्मृतिः समवति । न च कल्पन।पोढेन व्यवहारगोचरातीतेन व्यवेहरमाणो दृयते । तस्म्ठोकप्रसिद्धप्रयक्षानुस्तरणमेव न्याय्यम् ॥
नतु च योगिनां नि्िकल्पसमाधिजं ददनं, तस्यनिवंखक्षणत्वात्, तथा पुखरागादि विज्ञानस्य चनिन्दियत्रनाडीन्पू्लात् प्रमाणान्तसत्वमम्युपेत्यं, प्रयक्षत्व वा वक्तन्यम् । उच्यते । प्रक्षस्य (न प्रमाणस्य) पुरषप्रल्ययपेक्षत्वेन परिहृतलात् । न ॒दह्यप्रस्यया वृत्तिः प्रत्यक्षम् | चैतन्योदयहेतोय सप्र्ययायाः रत्यक्षत्म् । तथा चाह-- "फर तदतिशिष्टः वौस्पेयश्चिततवृत्तिबोध' इति ॥ एवे च सति घुखरणादिज्ञानस्य शछिष्टाङ्किष्टूपस्य तदविशिष्टपुरषभ्रव्ययफठ- वसानतात् प्रत्यक्षता सिद्धैव ॥
# अत्रेदमवधेयम्---
आदशकेोशे २० 'प्रनाडी?” इव्येतदुपरे २५ “°नपेक्षय सम्बन्धः सम्बन्धत।- मियात् । यदसो प्रसिद्धधचोच्यते य इति” इत्युपक्रम्य ३४ ^स्मृत्यवसाना हि स, यतः प्रमा इत्यन्तम्रन्थं दशभिः पुदैर्विलिख्य, तदुपरि २० (प्पूवस्वात् प्रमाणान्तर- त्वममभ्युपेतव्ये, प्रत्यक्षत्व वा वक्तव्यम् इर्युपक्रम्य २५ ("तस्मात् प्रमाणफरान- भिज्ञानाम् अभिमानमत्रमेव फवरं पण्डितंमन्यानामिद्युपेक्षणीयमिति? इत्यन्तं षड्मिः पुटेविकिख्य, ततः २५ (८अनुमानमयोत्यतेः” इस्यादि २५ “कः सम्बन्धः) कयोर्वा, न दि सखम्बन्धिनावः> इल्यन्तं विलिख्य पङ्क्ति चतुष्टयेन, ततः ३४ गेन पत्रध्यते, अभूता्थादिविषयत्वात्?' इव्यादिवास्यं लिखितं दृश्यते । कोशान्तरञ्च न लभ्यते । यथामात्रं सुद्रणे च वाक्यानामनन्वयः--न हि २० (भ्रनाडीः इत्यनेन २५ “ध्नेक्षय सम्बन्धः सम्बन्धतामियात् " हत्यन्वेति । न॒ च २५ “कः सम्बन्धः कयोर्वा, न हि सम्बान्धिनावः इलयनेन ३४ “गैन प्रवाध्यतेः इति चान्वेति । एवे प्रसयक्षप्रमाणानैरूपणमुपक्रम्य तदपरिसपाप्यैव मध्येऽनुमानाग- मप्रमाणयोनिरूपणं; ततो विपर्ययनिरूपणं, पुनः प्रयक्षप्रमाणनिरूपण्शेषः; ततः
समाधिपादः प्रथमः २१
इन्दियप्रनाडिकाम्रहणं रोकिकप्रव्यक्षोद्धवानु्बाद एव । अन्यथा. हीन्दियनिरपेक्षस्य योगीश्वरयेज्गानस्याप्रत्यक्षता स्यात् । असि हि रादि प्रतिबन्धाभवे सवर्थेन वैत्तसचेन स्वविषयेण युगपत्सक्ष्मम्यवाहितादिम्रहणम् । तथा चाह--तारकं सर्वविषयं" सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्” इति । तस्मानाव्रधायैते इन्दरियप्रनाडिक्येवेति |
बह्यवस्तुपरागादिति विपथयनिदृ्यर्थम् । विशोषावधारणप्रधानत्रेन सरार्यनिबरत्तिरिति ॥
तत्र केषांचित् फं तदेव प्रमाणम् । अपरेषां तु प्रमाणादन्यत्(्र) प्रमाणन्यक्तयन्तरम् (रे) । यथा घटविज्ञानस्य प्रमाणस्य हानोपादनेपिक्षा- बुद्धयः फरमिति । गुणदेप्रतदुभय(बदमव)दून्यत्वविषयत्रदुपादानादिवुद्धीनां प्रमाणभूतघटविज्ञाना!दलन्तमेदः । ततश्वान्यविषयस्य प्रमाणस्य अन्य(प्रमेयस्य). विषयप्रमाण(गे)ग्यक््यन्तरं (रे)फङ्मिति ॥
न हि खदिरच्छेदनस्य खदिरोपादार्मे तत्परियागो वा फट भवितुं यक्तम् । त्रि(अपि)योगसवन्धफलठत्रात् स्वागोपादानयोः । न च फलस्य फं सम्भवति | द्वैषीमावफलन्यवहितताच ॥
किं च-फलस्य चेत फं क्रियानपेक्षाप्रसङ्गः । फलार्थं हि क्रियपेक्ष्यते | तच्चत्फटं विनापि त्रियया फलदपि सिध्यति, (अतेद्य) ततो न ह्यनेकायासपिक्षित- निष्पत्तिक्रियामनुतिष्ठेत् । साधनान्वेषणानुपपत्तिश्च । क्रियाया अभावात् ॥
अनुमाननिरूपणोपक्रमः, ततो विपययनिरूपणदषश्च इति क्रमः आदद्चकोशे दश्यते । न चायं क्रमः शोभते | ““अनिन्दरियप्रनाडी पूर्वात् प्रमाणान्तरत्वमभ्युपे- तव्यम्?” इति; दरापुरव्यवहितवाक्यद्वयस्य मियो योजने, "न दि सम्बन्धिनाव- नपेक्ष्य सम्ब्रःधः सम्ब्न्धतामियात्, इति, षोडश पुटव्यवहितवाक्यद्वयस्य मिथो योजने, ^“स्मर्यमाणातद्वस्तुप्रतिष्त्वान्न प्रमाणे, समृस्यवसाना हि सा, यतः प्रमा णेन प्रबाध्यते । अभूतायांदिविषयत्वात् इति च षटू पुटग्यवहितवाक्यद्वयस्य मियो योजने चन्विति । यथाक्रम प्रमाणत्रेयनिंरूपणं, ततो विपर्ययनिरूपणमिति च सूत्रानुसारी माष्यानुसारौ च क्रमोऽनुखतेा मवति, इति प्यारोच्य महता प्रयासेन मातृका्रनथवाक्यानां सखन्निवेशविपर्याखः कृतः । तश्र सूक्ष्मेक्षिकया गुणदोषौ परिशीलनीयो । “प्रनाडी?? इ्यादेरधः अङ्किता; (२०-२५-३४) इति पुरसद्धुधाः मुदधिवितत्कोशानुखारिण्यः ॥ 1. उ-पा-तू-54,
२२ पातञ्चल्योगसूत्नभाष्या्ैवरणे
[ भाष्यम् | फ़ठं तदविर्िष्टः पौरषेयधित्तवृत्तिोधः ॥
[ विवरणम् | नापि क्रियैव फटे, क्रियानुपरमप्रसङ्ग।त् ! फङावसाना हि (पि) क्रिया ।
निप
क्रयायाश्च फटत्वे फठनाभलावित्वग्रतङ्खः । तस्या दुःखात् ॥
तस्मान प्रमाणस्वरहपमेव फम्, नापि तव्यतिरिक्तप्रमाणान्तरमिलयाह-- फर तदविशिष्ट इलादि । तद विशिष्टः तया प्रपाणाल्यया वृत्या अविरिष्टः तुल्यः तदाकास्वन, पौरुषेयः पुरषस्याये बोध इति । पुरुषस्य हि वृत्याकारता तसमाननाक्रियाजं द्रव्यस्वरूपमात्र फलम् । फ तर्हि £ द्रव्यस्येवावस्यान्तरविरेषः (घोक्रियाजः(ज))त्रियापरयैवक्तान क्राः क्रियोपरमोपपत्तः फलम् .। फक- निष्पत्तावव हि करियोपरम उपपद्यते । एवंभूतस्य मुख्यफल्ते प्रधानक्रिया न्यवहित(विप्रकृष्टायाः)क्रियाया द्वन्वे द्रव्यस्य त्रा क्रिया फलमिस्यन्योन्यध्रद्युप- स्थापकवेन प्रधानफलामियुखीकरणात् फङ्योपचशि न विरस्स्यते ॥
ननु च भवतोऽप्युपचरितमेव फलम् वृ्यविशिष्टताया; फएलवेनाम्यु- पगमात् , पुरुषस्य च शुद्धात् , तदाकारताया अनृतव्वम् । न हि सफटिक- मणेरल्क्तकोपधानाकारता पत्या ॥
ब्राढम्-- तथपि वेतदेव फठं -मुख्यम् , दृष्टवत् । मुख्यफढान्तरा- दर्शनात् । सर्वस्यैव क्रियाकार्कजातस्यैतत्लर्थत्वात् । एतदवतानं हि तत्सम् | तथा च प्रदरदितम् ॥
ननु च मिष्याभूतस्यैव पुरूयफट्तवै बत्याकारस्य, तथा च तद्मिला- पानुपपत्तिः । बाढम्--मिध्यामूत ए ब्रसनुगतो भोगः । तथा चाह--« सत्व- . पुरष'योरयन्तासकीणेयोः प्रययािरेषो मोगः इति ॥ मष्यमपि-- “तयोः घदू्पोपरम्भे सति कुत भागः इति ॥ अत एव च सम्यम्दरना- दाद्यान्तकी नन्रात्तर्पपदत ॥
येषामामेध्या फट, तेषां वैराग्यकारणाभावात् सम्यादशनन्वेषणानुपपत्ते- श्तामावः | न च क्रियप्ररिनिष्पयो मोक्षः, अनिलयलग्र्ङ्गात् ॥
--- ~~~ --~~-~-]~-~-~-~-~-~--~-~---~~--~-~~-~-~--~-~_ 1, पा-३-प्-3; -
2. इदानीन्तनमुद्वितपुस्तके इद भाष्यं नोपरभ्यते ॥
समाधिपादः प्रथमः २३
[ भाष्यम् | प्रतिसंवेदी [बुद्धः] पुरष इत्युपरित् पप्रवेदयिष्यामः । [ विवरणम् | अथ बुद्धिवेदर्वं पुरुषस्य स्वं चतिद्धमिति चेत् आह- प्रतिसंवेदी ् [क [क ( बुद्धः पुरुष दद्युपरिष्टत् प्रवेदयिष्याम इति ॥ ये चपीन्दिया्थसनिकषस्य प्रलक्षत्वमम्युपयन्ति, न तेषामपि सम्यगभ्यु- पेतं, सान्निकषस्य क्रियफल्लात् । सन्निकषश्च संयोगः | स च क्रियाजस्तैरिष्यते | यतो यदुपजायत तत्तस्य प्रमाणम् । तच्च तस्य फं यदुपजायते ॥ फरुमपि सनिकर्षी ज्ञानं प्रति प्रमाणमिति चेत्-- तच्च न-ज्ञापक- प्रमाणप्रस्तवि कारकप्रमाणेपन्याप्स्यागुक्तत्वात् । सनिकी हि ज्ञानस्योत्पादको न तस्य ज्ञापकः | प्रमेयाधिगमाय हि प्रयक्षादीन्युपन्यस्तानि, न ज्ञानोत्पत्ति- कारणम् । तद्यक्रियायाम८यान्य)प्रकृत प्रक्रियत ॥ अथापि स्यात्--ज्ञानस्यापि प्रमेयलत्तचप्युत्पवमानं श्रमीयत इति, तदुत्पत्तिकारणस्य सन्निकर्षस्य ज्ञापकत्वमेवेति- तच्च न--ज्ञानं ज्ञनिनैव ज्ञायेत, तेषां तथम्युपगमात् | न च सन्निकर्षो ज्ञानम् । ज्ञनोत्पादकत्वेनाम्युपगमात् ॥ अथ ज्ञानस्य ज्ञने सन्निवर्भो निमित्तात् प्रमाणमिति चेदद्शेश्वरेच्छ. विषयनिमेषोन्मेषादीनामपि निमित्तत्वात् प्रमाणत्वे कः प्रद्ेषः? न च ज्ञानस्य ज्ञेयत्वे आलमनश्च स्वभावचिद्रुपत्वानम्यु पगमे राक्या अनवस्था परिदतुम् ॥ अथ आलप्तमवेतमात्रतयैव ज्ञानस्य ज्ञेयता, न ज्ञानान्तरमपेक्ष्यते -येनातिप्रस्तज्येतेति चेत्--अस्याप्यन्यत् प्र्क्षलक्षणं वाच्यम् अनिन्द्ियसनि- कर्षीदिलक्षणत्वादासनि ` ज्ञनसमवायलस्य । सजिकरस्य च ज्ञानोत्पत्तिफट्वात्त- दुतत्तिन्यवधाने सति तस्य ज्ञानेन ननन्तयम् ॥ . तस्मात्तदानन्तर्येणापि. न सन्निकधफल्से ज्ञानस्य । तया हानादिवुदधौ- -नामपि रूपादिज्ञानफल्तवानुपपत्तिरुक्ता ॥
ग्यमिचाराच । यंथेकसिमननङ्ग नादिपिण्डविषये ज्ञाने समाने बहूनामु्ने कस्यचिदुपादाननुद्धिः, अन्यस्य हेयबुद्धिः, कस्यचचिदुभयाभावः; तत्र हानोपादानबुद्धिभ्य॑भिचरति । अन्यतस्रैकमेव ज्ञानं॑तदेवोभये व्यभिचरत्युपे | क्षकस्य । यच्च यदयभिचरति न तत्तस्य फलम् ॥
1. उपपादयिष्याम इति सुद्वितपुस्तके पाठः । ` 1. उपपादयिष्याम इति मुद्रितपुस्तके पठः । `` ` 7
२४ पातञ्जरयोगसूुत्रभाष्यविवरणे
किं च- हानेपादनामावमात्र्वादमाव एवोपेक्षा । न चामावः प्रमाणस्य वस्तुनः फठं भवितुमर्हति । रागदेषाम्यां चोपादानपच्िगबुद्धी । तदभावात् कारणाभवे कार्यामाव इति प्रमाणविज्ञने सल्यपिं हानोपादान्ुद्धयभाव
न अ न
एवेपेक्षेति व्यभिचारान हानादिवुद्धिफल्त्वम् ॥
किं च-रागदवेषतदभवनामप्युपादानादिवरुद्धिफरवे प्रमाणलप्रसन्नः । पौरुप्रयचित्तवृत्तिबोधफल्ते तु न किश्चिद्धिरुष्यत इति ॥
ननु च चित्तवृत्तेः सवेत्वमतिद्धम् । न हि करणमेव कर्म मवति । न हि दात्रमेव द्यते । नेष दोषः । क्रियाकारकयेर्भिन्नघपतवात् । करियानिरशृत्ति प्रति सम्भूय क।रकामि ग्याप्रियन्ते परस्परं विषयविषयिमविन । क्रिया तु सत्तामत्रेव॒ फर्ेतुरिति करणत्वमस्यापुपच्यैते, न कारक्वत् । कुर्बदि
0 0
कारयेदिति क्रियाधि कारकं स्यान्न मूते भन्यायोपदिश्येत ॥
किं च--अनवस्थाप्रसङ्गश्च । क्रिया चेत् करणे स्यात् , तनिर्वर््यया चान्यया क्रियय। भवितन्यम् | न हयन्यां क्रियामन्तरेण तस्याः कारणत्व घटते | यापि चान्या तापि कारणं स्यादन्यस्याः क्रियायाः । साप्यन्यस्या इत्यनवस्था । ततश्च क्रियासन्तानानुपरमात् फछानमिनिङत्तिः । तत्रान्या चेत् क्रियान्तरेण विना फलडेतुभवेत् ; प्रथमस्य तथाते कः प्रद्वेषः? चित्तवृत्तेस्छभिन्यञ्चकत्ात् सवेध्तेदयदोषः ॥
टृदयते चाभिन्यञ्नकानां स्वरूपसंवेधतेयेव करणत्वं प्रदीपादीनाम् । तथा चित्तवृत्तपि । चक्षुरादिष्वभिभ्यञ्ञकतेऽपि अग्रहणाद्यमिच।र इति चेत्, समान (चेतनसमान) जातीयस्तकरात् कथम् ॥
येषां तावद्धोतिकानीन्दियाणि, तेषां चक्षुषतैजप्ततात् बद्यिनारेकेन तुल्यजातीयेन व्यतिभेदात् गृद्यमाणदस्यैवाविवेकः । यथा प्रदीपानां बहूनां प्रभाव्यतिमेदात् कस्य का प्रभेति न विविच्यते । तथा प्रोत्रदिष्वपि ॥
येषामप्यमोतिकानि, तेपष्रामप्यमिग्यञ्चकविन समानजातीयत। इृत्तेरमि- व्यञ्ञकत्वाद्प्रहणमिति । तन्न - -प्रा्तचैतन्योपग्रहतयाऽविभाग्यत्वादग्यवषहि- तत्वा । सर्वेगतल्रेऽध्यात्मनः सूदषमतेन स्वच्छतर्वेन च चित्तिनान्यवधानाचच ग्रहणं चित्तवृततेस्तस्माचिततवृत्िप्रमाणेनैव तद्।कारतया पौरुषेयोऽपि बोधः सवेधमान एव फलमिति सिद्धम् ॥
समाधिपादः प्रथमः २५
[ भाष्यम् } अनुमेयस्य तुस्यजातीयेष्वसुवृत्तो भिन्नजातीयेभ्यो व्यावृत्तः सम्बन्धो य [ विवरणम् । येषां पुनः प्रवयक्षेणासंवेवा चित्तवृत्तिस्तेषां फलटग्रहणप्रमाणाभावः ! फले च गृहीति ज्ञानापिद्धवस्यार्थापत्तिः । न च फर गृह्यते प्रमाणव्यापारानमभ्यु- पगमात् । तदभ्युपगमे चानवस्थप्रसङ्गः | यत्कटवग्रहणाय प्रमाणमम्युपगम्यते तस्याप्यन्यत् फं तद्रमाणस्याप्यन्यदिति न कचिदवतिषटेत ॥
अथ न प्रमाणन्यापारस्तस्य तदा प्रमाणाभावात् फलस्याप्चं प्रसक्तम् । यत्र हि सदुपरम्भकानि प्रमाणानि न व्यापारं गच्छन्ति, तन्नास्तीव्यभ्युपगच्छामः (तेषम्) ॥
अथ अगृह्यमाणमपि तदेव ज्ञानं प्रमाणं फङस्यपीति चेत्-न-- अभिभ्यज्ञकधमयतिक्रमात् । न द्यमिन्यज्ञकं गृह्यमाणमभिन्यञ्चयदृदृष्टम् । न हयल्फा गिरिशिखेऽपरि निजं धर्ममतिक्रामति ॥
अथाभिव्यज्यदेव फरं प्रत्यपि प्रमाणमिति चेत्- पिद तर्हीप्सितम- स्माकम् | रागादीनां वृत्तिविरेषणव्वेन ग्रहणोपपत्तेः । रक्तोऽहं दिष्टोऽहमिति यहेप्र्यर्यविरोषणं, तदपि वृत्तिमावामाविधेनेव प्रहणादृत्तिविराषणानां रागादीनां प्रहणपुपपचते । अ८ तेनप)न्यथा सूपादिवन्मानान्तरपेक्षवप्रसङ्गात् । ततश्च नवस्थति ॥
तस्ल्ममाणफलनमिज्ञानाममिमानमात्रमेवर केवरं पण्डितंमन्याना- मि्युपेक्षणीयमिति ॥
अनुमानमयोच्यते--अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वनुवृत्त इति । अनुमेयस्य [जिज्ञतितरमविशिष्टस्य । तद्धमेव्रत्तपा तुर्यजातीयेष्वमुवत्त सद्धावमत्रेण, [भिन्नजातीयेम्यः] तदिरुद्धधमकेभ्यो व्यावृत्तः तेष्वसन् इव्यर्थः | सम्बन्ध इति । कः सम्बन्धः ? कथोवा £ न हि सम्बन्धिनावनयेक्षय सम्बन्धः सम्बन्धतापरियात् , यदसौ प्रिद्धवच्चोच्यते ध्यः इति ॥
ननु च अनुमानस्य प्रकृतवात्, खिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धः प्रसिद्ध एव- न--अगमक्लात् । न केवलः सम्बन्धो गमकः । उच्यते-- लिङ्गस्य सम्बन्धो व्यावृत्यनुवृ्योः । कः पुनरसौ? लिङ्गमेव । न हि लिङ्गादन्यदनुदत्तं व्यावृत्तं च । तच्च गमकम् । ननु टिङ्गमपि नैव गमकं 4
२६ पातञ्जलयेगसूत्नभाष्यनिवरणे
[ भाष्यम् | तद्विषया सामन्यावधारणप्रधाना वृत्तिरनुमानम् । यथा देशान्तरपरति्ति- मचन्द्रतारकं चैत्रवत् । [ विवरणम् | लिङ्गिसम्बन्धानपेक्ष, यदि चानपेक्षितलिङ्गटिङ्गिसम्बन्धं गमकं, यकिश्चिद्रमकं स्यात् , तस्मात् लिङ्ग लिङ्गिसम्बन्धो वक्तव्यः || न-- उक्तात् ॥ अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वदुवृत्तः' ह्यादिनैवोक्त- त्वात् । न द्यसुमेयेनासंबद्धं खिद्धिना तस्सद्शजातीयेष्वनुवरतेते, मिन्नजातीयेम्यो वा निवतेते | तस्मात् य ईति च प्रसिद्धमेव सेवन्धमनवदति ॥ तदविषया--एमन्वयन्यतिरेकविशिष्टसंवन्धसंबन्धिविषया वृत्तिः । सामान्यावधारणप्रधाना--टङ्गपामान्यविध।रणग्रघाना, अनुमनिम् ॥ यथा देशन्तपाि्मतिमचन्द्रतारकं चैत्रवदिति ॥ यथपि रक्षणाभि- धानमात्रेण तदभिव्यक्तिः, तयाप्युदाहरणप्रदयुदाहरणप्रदरन।दतितरमिध्युदाहरण- : म्रतिपादनम् । तत्र गतिमचन्द्रतारकमिति चन्द्रतारकस्य गतिमच्रमुमेयम् । तत्समानजातष्वनुद्त्ता देशान्तरश्राततिगेतिमल्ु चैत्रदिषु, भिज्लजार्तयिम्यश्च- गतिभ्यो विन्ध्यादिम्यो व्यादत्ते अभ्यमिचरन्तौ । निलयं गतिमता ` संबन्धात् ॥
तस्मादिस्यजातीयकमविनामविन सद्धं संबन्ध्यन्तं गमयति | यथा वध्यघातक(कृदि)क्रथिकारणादि ॥
भव्रतु तवदविरद्धानां निलरसंबन्धादश।न्तसष्यादीनां गम्यगषकत।, वध्यघातकादीनां तु सेबन्धाभवे कथमिन्युच्यते गम्यगमकभावः (भवेन)
तत्रापि निदल्यसं्रन्धाददोषः । न हयन्यत्रापि प्रा्िलन्नणः संबन्धोऽभि- प्रयते । सामान्यते दृष्टा(तु)भावप्रसङ्गात् । न हि चन्द्रतारकादि देशान्तरभरतः परा्तिरक्षणप्तबन्धः प्रयक्षेण गृह्यते । अगृह्यमाणश्चेद्रमकः सव सवस्य गमकं सय्रात् । न हि किचिक्केनचिदतबरद्म् ,` आकाशादीनां सर्वत्र मावात् ॥
तस्माद्वम्यगमकबुद्ध युप्पत्तिहेठरेव संबन्धोऽनुमानविषये । तथा च वध्यघातकंयोरपि अन्यतर(रा)भवदरोनेऽन्यतराभावो गम्यत ॒इत्यनुमानमेव । यस्याप्युचिते देसे अमावदश॑नादन्यत्र भवो गम्यते ! यथा घतकदरनेन वध्याभावोऽनुमौयते ।- चत्रस्य जीवतो - गृहैः जमव(गृह्यभाव)दरोने बहिभावश्चेति ॥
समाधिपादः प्रथमः २७
ननु चामावार्थापत्ती एते, नानुमाने, (न) लक्षणापतङ्गतः, गवादिवत् ॥
भ, (०
न--यथोक्तखक्षणोपपत्तेः-- वध्यधातकयेर्विरोपलक्षणः संवन्धः । यत्र यत्र॒ -घातकमभावस्तत्र तत्र वध्यामाव एतरे्विनाभावः | न हि वेच्यस्याभावं घातक(का)मावो व्यभिचरति । वध्यस्य वा मात्रो घातका(क)मावम् , अग्निभावमिव धूममावः ॥
कथं पुनरवगम्यते घातकमावदर्यैनदिव तद्भोचरे वध्यस्यामावनरुद्धिरिति ? न पुनः सदुपलम्भकप्रमाणानां घातक्त इव वध्ये व्यापाराभावादिति ॥
उच्यते- घ।तकभवे ग्याप्रू(्यब्र)तग्रमाणल्येव वध्यामावनरुध्युव्पत्तिः) धूमभवे व्य्रू्)तग्रमाणस्येव ग्निभावबुध्युसत्तिः, तथा धातकविेष- न्यप्ू(वृ)तप्रमाणस्य वध्यविरेषाभावबुब्युत्पत्तिः, धूमवरिरोषव्याप्र(रु)त्रमणस्य- वाग्निविरेषघुद्विरिति ॥
अभावप्रमाणवादिनस्तु सवत्र प्रमाणाभावस्याविशिष्टघाद्विरोधिविरोष- दर्नानुविधानं विरेष्यन्तरामावदशनस्यानुपपन्न, लिङ्गविशोषानुविधानमिवं दिङ्गिविरेषदशंनस्य | न हि प्दुपलम्भकप्रमाणव्यापारामावस्य कश्चिद्विशेषः, येन विरेषबुद्धिसतदविचेषरमनुविधीयते ॥
अथ जिज्ञा्षिति विरोषे सदुपरम्भकग्रमाणामावादिति चेत्-तन-- अततः स्पतीच्छदिसहभावपिक्षादुपपत्तेः । न ्यप्तत् सहायपेक्षया कार्यं निवैर्तयदृष््टं शराविषाणादि । दृ्टमिदेति चेत्--न विप्रतिपत्तिस्थानतव दृष्टान्ताभावात् । तस्यमिति चेत्--न--घट देः सतोेक्षादशनात् ॥
५
न चापि निन्यौपारस्यावस्तुतादभाव्रस्य प्रमाणमबो युक्तः| न हि निरस्तन्यापारकं किचित् का्यीरम्भकं दृदयते रोके । तस्माद्यापारख्पप्रमाण- जनिता प्रमेयामवबुद्धिः, प्रमेयविषयत्वात् धटादिबुद्धिवत् । तथा च वस्तुघ्वात् ्रृत्तिनिवृत्तहेतुलात् । विपक्षः दाशक्षिणादिः । तथा अभव[प्रमा]प्रमाणा(ग) भावजनिता न भवति, यथाऽभिहितहेतुद््टान्तदशीनात् । (नेन) ॥
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धातकददोने वध्यामावबुद्धरजिङ्गं तद्धावमावित्वादगन्यादि्ुद्धिनिमित्तधूमादि बुद्धिवत् संशयनिवर्तकलाच्च । वध्यामावदुद्धिवा रिद्गजनिता निश्वयरूपत्वादभि- बुद्धिवदिति ॥
२८ पातञ्ञखयोगसूत्रमाष्यविवरणे
इह घटो नास्तीति किर नानुमानं लिङ्गटिङ्गिसत्रन्धाग्रहणात् | न हि यधाऽनन्यादिबुदधेषूमादिलिद्ग न्वेपरण तथेह नास्ति षट इत्र लिद्गन्वेषणमत्ि । प्रगेव लिङ्ग न्वेषणात् बुच्युत्पत्तः ॥
| नैष दोषः । इहभ्रत्ययाकार्स्यैव लिङ्गत्वात् । न हि प्रथममेव चिद्गवुध्युपजनने सति लिङ्गन्वेषणं मवति । दृहेव्याक्रारोपरन्निता बुद्धिर्छिंङ्गम् उभुपरञ्ञकव्यतिस्तिवटाचभावबुद्धेधोतकबुद्धिवदेव । विरोधलक्षण ए चात्रापि सम्बन्वः ॥
यत्र पुनरविरद्धान्युपरज्ञकानि तत्रास्तितब्ुद्धेः । एतेनेवाथापत्तरमुमानले न्य।द्धातमविनाभवेन संबन्धेन । तत्रपि जीवतो दहि देवदत्तस्य गृहामवि बहिभौवः, यदा गृहि भावः न तद। बहिमौव इव्यन्यतरेणानुमानम् । साक्षात् दृद्यमानवहिभीवाम्यन्तराभावचं दृष्टान्तः | बृद्युपरञ्जकानुपरञ्ञ कतेन ह्यभावप्रहण-
[कच कव
स्याभिहिते। हेतुः ॥
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अग्न्यादात्रपि दहनादिशक्तिप्रदणमसुमानमेव । कार्थनि्वतकयोरषिना- मावतबन्धस्यातमनि दृष्टल्ाद्भुज्यादौ । द्यते हि प्रययगालमनि शाक्तोऽहमिदं कार्थ कतुमराक्तोऽहमिव्यासवदत्मविशेषणस्य राक्तेप्रहणम् । शाक्तेनिवे्यमेव दहनादि- कार्यमपीयनुमानसिदिः ॥
ननु चाभावरस्य प्र्क्षतामुपगायन्ति केचित् । यथा किंखदरीकेन प्रदीपादिना सति गृह्यमाणे वस्तुनि न तदवयत्रिनि यदुपरम्यते तन्नस्तीयेवं सतः प्रकाशकं प्रमाणमपदपि प्रकाडययति । तथा चोदाहरन्ति--अनङ्कितं वास आनयेघ्युक्तः प्रविरय भण्डागारम् अङ्कितानङ्कितवासस्सन्निधावद्कितवासो- ग्रहणनेव प्रयक्षेणाङ्ाभावति षष्ट बास उपरम्यानयति । तस्मात् प्रयक्ष एवामावेो ठक्षणान्तरानुपपत्तरिति ॥
तन--बुद्ध्याकररेणायौवधारणादरततप्रसङ्गात् । यदाकारा हि बुद्धिस्तस्य प्रयक्षावधियमाणात्मतामभ्युपगम्यते । यथा नीं वस्तु पीतमिलत्रापि विशेषण- विशेष्यप्बन्धप्रल्ययो भिध्या प्रभोति । तयेह घटो नास्तीति इहश्रदेशस्य घटामवेनाप्तति संबन्धे सबन्धग्रयययः ; न हि घटामावस्येहश्रदशस्य चाप्र] प्रा्िखक्षणः समवायामिधानो वा संबन्धस्तैरभ्युपेयते । यथेह देवदत्त इति । तस्मादमाव (वे)प्रल्ययव(या) नीकं वक्तिवति विरोषणविश्ेष्यसंबन्धप्र्ययोऽपि सेबन्धप्र्ययतानिमिध्या प्रसञ्येत ||
समाधिपादः प्रथमः २९
[ भाष्यम् | विन्ध्यश्चाप्रा गतिः ॥ । [ विवरणम् ] यथ। चासव्यपीहदे शघटामावसंबन्धे सबन्धप्रतीतिस्तयैवानीडेऽपि बस्तुन्य- पयेव॒ नीरुलक्चवन्ये नील्तसंबन्धग्रल्ययः प्रपोति, तथा संबन्धिष्वपि । अथारव्यव संबन्धः, द्िष्ठता विरुच्येत संबन्धस्य | अभावस्याव्रस्तुान्युपगमात् ॥
अधधप्येकरातं पष्ठषथी इति यावत् श्रष्ठव्थीः संबन्ध इष्यत, तदा दिविध एव संवन्धः समवायाद्यः संयोगास्यश्चेति न युज्यते ॥
अथे(तथे)करातस्यपि घष्ठय्यानामुभयान्तःपतितपुष्येत--न-- अभवेऽन्यतरस्याप्यक्तम्भवात् ॥ -
विश्चा(न्त्व)न्यत् | इह नमपि कुषम नास्तीति सबन्धिनो नभसोऽप्य- प्रक्षयात् गगनकुखुमामावस्याप्रद्यक्षतवं प्राप्रोति] अथाप्रद्यक्षत्वमेवेति चेदापतितं गगनक्रुसुमामाववदप्रदक्षस्वमिह भूप्रदेरो घटामावस्यापि । विशेषो वक्तभ्यः ॥
अथ ग्योन्नोऽप्रयक्षत्वादिति--तन--पुष्पस्य पततो नभस्यस्तित- दर्नायोमाप्रयक्षलमदहेतुः । यथैव निपतक्कुघुमसद्धबि व्योमाप्रलक्षत्वम- हेतुस्तथा सद्धावविरुद्धम्रहणिऽ्यहेतुः स्यात् । अथाकाशग्रयक्षत्वा- देयेति चेत्, अेबन्धमपि यद्किचि्यवहिताप्रयक्षत्वादि सोऽपि हेतुः स्यात् । अथ नमःवुघुमामावः प्रक्ष इति वचेत्-ईन्द्याथसनिकानथक्यं सर्वत्र प्रसञ्येत । तथा च सव्यसनिङृषटेपठभ्धेः स्वैषां सवेज्ञतं प्रसक्तम् ॥
अथानुमेयं तत्रेति चेत्--नमःकुघुमामाववदिह धट।मावस्याविरोषा- दानुमानिकस्(कीय)मेव सिद्धम् । एवं च सलभवप्रमाणवादिनेऽपि न्यवहितविप्रकष्टद कादवनलावभावस्यानुमेयत्वादिह धट[मवोऽपि तत्सामान्या- दनुमानम्राह्य एवेति निश्चेतुं युक्तम् ॥
विन्ष्यश्चाप्राप्तरगतिरिति च प्रयोगान्तरम । अगतिरविन्ध्य इति प्रतिज्ञानम् । अप्रपतिरिति हैत; । चैत्रवदिति काकलोचनवतुभयत्र संबष्यते | गतिमचन्द्रतारकमियनेन साधम्येण, विन्ष्यश्चप्रापेलिनेन वैधरम्ण
संबन्धः । एवं च सव्यन्वयग्यतिरेका(क)दशनकृतो न दोषः ॥
1, अप्राप्निरिति बाचस्पत्यभिमतः पाठः |
३० पातञ्जछख्योगसूत्रभाष्यिवरणे
[ भाष्यम् ] आन द्ोऽतुमितो - वाञथेः परत्र स्वषोधसंकरान्तये शब्देनो- पदिद्यते, श॒न्द्रात्तदथैग्रिषया वृत्तिः श्रोतुरागमः। यस्याश्रद्धेय्थो वक्ता न द्ष्ातुमितार्थः स आगमः प्रवते । मूखक्तरि तु द्श्टानुमितर्थे निर्विषवः स्यात् ॥ & - ७॥ [ विचरणम् ] अथैतस्मिन् भ्रयेगि व्यतिरेकविपर्थैयदरौनेन दोषाभाव इधयुपन्यस्तम् ।
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लक्षणस्य च लक््यविररेषेणे्यव्यददोषः ॥
आप्तः परानजिधृक्षप्रयुक्तो दोषरहितो दृष्टातुमितथः | तेन दष्टो वा अनुमितो वारैः प्रत्र श्रोत्रिरेषे स्ववोधपङ्करान्तये स्वभिगमशक्तमणाय शब्देन शाब्द इति वाक्य ततो विशिष्टा्प्रतिपत्तेः । तस्मात्तदुपदिषटद्वाक्यात् । [तदर्थविषया] बाकयाभरविष्रथा या चित्तवृत्तिः सा अनुमानक्देव प्तामान्या- वधारणप्रधाना ॥
इव्यमाप्यादिधप्रहणपूरविका श्रोतुरागमः, न वक्तुः । दृ्टाुमितारथौ हि वक्ता, तस्य ठेङ्गिकमन्दरियक वा तज्ज्ञानम् । घ्रेतुरेव तु श्रवणपू्वकं निशितं विज्ञानं शलिङ्गिकेन्द्ियकव्यतिरिक्तम् । स आगमः [न] प्रलन्नमिन्दिया[क्षिय]- विषयात् यथामिहितटिद्गटिद्धिसत्रन्धनिसेन्नलाच नानुमानम् । न हि स्वगपूर्- दवनादिशब्दा(ब्दोऽ)्थान्वितं॑ज्ञानमासादितटिङ्गशेह्ञि पनन्धपुरस्सरमुपजायते । फठे तु स्त्र पौरुषेय दृ्तितेध एव ॥
(४
यस्य आगमस्य व॒क्ता आगमाद्यवृच्युदत्तिनि मित्ते राब्दोचारणात् आग- मस्य प्रयेमोषन्यात्तेन प्रतिपादितं फङं तु पूर्वदेव । यद प्येक एव प्रयोगस्त(था)- दापि साध्यप्ताधनामावमात्रस्य विवक्षितत्वान विपरीतत्यतिरेकदशेनादिष्युष्यते ॥
अश्रद्धेयार्थवक्न्रभिहितलेनागम एव॒ क्िङेष्यते । कथमपतावप्रद्वेया्ौ वक्तेयत आह--न दृशेऽनुमितो वाः तेन वक्त्रा | रिष्टलेकप्रपिद्धान्यषा- प्रतिपादनात् बुद्धाहृतादिः । न हि रगादिदोषानुपहतान्तःकरणः प्रतिद्धमन्यथा निरर्णयति । स आगमः पुत्रते आभासीमवति ॥
यथपि प्र्यक्षानुमानविषयामाप्तदशनं सखरब्देन न कृतं, तथाव्याग- माभासोपप्रदरनेनैव पूरवैत्रपि यथामिहितठक्षणव्रिपरीतव्वेन प्रलक्षानुमाना- मासादि द्र्टव्यमथोदुक्तम् ॥
समाधिपादः प्रथमः ३१
मूरवक्तरि त॒ आववरक्तरीश्वरे तन्निमित्तो य अगमः स विष्टवनिमित्ता- भावानिर्विष्वः स्यात् | यथाथ(य)षक्रतृवत् ॥
उपमानं (मान) शब्दपू्ैकम् | तदागमान्तःपातिलान प्रमाणान्तसम् । यथा नखि गवय इति वनेचराभिहितदेव वाक्षयादवधृतसादृषयस्य पुनधने गघयदरशेनेऽपि पूश्रुतवराक्यापस्थापितसाद्दयस्मरणमत्रमेव नाधिकम् । साद्य तु वाक्यदेव पूर्वप्रतिपन्नम् ॥
नापि संज्ञसं्ेसबन्धश्रतिपत्तित एव मान, तस्या अपि तद्वाक्यादेवा- वगतघरात् । न हि गौर्यितावतानवगतगवयनामकस्य वनगतगवयदर्चि नोऽपि गवोऽयमिति सेज्ञासंज्ञेसवन्ध।ववोधो मवति ॥
तस्माद्रौसि गवय इति गव्रयशम्दोऽपि तद्वक्येपेक्षितन्यः । तथा च
सति पूध्रतादेव वाक्यात् सर्वं प्रतीतम् । अथापि स्यादयं (दस्योगवय इति न पूथरुद्धित्रिषयमिति-- तदपि त्रभवतामपरि पर्विदनपरिहारमव[प स्यतामपि
® (५ कि
(डितकवले[कौ ठे यकटत्तिकोणिऽवस्थानमिव ट्ष्यते ॥
तथा हि- देशकारसन्निकर्धरविध्रकादिमदेनानेकोपमानमेदः प्रसञ्येत । तथा्िति चेत्--तस्पूवैधियैवा तलमन्तर्निहितसमस्तविशेषमेव हि वा नेयौ
(५
पूरवमुपपादितम् । न हि गौच्युक्ते देशकालादि विरेषाभवि न गोरब्दादथप्रतिपत्तिः॥
किं चान्यत्--न हि संजञरसक्ञिेवन्धप्रतिपत्तिरपमानं, येन ह्युपमीयते तदुपमान, सच्दयज्नानं हि तव् । न हि नामिनामसतत्रन्धप्रतिपच्या किचिदुपमीयते उत्तरकाट्ात् । अवधघृतताद्दयस्य हि पश्चाद (स्य)यं गवय इवे सोऽपि निपतति ॥
एवं तहि स्यादर्ब्दपूत्कं प्रमाणान्तरं, यथा गवयदश्चनादेतत्तदसो गौरिति प्रामीणस्य वबुद्धिः- तदपि न- प्रमेयाभाव्रात् | सति हि प्रमेये सदुपलम्भक- त्वामिमतस्य प्रमाणस्य व्यापारः, न हि गोगवययेब्यंदृत्तमनुृत्तं च वस्तुतः सारय नभिकमस्ति ॥
ननु च पादृर्यब्ुदधिरस्येतर, नाततो निरारम्बना भवितुमर्हति । सव्यमेतें तत्रैव विचारणा--किमपते वनयधादिप्र्ययवत् १ अथ घटादिुद्धिवदिति। कि चातः ? यदि वनप्रययवद्धवेत्तदा यथेव त्रिश्िष्टसतनिवेशानुगत। महीरुह एवासभ्यतिरेकेणाव्रिधमानवनप्रलयहेतवस्तथैव गोगवयावयवा एव द्रयदर्शनस्परल- पक्षया स्वासन्वतिरेकेणासतः सादरयस्य प्रतीतौ कारणमिति प्र ्तमवस्तुतम् ॥
३२ पातञ्जख्योगसूत्रमाष्यविवरणे
अथ पुनषटादिग्र्ययवद्वस्तुरवं प्रमाणत्वं च, तद् स्यादिति ॥
तत्र कौददौ वस्विति विचार्थते-
किं गेगवययेोरनुदृत्तमेकं सादृश्यं गे्वगवयत्वाम्यामन्यत् १ ते एव वान्योन्यविरिष्टे, यदि वा ताभ्यां भिन्ने गोगवयाघारे दे सादये पस्परानपेक्षि, सपेक्षि वा ९
वि व्यक्तिरेव साऽन्यतरजातिषिशिष्टा वा, कि जातिः) सा चान्यतरभ्यक्ति- विरिष्टा, व्यक्तिद्यविशिष्टा वा; संबन्धो वेतेषां यथाविकल्पयेगमिव्येकेकन्योन्य- विरिष्टविशेषणल्यादिना भूर्यासोऽन्येऽपि विकल्पा उद्भावयितन्याः | तन्न यदेकं सादृर्यमुभयगतं, तदा नोपमेयत्वमेकत्वात् , यथा गौरि गौरिति ॥
अथ तेनान्यतश्वय्तिरुपमीयेत- >ेतदपि--स्वामगतत्वात् गौखि गोतेन । अथ तद्रत्या व्यक्त्या व्यक्तयन्तरमुपमीयेत- नैतदपि-- न हि गोत्व खण्डपुण्डोपमेयत्रकारणम् । अथ धममान्तरयपेक्षया साद्य तद्बुद्धेः कारणमिति, नष्टं तर्हि सादृश्य, स एवास्तु धमेः तदूनुद्धेः किं ते साटरयहतकेन कलिपतेन ॥
कि च--स च्यवेक्ष्यमाणो धमः क्मिकः सादृर्यवदुभयत्र, अथ मिनन इव्येवमादिविकल्पाः स्युसि्यितम्भवः पूर्ववदेव । अथ भिन्नं साद्दयपुच्येत--तच न-मेददेव, न हि भवति गौखिश्च इति । यथेवैकेकल्यादघटमानता तथा बहुभिपएपेक्ष्यमाणेः । एतेन जातिव्यक्तिसम्बन्धादयः पूवेविकल्पिताः प्रदयुक्ताः ॥
अथय बुद्धयुसच्यन्यथानुपपत्या सादृदेयकल्पना+ ससव वनविवर - पूतरदक्षिणेत्तरादिवुद्धियोगान्यधानुमवात् [न्यधानुपरपच्य] वस्तुत किं न कल्प्यते । स्यादेषा तव बुदधिक्षादय एव तत्र तदुद्धिजन्महैतव इति । यदेवे मिथ्याप्रव्ययो गवयेन सदृशी गौरिति वनबुद्धिवत् । अथ ये व्यावृत्ताः क इदहोपमाधः गौखििाश्च इति । अपोमयेऽपि तेऽवयवा व्यावृत्तानुवृत्तामानस्तदुद्धिहेतवः,) तथापि बनप्रव्ययवदेव प्राप्तम् ॥
तस्मात् परीक्ष्यमाणं नातिविमर्दनक्षममिति त एवावयवा उभयत्रोपठम्य- माना मू्यां्तः साद्खयबुद्धैः कारणं बनवुदधेखि पादपाः [ईति] नोपमानं नाम प्रमाणान्तरमिति सिद्धम् ॥
नापि प्रमेयद्धिवात् प्रमाणद्धिवकल्पनम् । कुतः ? प्रमाणवादर्थप्रतीतेः । न हय्थवञ्ात् प्रमाणकलपना । यदि चायव्रश्ात् प्रगाणकल्पना स्यात् ; अधुना
समाधिपादः प्रश्रमः ३३
व [ सूत्रम | विपययो मिथ्याज्ञानमतद्रुपप्रतिष्ठम् ॥ ८ ॥
[ विचरणम् ¦ तन्न राक्यं जनानामसर्वज्गव्वात् । चेव्यवन्दनात् स्वगो भवतीत्यत चैत्यवन्दनस्य स्व्हेतुखब्ुदधेः प्रस्यक्षानुमानाविषयत्वान्मिथ्यालं स्यात् । तदथ वा प्रमाणान्तर- कल्पनम् ॥
अथ स बुद्धिरतुमानफठमिति चेत्--प्रमाणादन्यत्र फठप्रसङ्गः, - एवं डा(कण)रणत्रयादिवाक्यार्थविष्रयबुद्धिरपीति ॥
नपि चात प्रमाणलक्षणनिरूपणताद्यै प्रसिद्धप्रमाणादिवृत्तिनिरोधाम्यु- पायामिप्रददनपरत्वात् । अत एव न सूत्रकारः सूत्रयाश्चकार । माध्यकरिण तु किङ्चिध्रिद्धनुवादमात्रमवटम्बितमिति तदनुस्रणेन किमपि जल्पितमिति ॥ & - ७ ॥
भ्रमाणाल्यां वृत्ति अया्याय विपर्ययामिधानां वृत्तिमिदानीमुपभ्याचि- ्यासभान आह--विपययां मिथ्याज्ञानमिति ॥
नन् निरेधस्य प्रकृतखात्तस्य च हानताद्धानस्य च हियपक्षवाद्धे- यस्य चाविधामूलस्वादविधा च विपर्यय इति स एव ॒प्राघन्येन . निरोद्धव्यः. । त्प्रमवत्वाद्वेयस्य । कारणनिरोधे हि कार्यमथादेव निरुद्धं स्यात् | तस्माद्विपर्वयः प्राधान्यात् प्रमाणात् पूर्वं व्या्यातम्य. ॥
स्यमेवमस्तयेव प्राथम्ये विंपययस्य निरोधनीयतया, तथापि गुणदोष- ज्ञानपिक्षवाजिरेध प्रति पुरुषप्रवृत्तेः । प्रमाणमेव हि गुणदोषज्ञानम् । न हयप्रमाणेन विपर्यस्य दु व्व गम्यते, निरोधतत्फरपताधनानि वा ज्ञायन्ते । तस्मात् प्रम।णवृत्तेरव ्रायम्यं युक्तम् । ज्ञयते च गुणदोष प्रमणेनेति तदनन्तरं विपर्ययाभिधानम् । ृत्यन्तरपिक्षया तु विपरययस्य प्राथम्यम् । तन्मूललतवाचच वृत्यन्तराणां तन्निरोधपूरभमे- मेवान्यनिरोधोपपत्तेः ॥ ` विपर्ययो मिथ्याज्ञानमिति पर्यीयकथनम् । अतद्रपप्रतिष्ठमिति लक्षणोक्तिः । तस्य रूपं तद्रूपे न तदूपमतदपं, यदामाते विज्ञानं तस्य विज्ञानस्य च सा प्रतिष्ठा आलम्बनम्, । अगृह्वीतव्रिरोषस्य सामान्यमात्र- युद्धिरुपटन्धपूवीन्यतवस्तुस्मृद्युपसंहिता निश्वयाकरिणोपरसंहिता निश्वयाकरिणो- पजायमाना विपर्ययः ॥
5
३४ पातज्ञदयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भाष्यम् | स कस्मान्न प्रमाणम् । यतः प्रमाणेन बाध्यते । भूताथविषयलात् प्रमाणस्य । तत्र प्रमाणेन बाधनमप्रमाणस्य दृष्टम् । तचथा--द्विचन्द्रदशैनं सद्विषयेगेकचन्द्रदशेनेन बाध्यत इति ।
| विवरणम् | संशयो दह्यभयोरिदं सामान्यमि्येवं गृहीतसामान्यस्य विशेषमेव घुभुत्समानस्य जायत इति स्पृतावेवान्तभवति । यथा स्थाणुः वि वा पुरूष इति गृहीतपूवस्येव बिरोषस्य स्मरतः संरये। जायते, न तथा विपर्ययः | अन्यतरस्मरण- म्रेणेवावसितत्वात् । त्था-- स्थाणौ पुरस्तादवस्थिते परिणाहारदणादि- सामान्यप्रत्रोपलम्भेन समुपजातपुरुषस्मरणस्य पुरुष एवायमिति निश्चिता सुद्धिरुत्पथते ॥
सा यद्यपीन्दरियमार्गणोपभ्यमानवस्तुामान्यप्रधाना, तथापि समर्य णातद्रस्तुप्रतिष्ठत्वान प्रभाणम् । स्मृत्यवसाना हि सा यतः प्रमाणेन प्रबाध्यते जअ(आ) मूताथ(थदि)विप्रयत्रात् । (इव्यतः प्रतिषठत्वादियेतत्) अभूतो हि स्मयेमाणोऽथस्तदा । ययेवं स्मृतिरेव प्राप्नेति-न- विशिष्टत्वात् । उपरम्यमानं वस्तु निमिक्तीकृत्यान्यत्र स्मृतिजीयते यधानुमूतवस्तुविषया । न विपर्ययस्तथा | सननिहितसामान्यमत्रे देशक।खादिविशेषानुगते वस्तुनि स्मरणपर्यवसतानस्वे स्यप्ययमिति विशेषरूपेण विपययव्र्ययो ज।यते । तस्मादेवं न प्रमाणधर्मो नापि स्मूतिधम् इति बस्यन्तरतरम् ॥
तत्राप्रमाणस्य प्रमणेन वाधसंदरचनार्धमुदाहरणे दरयति- तथथा दविचन्द्रदशेनमिति ॥ यथा काचकामलादयुपहतदरीनस्याभूताथैवरिषयल्वाद्धि दिचन्द्रददीनस्य सद्िषयेण भूताथवििषयेण एकचन्द्रदशेनेन हि तीयनचन्द्रामावो- पपन्ति्वानस्मृव्यतुगृहीतिन बाधनम् ॥
ननु च द्विचन््रमिति विपरी पञ्चपठीतिवत् द्विगु समा्ततवात् 'द्ियुरेक- वचनम्! इति प्रतिरग्ध तद्भावात् 'अकारान्तोत्तयदो द्विगुः ्ियामिष्टः' इति दविगोरकारान्ताव् (इति) दि चन्द्रशब्दादीक।रः प्राप्तोति-नैष दोप्रः-पात्रादिप्रति. बेधात् । तत्र चादिशब्दस्य प्रकारवचनघलात् | प्रकारस्य च शिष्टप्रयोगानुसासतिात् +
=
1, पाणि. सू. 2.4. 1.
समाधिपादः प्रथमः ३५
भाष्यम् | सेयं पश्वपवां मवलविधा, अविद्यासितारागद्रेषाभिनिवेशाः कशा इति। एत एव स्वसंज्ञाभिः तमो मोहो महामोदस्तामिक्ञोऽन्धतामिल्च इति । एते चित्तमटप्रसङ्खेनाभिधास्यन्ते ॥ ८ ॥
। सूत्रम् ] शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ ९ ॥
[ भाष्यम |] च पेद सन प्रमाणापारेही, [ विवरणम् |] दिचन्द्रोऽपि पात्रादिषु द््टम्यः । द्रौ चन्द्रौ यस्मिन् दीन इति बहुरि; | एकचन्द्ररान्दस्य अद्रगुत्वादव चाचाभमविः | पाच पश्चपवो अविधा; ता विपययव्रत्तर्त्रियया पज्च परताग अस्या इत ॥
कानि पुनस्तनीवयाह-अविद्यास्मितेल्यादि । एत एव अविचादयः ह्राः स्वधङ्ञभिः खाभिः शाल्न्तरप्रपिद्धामित्तमआदिपंज्ञामिः; भिशिष्टाः चित्तमलप्रसङ्गनाभिषापिष्यन्ते दवितीयपदे ॥ ८ ॥
ददानीं विकल्पं दशयति-- शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकलः ॥ सब्दस्य ज्ञानं राब्दङ्गानम् , वाच्यवाचकनियमेन सष्साधुरान्द्ञान, तदनुपतितुं शी खमस्येति रखब्दज्ञाना।नुपाती | वस्तुशन्य इति ॥ यथावाच्याथद्यून्यः, यस्य राब्दस्य ज्ञानमनुपतति तस्य शाब्दस्य यथाभूतामिधयेन सयून्य इति यावत् | यथाभूतायर््यतिरेकेण हि विकल्पनं विकल्पः ॥
त्य हि रान्दज्ञनानुपातित्वादागमान्तःपातितवे प्राप्तम् , अत आह-- प॒ न प्रमाणोपारोहीति ॥ न प्रमाणान्तःपाती वस्तुदन्यत्वात् । न द्यागमस्य शब्दु्ञानानुपातितेऽपि वस्तुद्यन्यत। । यतः राब्दार्थत्रिषय। बरत्तिर।गमः, विकल्पस्तु वस्तुदयूल्यत्वाने प्रमाणम ॥
किंञ्च -वक्तृधरोत्रोश्च तुल्यो विकस्य । द्रयेरपि शब्द दुर रिताद्वि कल््यष (५ [क्न किप्
हि बुद्धिजौयते । न तथा आगमे | प्रोतुरेव ह्यागमः । वक्त! तु दष्टानुमितार्थः ॥
(
किश्च-निर्वितकपसमापन्नस्य विकल्पो वतते नागमः । तप्मान्न
ष्य
प्रमाणेपारेद्दी ॥
३६ पांतञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भाष्यम् ] न॒विपर्य॑योपादी च । वस्तुशुन्यखेऽपि शब्दज्ञानमाहास्यनि- बन्धनो भ्यवह्रो दृश्यते । त्यथा--““ चेतन्यं पुरुष्य स्वहूपम्" इति । यदा चिति पुरुषः तदा किमत्र केन व्यपदिश्यते ? भवति च व्यपदेशे वृत्तिः, य॒था --“ वचेत्रस्य गौः” इति ।
| विवरणम् ] ययेवं वस्तुशून्यलाद्धिपययान्तःपातिल प्राप्तम् , अत आह-न विपर्ययो- पारोद्ीति ॥ कुतः ! शब्दङ्ञानानुपातित्वात् । न हि पर्तुदून्यतरेऽपि विपर्ययः राब्दज्ञानमपेक्षते । यतः ^“ विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रपप्रतिष्ठम् श्युक्म् । प्रमाणपचिच्छिधप्रलयये प्रलतिगुणमूतत्वाच विकल्पस्य । न हि यथा सर्वषां विपर्ययो
विरोधाद्वाष्यते, तथा विकल्पः । प्रमाणप्र्ययगुणमावदेव ॥
तस्माद्रस्तुशून्यलग्रहणिन रब्दज्ञानानुपातिलम्रहणेन च परस्परसंबन्धेन प्रमाणविपर्ययाम्यां प्रमणत्रिपर्यैयगन्धमात्रानुलिप्िमपि भिन्नं विकल्पास्य वरस्यन्तः दरितम । तद्र द्रन्धानुदेपनदेव तदानन्तर्येण विकल्पस्य।रम्भः । नपि स्मृतिम् । सृते: केवलानुभूतास्पदलवात् ॥
अथ न लीद्री चित्तवृत्तिः भरसिद्धा | न हि स्वभावे िचिदूवृत्ति- निमित्तमिति चेदाह-पस्तुशून्यखेऽपि शब्दज्ञानमाहातम्य(मात्र]निबन्धनो व्यवदारो दृशयते इति । मन्नप्रहणे शब्द्ञान्पतिरिक्तका(णाभवद्यापनार्थम् । क दृस्यत इति चेदाह- त्था चेतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति । चितिरक्ति- रपरिणामिनीव्युक्तघाचेतन्यमेव पुरुषः, तदेव च स्वरूपमिति न्यतिरेकाभागद्वप- तिरेकोपनिबन्धने व्यपदेशो न स्यात्--पपुरप्रस्य चैतन्यम! इति । तथा चेममे- वाधपुपाश्चिलय शब्दविदा वार्तिककरेणोक्तम्-- “सिद्धं तु भ्यपदेशिवद्वावात्)' इति । तथेवेहपि यथा सति -व्यतिरेके चेत्रस्य गौरिति तद्वदेव चैतन्यं पुरुषस्येति । न हि यथा गोसन्यशचत्रो व्यपदेशहेतुः, तथा चितेरथीन्तर पुरूषेऽस्ति, ` येन व्यपदिश्येत । नापि चितिः पुरुषादयौन्तरं व्धपदिरयेत । तथाऽपि ` -व्यतिरेकसेबन्धविषये मवति “चैतन्यं पुर्षरस्य स्वरूपम्! इति भ्यपदेर वृत्तिः ॥
1. पा. 1, स्, 8.
समाधिपादः प्रथमः. ३७.
[ माष्यम् | तथा, प्रतिषिद्धवस्तुषर्मो[मी]निष्कियः पुरुषः, तिष्ठति बाणः स्थास्यति स्थित इति, गतिनिवृत्तौ षासथेमत्रं गम्यते । तथा, अनुतयत्तिषमो पुरुष इति, उत्पत्तिषर्भस्या मावमात्रमवगम्यते, न पुरूषान्वयी
ष्मः। तस्मात् विकसिितः स भर्मः, तेन चास्ति ग्यवहार इति ॥ ९ ॥
[ विवरणम् 1 प्रतिषिद्धवस्तुधर्मेति । वस्तुनो धर्मो वस्तुधर्मः । प्रतिषिद्धो वस्तु- धमोऽस्येति प्रतिषिद्धवस्तुधमी । ““'धरममीदनिच् केवहात्,' इति वचनात् समसान्तश्िन्ययसमाधिः । वस्तुशब्देन सखदिगुणा उच्यन्ते, तेषां घमः प्रतिषिद्धा अस्येति ॥
न हि प्रतिषिद्धाः सच्वादिधमाः प्रतिषिद्धत्वदिवास्य पुरुषस्य संनन्धिने। मेवन्ति । येन ते पुरुषेण अस्येति व्यपदिर्यरन् । तदमभावमात्रमेव तु तत्रः । तथापि यथा चित्रा गव्रोऽस्येति व्यपदेरो बुद्धिः तथा प्रतिषिद्धा वस्तुधमौ अस्येति व्यपदेशे बुद्धिः ॥
निता करिया अस्मदिलत्रपि निगेतिरपायः । अपायश्च सम्बन्धधूरवः । यथा चैत्रानिगेता क्रिया| न चेवं पुरषे क्रियाया अपतम्भवानिगेतिः पुरुषात सम्भवति । तथाऽपि निष्क्रियः पुरुष! इति भ्यपदेदो भवति वृक्तिः ॥
तथाऽनुखत्तिधमी पुरूष इति ॥ न विते उतप्तिधरमोऽस्येति पूर्ववदेव । अत्र स्वयमेवार्थमाचष्टे भाष्यकारः--उतत्तिधमेस्यामाव(ज्ञाम)मात्रमव(मत्र). गम्यते । यथा निगुणो निरञ्जनो निष्कल इव्येवमादीन्यप्युदाहरणानि । आलसविषयानेकोदाहरणप्रदशचैनमातमतचनिधंरणाथलात् ॥
तिष्ठति बाण इति रेकप्रसिद्धादाहरणप्रतिपादनमप्रसिद्धधाशङ्का-
निवृ्यधम् । तिष्ठतीति गतिनिवत्तिर्मेद्यमावः । न॒ चमातस्य कालत्रथयोगो
भवति । नापि बाणस्य क्रियानिरपक्षस्य दव्यस्य । नापि चाभवेन गतिनिवृ्या [> | ‰»
बाणस्य वस्तुनः संवन्धः । तिष्ठति बाणः (स्थास्यति स्थितः] इयेवं तरीण्युदाहरणानि ॥
{. व्याकरणसूत्र अ. 5,पा. 4. सू. 124.
३८. पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ सूत्रम् ) अभावप्रययारम्बना वृत्तिर्निद्रा १० ॥
[ भाष्यम् ] सा च सम्रवोधे प्रयवमश्चौत् प्रल्ययविशेषः । कथम्? “सुखमह- मस्वाप्सम् , प्रसन्नं मे मनः प्रज्ञां मे विशारदीकरोति" “दुःखमहमं- स्वाप्सम्, स्यानं मे मनो मअ्रमयनवरि्थितम्'' ““गाढमूढेऽदहमस्वाप्तम् , गुरगुरूणि मे गत्राणि, न्तं मे चित्तम् अरततं मुषितमिव तिष्ठति" इति । स॒ खल्वयं प्रबुद्धस्य प्रयवमर्शा न स्यादसतिं प्रययातुभवे । तदाश्िताः स्मृतयश्च तद्विषया न स्युः । तस्मात् प्रययविशेषो निद्रा।साच समाधावितरप्रययवन्निरोद्धव्या इति ॥ १० ॥ [ विवरणम् ] गतिनिवृत्तौ धास्थं इति ॥ ननु गतिनिषृत्तिरेव धाल्रथः, तत्र कथं ग॑तिनिबृत्तात्रियाघारः १ अत एवेदाहरणान्तरमेतत्। अपति व्यतिरेके अधारा- धेयमावस्यामावात् । अस्ति च गतिनिधरृत्तौ धात्वथं इति व्यपदेशे शब्दसाम्यै- सपुस्यापिता बुद्धिराधाराधेय[माव)]पुबन्धव्रङम्बिनी । तस्मादित्यजातीय विकल्प. विषयमनेकमुदाहरणं द्रष्टन्यम् ॥ ९ ॥
निद्रया वृत्तिमिदानीमाचषटे--अभावप्रययारम्बन) वृत्तिर्निद्रा । जाग्र विषयत्वात् प्रागुक्तस्य दृत्तित्रयस्य तदुपमर्देन च निद्रासमुद्धव इति, तदनन्तरं निद्राया वृत्निन्य्यायते ॥
अमाव इति जाप्रद्विषयाभावः, न त्त्यन्ताभाव ए | तत्र प्रल्ययानुप- पत्तेः | अभवि प्रययः अमविप्र्ययः । स ए अआरुम्ब्ने यस्याः सा वत्तिरमावप्रययारुम्बना । सा निद्रा घुषृपतावस्था ॥
ननु च स्व्नवरस्थाऽपि निद्रैव--नेष दोषः-““स्वभ्रनिद्राज्ञनाठम्बनं व्[1* इति सूत्रकरिण भेदेनेपदिष्टतादिह शुधृप्तावस्थेव निद्राऽभिप्रेत। ॥
फिंच--अभावप्र्ययाङम्बनघाच्च पुपृत्तमेव । न हि स्वपस्यामाव- प्रसयालम्बनता, स्पृतिखात् । स्मृतेश्वानुमूतविषयलात् । तथा माष्यकारः- ८धयदस्वत्ने मावितस्मरतन्या!' इति स्मृतिं दशयति ॥
1, ५. 1. प. 38. 2. ण. 1. ९. 11
समाथिपाद्ःःत्रथमः ३९
सूत्रम् 1 अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मरतिः ॥ ११ ॥ [ विवरणम् ] किञ्च-- स्वरस्य चित्तद्त्तिता स्वरसत्रेयेति नारशङ्कवोपपदयते । तथा च चित्तटृत्तितामराङ्क्यह-- पा तु[च सपप्रबोषे प्रयवमशदिलयादि । तस्मात् प्रययविशेषो निद्रा । न दह्यक्तति प्रयव्िेषे परम युक्तः । अस्ति चायं प्रबुद्धस्य प्रघ्यवमरः शुखमहमस्वाप्सम्' इत्यादिः । प्रलयवमरो नाम किमप्यन्वभूवमिति प्रत्ययारोचना | नानुभव्रामवि सा भवेत् । नापि _ तद्विषया; स्मृतयो युक्ताः । निद्राया अप्रत्ययते- प्रज्ञां विशारदीकरेति मनः, मनः करैत, स्यानं स्तिमितम् अकर्मण्यम् , गुर्गुरूणीति प्रकरे "गुणवचनस्य" इति द्विवचनं गुरुप्रकाराणि, अपं सुषितमिव मछेनाप्टतमिव, एतानि प्र्ययानुभवक्रा्यणि न स्थुः । काश्चन स्मृतयः कानिचित् कार्याणि केचन प्रखवमरौः । तदेतल््रयमपि माप्यकरिपन्यस्तं प्रत्ययविरेषत्व एवोपपधते ॥
किश्च- गर्भगृहादिषु चद्ृ्टबाह्यनिमित्तानामपतति विशेषे चिरमहं सुप्तवान् क्षिप्रमिति च परामर्योऽन्यथा न युज्यते ॥
ननु च नात्र स्मृतयः, स्मृतीनाम् अन्वभवभियेवंविशि्टत्वात् । न हि घुषुप्ादुत्थितो विशेषे स्मरति--अत्रोच्यते--बारुप्येह जन्मन्यनुभूतस्तन्य- संबन्धस्य जन्मानन्तसेव तस्यामिखाभो दृस्यते । न च [स] स्वामातरिकः. । अबालनोंस्मृतिपू्रप्रदत्तिदशैनात् । तथेहापि । तस्मात् प्रत्ययपृश्रकः सुपप्तविभय म्रत्यवमरेः, प्र्यवमरोत्रात् जम्रदुपरब्धविषयप्रत्यवमरेवत् । तथा सु ृतषोत्यितस्य गात्रगौरवादि काय दुःख्यनुभवपूर्व, गात्रा िषयगौरवादिकायैतात् परसिद्धदुःखानुमवकायैगात्रगौरववदिति प्रत्ययविशेषो निद्रेति सिद्धम् ॥ १० ॥
सपृतिमिदानीं व्याचष्टे--अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः । स्मृतेः प्रमाणादिसव॑त्तिकायैत्वादन्ते निवेराः । अनुभूतश्चासो विषयश्च अनुभूतविषयः | योऽसावनुभूतः स एव विषयः, न पुनर्यो व्रिषयः स एवानुमूत इति । तथा च समृतेररब्दादिवात् स्मृतिविषयायाः स्पृतेरस्मृतिं प्रपेतीति । हृष्यते च स्प्रतिषरिषयाऽपि स्मृतिः स्व्तवेयलात्। अनुभतविषयस्यासेप्रमेषोऽनपहरणम- तिरोभावः । परोक्ष्येऽपि साददयादिर्निमित्तपिक्षयाऽतुमतस्य विष्रयस्य टृडयमानवदवभापः स्मृतिः ॥
1. पाणि. स्, 8. 1. 12.
४० पातञ्चल्योगसूत्रभाध्याविचरणे
{ भाष्यम् ] रिं प्रलयस्य चित्तं स्मरति, आदोसित् विष्यस्येति । ग्रह्मोपरक्तः प्रययो ग्राहयग्रहणोमयाकारनिमौ्तः तजातीयकं संस्कार मारमतं । स सस्करः खन्यक्चकाञ्चनस्तदाकारमेव प्र्यप्रहणांमयासिमिकां स्मृतिं जनयति ॥ [ विवरणम् ] तत्र॒ प्रल्मयस्मरणयेोविषयाकारावमास्ताविशेषात् , किङ्कृतस्तयोरभैद इति तद्विवेकं प्रदरीपितुकाम आह-किं प्रयस्य चित्ते स्मरतीवयादि ॥ यथप्यनुभूतानतुमूयमान विषयत्वेन विवेकः, तथापि सादृर्यनिमित्ता भ्रान्ति तयोः कार्यकारणत्वप्रदशैनाय निवर्तयति । एतदेव च वैनाश्चिकान। बहिरथानुपपततबंद्धिकारणम् । कं प्रययस्य स्मरतीति कमैण्युभयत्र षष्ठी । चिन्त स्मरतीति पुरषरकतृत्वं निवारयति स्पृतिप्रल्मययेरेककतृत्वप्रदर्दीनार्थम् । न हि पुरुषस्य प्र्ययकरृ्वं स्पृतिकर्तृते बा । दृर्यत्वात् प्रस्ययानाम् । दृरयानां च स्वातमातिरिक्तदरयत्वे षटादिवदिति बक्ष्यामः ॥
किश्चातः यदि विषयस्य स्मरति, प्रघ्ययस्यापिं वरिषयविषयल्रादनर्थान्तरं स्मृतिः प्रलयात् । अथ प्रत्ययस्य स्मरति, तदा विदमयुक्तम् अनुभूतविषया- सम्भरमोष इति । तद। श्यनुभवासम्प्रमोष इति स्यात्तत्रह- ग्राघ्योपरक्तः ्ा्लो त्रिषिय आढम्बनम् › तेनोपरक्तः लक्षाचुपरक्तस्फटिकवत् । ग्रह्यग्रहणो- भय।कारनिभीप्तः प्राह्यस्य च षटदिः पृथुब्ुद् ्ाचाकारेण स्वेन चावभासरेणो- पजायमानत्वादुभयनि मासः ॥
स च प्रत्यय उथ विनिवतैमानः स्वाश्रये प्र्यपिनि संस्कारम. दधाति। से च संस्कारः कारणानुविधयित्वादु भया(पात)कार एष । स्वनव्यक्षकान्नन इति । संस्काराधापिनः प्रष्ययस्य हेतुभूतं यत् कम दत्तफठं तततुस्यजातीयं यत्कमान्तरं फलग्रदानायाभिमुखीमवति तत् स्वव्यञ्षकम । तथ। च वक्ष्यति- (ततस्तद्विपाकानुयुणानामेवामिन्यक्तिर्वास्तनानाम्? इति । तत्करमप्रदयुपनीतं वां सादृरयप्रणिधानादि । स्वेन गयञ्चकेनाभिम्यञ्यत इतिं स्वन्यन्चकाक्ननः । ्र्यग्रहणादिमिकांः स्मरति जनयत्ति । अन्यथा तद्रबज्ञकस्य कमणो विपाकानुपपत्तिः ॥
1. पा, 4. स्. 8. 2. ग्राह्प्रहणोमयात्िकाम्. इति मुद्रितमाध्यग्नन्थपाठः
समाधिपादः प्रथमः ~
भाष्यम् |]
तत्र ग्रहणाकारपूवं बुद्धिः । आद्याकारपूवो स्मृतिः । सा च द्यी भावितस्मर्तव्या. च अमावितस्मतेव्या च। स्वपे भावितस्मतेव्या । जाग्रत्समये समावितस्मर्तव्येति । सर्वाः स्मृतयः प्रमाणविपयैयविकल्प- निद्रास्पतीनामलु मवात् प्रभवनित । सर्वाश्रेता वृत्तयः सुखदुःखमोदासिकांः। सुखदुःखमोदाश्च शेषु व्याख्येयाः-पुंखानुशयी रागः, दुःखानुशयी देषः, मोहः पुनरविद्या इति । एताः स्वी वृत्तयो निरोद्धग्याः । अपां निरोप सम्परज्ञातो वा समाधिभ॑वति अपम्भज्ञातो वा इति ॥ ११॥ `
[ विवरणम् | तत्र प्रहणाका।रपुक्व बुद्धिः, ग्रहणम् [स्वी]करणे [स्वी] करणमेव पूर्व प्रथमसुत्पद्यमानस्य प्र्ययस्य । न हि विधयत्रिशेषमपेक्षते पूवैमिष्टानिष्टम्रहणात् , निर्मप्रषटप्रदीपविनिगेतप्रभाजाखत्रत् ॥
अ्रह्याक्रापपुष्र स्प्रृतिः अनुभूतपेक्षत्वात् । यदि च प्रहणपूर्विका स्मृतिः प्रस्ययवदभविष्यत् , अनुभूतं नापिक्षिष्यत । अपेक्षते तु । तस्ादृभ्रह्यो वियः पूर्वोऽस्या न ग्रहणम् । तथापि तूमयासिििकेव | स्ृतिसस्कारयेरेकरूपत्वात् । नध्यन्यत्तर्रस्यास्यानेन सम्भवति । तथा चानु मूतविषयाप्प्रमोषर इव्युपपद्यते । स्रातेप्रयययोर् पर[पसमान)विषयत्वात् , म्रहणतवस्य च सवत्र सम्भवात । तसात् पक्षद्रयेऽप्यभिहितदोषो न दृश्यत इति ॥
१
पाच हयी । कथम्: भावितस्मतेव्या भावितं परिनिष्पन्ने अप्कृद्धावितल्रात् । यया द्रन्यान्तरेणासकृद्धावितं तैखादि । असङृद्धावितत्वादेव प्रणिधानादिप्रयननान्तरं नपिक्षते । भावितं स्मतेग्यं प्रणिघानादियन्नान्तरा[नि पेक्षया यस्याः सा स्वपने मावितस्मतेन्या । जागृ प्रमये त्वपेक्षते प्रणिध।नादियन्नान्तरमिति तद्विपरीता ॥
सश प्रमाणादिवृत्तिपश्चतयानुमवादुदधवन्ति । सवांगरैताः सुखाचा- (स्पचाधा)लिकाः। तदात्कथ संसारः। सुखदुःखमोहाश् डशेषु व्याख्याताः सुत्रकरेण । “सनं दुःखं विवेकिनः" इति हि वक्ष्यति । तद्धानं चेह विवक्षितम् ।
1, षा. 2, बु. 15. 0
४२ पातञ्ञटयो गसूघ्रभाध्यविबरणे
[ भाष्यम् | अथ आसां निरोधे क उपाय इति-- [ सूत्रम् । अभ्यासवेराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥ | भाष्यम् ] चित्तनदी नाम उमयतोवादहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च । या तु केवल्यप्राग्मारा विवेकरविषयनित्रा सा कल्याणवहा । ससारपराग्भारा अविवेकविषयनिश्ना पापवहा । तत्र वैराग्येण विषयन्लोतः विटीक्रियते, विवेकदरीनाम्यासेन विवेकल्लोत उद्वाव्यत इत्युमया- धीनशित्तवृत्तितिरोपः ॥ १२॥
सूत्रम् | तत्र स्थितौ यलोऽभ्यासः ॥ १३॥ [ विवरणम् | तस्मात् सुखदुःखमोदात्मकतवात् निरोदधम्या वृत्तयः । विश्च--आसां निरोषे सम्भर्ञातो वा समापिमैवलयपम्मज्ञातो वा॥ ११॥
अथ आसां निरोधे कं उपाय इति ॥
उपायं प्रवेदयति--अभ्यासुवैरग्याम्यां तज्निरोष इति ॥ अभ्याप्तवैरण्ये वक्ष्यमाणलक्षणे । ताभ्यां यथोक्तरक्षणानां [बृत्तीना] निरोधः विरोधात् । निरोध उपरमः । अम्यासुत्रराग्ययेर्विषयविवेकप्रदर्रानार्थमेतद्भाप्यम - चित्तनदीलयादि । चित्तेन नयेव संक्तारिणः सततत विषये परिणीयन्ते । सागप्रामभारा ससारावसानां समुद्रावसनेव । खिीक्रियते प्रतिब्यत इति । उद्वाव्यते प्रवते । उद्धाटः क्रियत इत्युद्राय्यते । अन्यथा परितात् घटाद्यो मितः इति (इत) “भिता! हस्वः)" इति स्यात् । एवं उमयाधीनः; उमयतन्त्र हृद्यः ॥ ६२ ॥
तत्र म्धासस्वरूपं प्रतिपादपिप्यनाह-- तत्र स्थितौ यन्नोऽभ्यापः । तत्र
तक्षिन्निरोधे । सा च निमित्तसप्तमी । निरोघनिमित्ता चित्तस्य या स्थितिः यत्नस्य फलभूता तस्या निमित्ता[त्तमूतो]यो यन्नः सोऽभ्याप्तः । तथा चाह-
1. पाणिनिसूत्रं भ. 6. पा, 4, घु. 92.
समाधिपादः प्रथमः ४३
[ भाष्यम् ] चित्तस्याव्रत्तिकस्य प्रशान्तवादिता स्थितिः । तदथः प्रयल्ञः- वीर्यम्--उत्सादः । तस्सम्पिपादयिषया ततसाधनानुष्ठानमम्पासः।॥ १३॥
[ सत्रम् ] [स तु] दीधका।रनैरन्तथसत्कारासेबितो दृढभूमिः ॥ १४ ॥
{[ भाष्यम् 1 दीरधकारासेवितः, निरन्तरापेवितः, सतकारासेवितः-- तपसा ब्रहमचर्येण विद्यया श्रद्धया च सम्पादितः सक्तारवान् ; दटमूमिमवति-- वयुत्थानसंस्करिण द्रागित्यवानभिभूतविषय इत्ययः ॥ १४ ॥
[ सूत्रम् । दष्टाजुश्रविकविषयविवृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५॥
[ विवरणम् । अवृत्तिकस्य प्रान्त पङ्क}कर द्ग) क्षस्येवाम्भसः प्रशान्तवाहिता प्रसन्नहूपतय परिणामो निरुद्धवृत्तिकस्य चित्तस्य । यज्ञो वीयेमम्युत्साह इति पयौयाः.। स्थितिपंपिपादयिषया यमनियमादियोगसाधनानुष्ठानमभ्यास्न इति ॥ १३ ॥
तु कथं स्थिरीमवतीलत आह---दीधक्रारनरन्तयसेवितः दीषकाल त्ववजितो वा (नैरन्तयवरजितो बा न] दृदभूमिभंकत्यम्यासः । तस्मादुभयोरपि (विरोप्योविंहेषणल्वमेव । सैस्कारसेवित इति तम्याप् एव विरेष्यते । दृढभूमि रिखस्य व्याल्यानं ब्युत्थानपस्कारेणेति । ब्युखानजेन सेस्करिण द्रागिति सहसा नाभिभूयते ॥ १४ ॥
वैराग्यप्रतिपादनाथमाह--दष्टानुश्रविकविषय वितृष्णस्य वशीकार- सेज्ञवेराग्यम् | विषयशन्दः प्रलकमभिसंनष्यते वितृष्णस्य इति च, इष्टविषय- वितृष्णस्य आनुश्रत्रिकविषयवितृष्णस्य चेति ।॥
1. इदं अब्ृत्ति$स्य इति भाष्यपदस्यः व्यार्यानम् । अतः अश्ृत्तिकृस्य इति प्रतीकादनन्तरं सन्निवेक्नमुचितं प्रतिभाति । 2, इदं प्रशान्तपङ्कत्यादितः प्राकखन्निविष्टञेःऽमुचितं प्रतिमाति ।
४४ पातञ्जखयोगपूत्रमष्यविवरणे
[ भाष्यम् | „ (= [1 र, 0 क भ क © क च, ` क्ञियाऽन्ने पानमश्वयमिति दृ्टविषये वितृष्णस्य, स्वगेवेदेद्य- प्रकृतिर्यलप्रापठवानुश्रविकाविषये वितृष्णस्य दिम्यारिव्यविषयसम्भ- योगेऽपि चित्तस्य विषयदोषदरिनः - भरषंल्यानवरात् अनामोगासिका देवोपरादेयञचलया वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५ ॥ [ सूत्रम् ] तत्परं पुरषर्यातेशुणवेतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥
[ विवरणम् । दृशा विषयश्च तस्मिन् ॥ कः पुनरे ! क्ियोऽन्नं पानमेशव्य मिति व्यक्त्यपेक्षया । रान्दादीनामानन्त्येऽपि रागप्रवलत्वमेतेष्वतितरामिति याद्ष्हणे प्राधल्यात् । अत्र हि प्रबल्तयो रागः । स प्रथत्ततरेण निबेद्धन्यः । एवम् आनुश्रविकविषयः । आनुश्रविको नाम आगमिक इह । स च स्वर्गादिप्रप्यानुभवनीयः प्रकृतिख्यगतमोग्यो वैदेद्यप्रापौ उपमोग्यश्च ॥
ननु च वैतृण्पमेव वैराग्यम्, तथा ^दागस्तृष्णा ग्धः इति हि वक्ष्यति: । न--अवस्थाविरीषस्य विवक्षितत्वात् । तथा च यतमानंज्ञा, व्यतिक्रान्तसंज्ञा, एकेन्धियस्ना, वक्षकारसंङ्ेति चतसृणामासां सामान्यरसंज्ञा वैराग्यमिति । एवं सति दृष्टाुश्रविकविषयवितृष्णस्येष्येतदुक्तं मवति-- अधिगत- पूथोवस्थात्रयस्य चतुर्थी या अवस्थया सा विह वैराग्यमिति विवक्षितम् । तस्मादिह वैतृष्ण्यादन्यवैराम्यमामिप्रतम् । तथा च दरौयति--विषयदोषदर्शिनः दोषदरौनस्य विषयनिदृ्तिहेतुतात्। तदृगुणदर्शनं हि रागक्रारणम् । प्रसंख्यान- यलात्- तदेषदशेनाम्यासनरात् । अन।मोगासिका विषयाभ्यतिकराभिका । दिव्यादिव्ययो सम्भ्रयगेऽपि हेयोपादे यद्यनया रञ्जनावमुक्तस्येव स्फटिकस्य विषयरागविमुक्तस्य चित्तस्यावस्यानम् | वदीकारसज्ञा-- वीक राक्यन्तेऽस्या- मवस्यायं सवै गोणाः पदार्थाः वक्षीकपव्यत्रेन संक्ञायन्ते, वशीकृतानि च तस्यामवस्थायामिन्दियानि सेक्ञायन्ते, वकष करणं वा संज्ञायतेऽस्यामिति ॥ १५ ॥
तच्च द्विविधम्-- परं चापरं च विषयनिमित्तमेदेन । अपरं व्यास्यातम् ।
[क कभक ~ ।
अघुना परमुन्यते- तसरं पुरषख्यातेशणवेतृष्ण्यम् । तदिति वैराग्ये परमृर्यते ।
1. पा. 2. षु. 7. -2. भाष्यकारः ॥
समाधिपादः प्रथमः ५
[ भाष्यम् | दृष्टानुश्रविकविषयदोषदरी विरक्तः पुरुषदशेनाम्यासात् तच्ुद्धि- प्रविवेकाप्यापितबुद्धिः गुणेभ्यो ग्यक्ताव्यक्तधमैकेभ्यो विरक्त इति । दृहये वैराग्यम् । तत्र॒ यदुत्तरं तज्ज्ञानप्रसादमात्रम् । यस्योदये संति योगी प्रसयुदितख्यातिरेवं मन्यते - प्राप प्रापणीयं, क्षीणाः क्षेतव्याः हशाः, छिन्नः श्िष्टपत्र भवसङ्करमो यस्याविच्छेदाञ्जनिसा प्रियते मृत्वा च जायत इति । ज्ञानस्यैव परश कष्टा वैराग्यम् । एतस्यैव हि नान्तरीयकं केवस्यम् इति ॥ १६ ॥ [ विवरणम् ] परमिति पू्वोक्तवैराग्यादुत्तरकामावीति । यदि वा-तस्य विषयनिमित्ताम्या-
५ [च
मुकछृष्टनिमित्तविषयत्वात् , कैवल्यस्य वा प्रल्मासनतरत्वात् परवुक्ष्टम् ॥
किं निमित्तमस्येल।ह-पुरुषख्यातिर्निमित्तात् । किविषयमिद्याह-- गुणवेतृष्ण्यमिति । गुने सच्वादि8 वैतृष्ण्यम् । दृषटामुश्रविकविषयदोषदर्यीति। पैैर,ग्यनिमित्तविषयपरामदयैनमस्य विषयनिमित्तमेदग्रिवेकायम् । पुरुषददैना- म्यात् निगित्तात् । तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायितद्ुाद्धेः । तदिति पुरुषदरनं परामूयते । तस्य इ्ुद्धिः तच्छुद्धिः निणिक्तकेशदिमल्त्वम् । अथवा तस्य पुरुषस्य शुद्धत्तच्छुद्धिः । तच्छुदधेस्तद।उम्बनद रीन प्रविविच्यते । तसप्रविषे केनाप्यायिता बुद्धिरस्य योगिनः ॥
गुणेभ्य इति विषयप्रतिपादनम् । पूरस्तु टदशानुश्रव्रिकविषयेम्ये) (ऽपि) विरक्तः । एष तत्कारयेभ्यो गुणेभ्य एव । व्यक्ताव्यक्तपगकेभ्यः- महदारिसंश्िता व्यक्तधमका; । प्रधानाव्यिता अन्यक्तधभेकाः | तेभ्यो विरक्त इति । त॒त् द्यं वेराग्यं पूर्वामेद च। तत्न यदुत्तरं पुरुषद शननिमित्त गुणविषयं त्ञ्ज्ञनप्र माद
क
मात्रम् } पुरषदरौनस्येव परः प्रविवेक इति यावत् ॥
पुरुषद शी हि हेयोपदेयदयन्यचित्ते। भवति | तदाह रपं ख्यानेऽप्य- कुपीदस्य सर्वथा विवेकख्य तिषर्मर्मषेः समाधिः" इति ॥
यस्योद्ये यस्य वैराग्यस्योदये । प्रसयुदितस्वोतिः प्रद्ुयनदसनः एवं मन्यते प्रात प्रापणीयम् इवयदि । एतस्य हि चान्तशीयकं केवल्यं तत
1, पा, 4. सु, 29
६ पातञ्जलयोगसुत्रभाष्यविवरणे
[ भष्यम् ] अथोपायद्रयेन निरुदधचित्तवृत्तः कथमुच्यते सम्भ्रज्ञातः समाधिरिति । [ विबरणम् | परं साधननपरक्षसरात् । वैराग्यस्य ज्ञानग्रसादमत्रते ज्ञानवैराग्ययोरनन्यवात् तद्विपरीतयोश्च रागाज्ञानयोरनयान्तर्वमेव सिद्धम् । एवं सति रगोऽप्यविचाय। एवावस्थान्तरमिति पश्चपव अतरिवेव्युपपनने भवति ॥
ननु चैवं बुदधेर्टगुणवे बध्येत । षड्गुणलं हि ध्यानावस्यमेदाम्यु- पगमात् । ज्ञानतरेऽपि वैराग्यस्य प्रसन्नतरप्वाम्युपगमः; । रगोऽप्यज्ञ(नस्या- वस्थान्तरविरोषः ॥
ननु चैवं सति ज्ञनाज्ञानयोरेकावस्थमेद।दष्टगुणस्वं पुनरपि न प्राप्रोति ।
नैष दौषः. फङव्खप्रलनीकलनियमात् । ज्ञनावस्थाचतुष्टयस्य फलवत्वेन भेद्- नियमः । तथा अज्ञानावध्याचतुष्टयव्रलनीकविनाधमीदिचतुष्टयनियम ईइलयष्टगुण- त्वसिद्धिः । धर्मादिप्रतिदन्धिन एव दहि गुणवेन नियम्यन्ते, नाज्ञानभेदाः स्वं एव ॥ १६॥ |
उक्तं पुरस्तात् सरज्ञातः समाधिवितकौचनुगत इत्युपरिष्टात् प्रवेद विष्यामः' इति । सोऽवसरपरात इदानीं लक्ष्यते । उपायद्वयेन् निरद्धव्तेः वैराग्यं परापरतेन व्याष्यातम् । अम्पासश्यापि द्विलं सामध्यौदवप्तीयते । कथम् £ विरिष्टमसम्भह्ञातस्तमपेरम्यापतं सूत्रेणैव वकष्यति--'विरामप्रयया- म्यासरपुंवः, इति । तेन ॒साठम्बनव्िरियः पवौभ्यास इति निश्चीयते । वक्ष्यति च -- (तसतिषेधा्म्ः एकतस्वाभ्याक्तः' इति ॥
माध्यकारोऽप्यवादीत्-- ववैराग्येण+ विषयक्नोतः विीक्रियते । विरेक ददनाम्यततिन कल्याणक्नोत उद्ध।व्यते' इति । नावोचत वृत्तिस्वखूयतिरस्कारमेव सम्भज्ञातस्तमाधेः । इृत्तिनिरोधप्रभवल्वमनिष्टविषयप्रबृयुपरमोत्तरकालभाविखा- पक्षया, वृत्तिषरिषयविरोषानुगत एव हि सः ॥
। ¢>. गय)
तथा च द्वितीयसूत्रे सम्प्रज्ञातस्य निरोधो न लक्षणमिति ब्याल््यातम् । अतः पू्ोक्तम्यसतैराग्योप्ायद्वयेन निरुद्धवृतेश्चित्तस्य कथमुच्यते -- कथं
प्रथमसूज्व्याख्यानावस्रे- धा. 1, तृ.. 18. पा. 1. घ, 32. पा. 1, सू, 12.
५
4 ~
समाधिपादः प्रथमः ७
[ सूत्रम् | वितकंविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञातः ॥ १७॥ [ भाष्यम् | वितर्कः-चित्तस्य आारुम्बने स्थूरु आमोगः । सुक्ष्मो विचारः , अनन्दो हवादः । एकालिमका संवित् असिता ।
| विवरणम् |] ठक्षणमुष्यत इति यावत्| वितकंविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञातः । अनुगमशन्दः प्रयेकं संबन्धनीयः । वितकानुगणमादिचारानुगमादानन्दानु- गमादसितारूपानुगमादिति । रूपरब्दो मात्रा्थौ वितकादिपू्धमंत्रयवर्जितत- स्यापनर्थः ॥ | । |
वितकफशित्तस्यारम्बने स्थूठ आमोगः । स्थूठ्(पि)मिश्रीमावः व्रथममाङम्बनाकररेण परिणममानस्य चित्तस्य य आटम्बनभ्यतिकरः स वितक्षः ॥ सु्षमो विचारः आभोगः सूक्ष्म इति संबन्धः । अनन्दा हद विचारः सुक्षमतर अआभोगस्तृतीयः । सानन्दता विरोषः । 'एकह्पासिका सविदस्मिता स्वस्यां प्रकृतावस्मितायां समपन्स्य असिता प्रल्ययमात्रता एकरूपालमकलम । तथ। चोदाहरिष्यति-- स्तमणुमालानमन्ववैत्यासीयेतावत्स- जानीत हते ॥
ननु चास्मितां हरोषु पठिष्यति "छदर्शनश्कतयेरेकारमतेवोस्मिताः इति । तत्कथमिव स्मिताख्येण हरेरोेन समाधिरनुगम्पत इति । सल्येवं -- प्रकृष्टस्वकारणाकारावमा्तकलतादन्यविषयविनिवृत्तासकतवाचास्मितायाः -समाधि- रूपतेऽप्यदोषः ॥
यदि षा अ्तितारूपस्याठम्बनस्याविधालेऽपि न योगिप्रल्यस्या- विद्यात्वम् । न हि खदु परचित्तविविदिषार्यां परस्य विधात्वम् । न हि खदु परचित्तप्र्ययं गृहन् परकीयाविधाप्रद्ययरूपाटम्बनदोषेण स्वयमविध।वान् भवति ॥
1. मुद्रितग्रन्थे तु माष्यपाठः (एकात्मिकाः इति।
2. पा, 1. सू, 36. अत्र तमणुमात्रमात्मानमनुषिद्यास्मीदतावस्सप्रजामैति" इति मुद्रितमाष्यपाठः। 3. पा, 2. सू, 6.
४८ पातञ्जल्योगसुत्रभाष्यविषरणे
( भाष्यम् | „< तत्रः: प्रयमः चतुष्टयानुगतः समाधिः सवितर्कः ! द्वितीयो वितकैवि कलः सविचारः । तृतीयो विचारविकरः सानन्दः । चतुः तद्विकलोऽसितामात्र इति । सवै एते साठम्बनाः समाधयः ॥ १७॥
अथापम्भरज्ञातः समाधिः किमुपायः ? किस्वमावो वा! इति-- [ सूत्रम् ] विरामप्रययाभ्यासपूवैः सस्कारलेषोऽन्यः ॥ १८ ॥ [ विवरणम् ]
यः पुनः बशः स विपर्ययविरिष्ट एव । यथा--अहं गण्ठामि कृरोऽहमितिः। योगिचित्तस्य तन्न्यगभूत रजस्तमसी इति न तया ॥
तत्र पवः पूतैः स्वकीयोत्तरोत्तरधमानुगतः | परः परस्तु पूवेपूतरषम- विकर; । यस्मन्चेतद्धमचतुष्टयानुगत एवायं सम्प्रज्ञातः समापिस्तस्मदितष्ठक्षण इति लक्षणार्थं सूत्रम् । ठोकेऽपि यो यदसाधारणधमीनुयातः स तद्टक्षणः, यथा साल्ञदिरक्षभो गोरिति ॥
अस्मितापात्रप्रहणान्निराठम्बनतमिषां समाधीनां मा कश्िद।शङ्किटेव्याह- सर्वं एते साठम्बना इति । यः पुनमन्यते निर्विकल्पत्वमस्तितेति-- तदसत् । असिताशब्दस्याहङ्कोर प्रसिद्धल्रात्. । तथा चाह--अस्मिमावोऽप्तिता ॥ १७.॥
अथ अस््रज्ञातः 'योगधित्तव्रत्िनिरोध' ह्युपपादितखक्षणः किमुपायः किंतसताधनः केनोपयेनेपिल् इल्यः । रकिंस्वभावः रकिंस्वरूप; क्रिमवस्थ हति स्वभावविशिष्टसाधनसंबन्धप्रदसीनार्थमाह- विरामप्र्ययाम्याष. पैः संस्कारसेषोऽन्यः ॥ `
` " “ विरमप्र्ययाभ्यापपू्ै शयेतावता साधनसम्बन्धमाचषटे । सेस्कारशेष इति तु स्वमवभ्या्यानम् । अन्य इति अनन्तरोक्तरक्षणात् सम्भ्ज्ञातादन्योऽयं
निर्बीजः अप्षम्प्रज्ञातः ॥ ` :
` अन्य इतयुमाभ्यां सेव्यते --विरामप्रत्ययाम्यातपूर्वशच संस्काररोषश्च.। कोऽपाबुभयविशिष्ट इद्याद-अन्य इति ॥
समाधिपादः प्रथमः ४९
[ भाष्यम || सवेत्रत्तिप्रयस्तमये संस्कारशेषो निगोषश्चित्तस्य समाधि. रसम्परज्ञातः । तस्य परं वेराग्ययुपाधः । प्ाठम्बनो द्यभ्यापस्तस्पाधनाय न कट्पत इति विरामभ्रययो निर्वस्तुक अ।ठम्बनीक्रियते । स चाेदयुन्यः। तदभ्यासपूरवकं हि चित्तं निरारुम्बनममावप्राप्तमिव मवतीव्येष निर्बीजः समापिरसप्रज्ञातः ॥ १८ ॥
[ विवरणम् | षिरमणं विरामः । विरामश्चासै प्रलयश्च विरामप्रलयः । विरामरू्पल्रात् स एव प्रघ्ययो विराम इत्युच्यते । सैत्रिषयेम्यो विनिवत॑मानस्य विनिवर्तनकाठे प्रागग्र्ययापत्तेः प्रल्ययकूपत्वम् । एतथथा- प्रावकस्य जरतः प्रक्षीयमाणेन्धनस्य रानेरदानैरपशाम्यतः प्रागङ्गारतापत्तेौस्कता ॥
तस्माद्विरामखूपः प्रलयो विरामप्रययः तस्य अभ्यासः पूवो मुखं यस्थ सः विरामप्रययम्यापपृर्रैः । संस्कार एव शेषो यस्य स सस्कारशेषः | प्र्ययेपरमे तु प्र्ययत्तस्कार एवरषिरिष्यते | व्िषयप्रह्ययेम्य उपरतं चित्त संस्काररेषेमेवेव्यथः । तस्य परं वैराग्यमुपायः तस्य समाधेः परसुत्तरम् ॥
ननु च परं वैराग्यं चति वक्तभ्यम्, अभ्यासतरैराग्याम्यां वृत्तिनियेधस्या. भित्रेतत्वात् | नेष दोषः | विरामप्रल्ययाम्यासस्य सूत्रोपात्तत्वादनाराङ्कधस्तदभ्य।सः। वैराग्यं पुनरनुपात्तत्यादाशङ्कथेत । तस्मात्तदेव प्राप्यता न चा [चः] पठितः ॥
ययेवं कस्मान सूत्र एव वैराग्यग्रहणं कृतम् १ पूर्त पठितघात् । तत्र किमर्थं पठ्तिमिति चेत् वैर'ग्यप्रपङ्गात् । पूमवैराग्यविशेष एतरोत्तरं वैराग्पमिति प्रसङ्गादुत्तरम् [दृक्तम् ] । पूतस्य च वेराग्यस्य सम्प्ज्ञातव्रिषये(ऽपि)विनियोग।दव- शिष्टत्य परस्य साधनघ्रादन्यकविषयलाच्च निर्वीजेनेव सम्बन्ध इति न सूत्र वैराग्यग्रहणं कृतम् । सामर्थ्यत्रापषं तु भाष्यकारो दरयति ॥
अम्याप्तवेराग्याम्यां तनिरोष इति हि प्रतिपदितम् । साटम्बनो हयभ्यासो विरुदत्वानिराटम्बनस्य समये: साधनलाय न कल्पत इति निर्वस्तुकोऽपि विरमप्र्ययो निरालम्बनत्माध्यनुरूपत्वादाठम्बनीक्रियते । तस्मात्तदभ्यासवेराग्योपायपूर्वंकं चित्तं निराठम्बनममावप्राप्तापिव मवति ।
स॒ एष निर्बीजः सस्काररषस्ठमवरः समापिरसम्प्र्ञ।त इति ॥ १८ ॥ त्र
५० पातञ्जलयोगसूत्रभाष्य्िवरणे
[ भाष्यम् | स॒ खल्वयं द्विविधः-उपायप्र्ययो भवप्रययश्व । ततरोपाय- पर्ययो योगिनां भवति ।
[ सूत्रम् | भवप्रययो विदेह प्रकृतिटयानाम् ॥ १९ ॥ भष्यम् | विदेहानां देवानां भवप्र्ययः। ते हि स्वसेस्कारमत्रोप(यो)भोगेन
चित्तेन -केवस्यपदमिवानुभवन; स्पंस्कारविपाकं तथाजातीयकमति- वाहयन्ति । तथा प्रकृतिर्याः. साधिका चेतति प्रङ़ृति्खने केवल्य- पदमिवानुमवन्ति, यावन्न पुनरावतेतेऽधिकारवशाचित्तम् इति ॥ १९.
[ विरणम् ] ञ स॒ खल्वयं दिविधः। सः निर्वाजः समाधिः उपायप्र्ययो मवप्रययशच । उपयेन प्रतीयते प्राघ्यत इध्युपायप्रययो योमिनां भवति । यपि विदेह। अपिं योगिन एव । तथापि यमादियोगपताधनानुष्ठायिनोऽभिप्रेताः । तेषां श्रदवावीर्या- युपायलम्थः समापिः ॥
विदेहप्रकृतिख्यानां तु जन्मनैव रम्यः । तेहि तनुतरप्रतिबन्धावशेष।ः । स ` तु. प्रतिबन्धावरोषस्तेषां सञृदासादितपुनजेन्मनां समाधिव्याघाताय न परीप्रोति । स तु जन्मप्रतिखम्भमत्रनिभित्तम् | (त्वात् )्ञानेराग्यायनुष्ठान किला - द्िदेहध्रकृतिरुयत्वस्य तदनुष्ठानस्तुय्थं सूत्रम् । इदस हि तदनुष्ठानमाहात्यम् । यदुत सामर्थ्यादिवैकल्यादभप्तितफलानवाप्तावपिं ` महनीयतरं विदेहप्रकृतिखयत्व प्राप्यते ॥
विदेहा नामः देवाः पुग्रष्टकरादरेपव्न्धाः । ते स्वसंस्कारमात्रोपभोगेन वैराग्याम्पासाहितः सेस्काररेषस्तन्मात्रोपभोगेन चित्तेन कैवस्यमिहानुमवन्त इति । सखगुणविनिभोकात्तथाज।तीयकं स्वसस्कारपरिपाकं क्षपयन्ति ॥
~ प्रकृतिलय: साधिके अपथवर्तित।[धि]क)रे । यावद्धि न कृत। गुणपुरुषान्तस्ट्यातिः, ताव्रदपरिसमाप्त।धिकारमेव चित्तं `तस्िन् प्रकृति- यापने कैवल्यमिवानुमभवन्तीति । पूर्ववत् । यावन्न पुनरावतेतेऽधिकार- वरात् व्रियाकर्तन्यताव्रात् :तावदनुभवन्ति केवल्यमिव ॥ १९ ॥ .
सभाधिषादः प्रथमः ५५१.
सूत्रम् ; श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूवेक इतरेषाम् ॥ २० ॥ [ भाष्यम् | उपायप्र्ययो यमिनां भवति । श्रद्धा चेतसः सम्प्रपादः । साहि जननीव कल्याणी योपिनं पाति । तस्य हि भ्रहषन्य विवेकार्थिनो वीये- मुपजायते । समुपजातवीयेस्य स्प्तिरपतिष्ठते । स्ृत्युपस्यनि च चित्तमन- कुठं समाधीयते । समाहितचित्तस्य प्रज्ञाविवेक उपावतत, येन यथाथ वस्तु जान।ति। तदभ्यासत्तद्िषयाचच वैराग्यात् अपम्भज्ञातः समाधिभवति॥२०॥ ते खलु नमर योगिनो मवन्ति मृदुमध्याधिमत्रापायाः। तथथा--. मृदुपायो मध्योपरयोऽपिमात्रोपाय इति । तत्र मृद्पायलिविधः-- मृदुसंवेगो. मध्यसंवेगस्तीवरतैपेग इति । तथा मध्योपायस्तथाऽषि- मात्रोपाय इति । तत्रापिमात्रोपायानाम्-- ` [| विवरणम् ] येषामुपायप्रल्ययो योगिनां, तेषां श्रद्धावीयस्मृतिसभाषिप्रज्ञापू्कः समाधिः, श्रद्धा नामापवरगप्रततो तत्ताधनश्रवणे च कतकफलपपर्कं इव सलिलत्य चेतसः [सम्प्रादः] सेप्रपत्तिः। सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति रकषवयञचभेभ्यः। तस्य हि विवेका्िनः सम्यग्दरीनाधने। वीर्यम् उत्साह उपजायते योगप्ताधनावुष्ठानं प्रति । सञ्जातवरी्यस्यागमज्ञानादिषिषया दृढतया स्मृतिरपतिष्ठते । विवेक।यिन इति सवत्रानुप्रञ्यते ॥ | = टृदस्मृत्युपस्थाने च चित्तमनाकुठं समाधीयते । समाहितचित्तस्य ्र्ञाया बुद्धेः विविक्तता सर्वाचप्रकारानताम्यम् । त(था)त् विशिनष्टि- येन यथामूतम् आल्मादि वस्तु जानाति इति ॥ दभ्यसात्-- एतदुक्तं भवति--अ(त्मदशंनविरामप्रस्ययाम्यास्तादिति ।. तदिषयाञ वेरारया(्यादिषया)त् परस्मद्विराग्यादिति .। अपभ्प्रज्ञातः समाधिः इति ॥ २०॥ तेऽपि श्रद्धादिमनाधना नव “नुपोयोगिनो भवन्ति । तहरीयति.- तद्यथा: मृद्पायो मध्योपायोऽषिमात्रोपाय इति । तेषाेकैकल्षिधा भिघते-- तत्र मृदुपाय इति। साधनानुष्ठानं प्रति मन्दोपक्रमे मध्योषक्रमः ती(नकषतरेगो)त्ोपक्रम,. इति । एवमितरत्रापीति । नात्र तिरोभूतम्(त्) ॥ | ।
५२ पातञ्जख्योगसूत्रभाष्यविवरणे
[ सूत्रम् । तीत्रसंवेगानामासन्नः ॥ २१ ॥ भष्यम् ] समाधिलाभः समाधिफ़टं च मवति इति ॥ २१॥ सूत्रम | ग्रदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ २२ ॥ [ भग्यिम् ] मृदुतीमो मध्यतीत्रोऽधिमात्रतीत इति । ततोऽपि विशेषः तदिशेषादपि, मृदुतीव्रहवेगस्यासन्नः;, ततो मध्यतीत्रसंवेगस्यासन्नतरः, तस्मादधिमात्रतीव्रपषवेगस्याधिमात्रोपावयस्याप्यापन्नतमः समाधिलामः समाधिफरठं चेति ॥ २२॥ [ भाष्यम् | किमेतस्मादवासन्नतरः समाधिभेवति, अथास्य कमे भवलन्योऽपि कथिदुपायो न वा इति- [ सूत्रम् | ईश्वरप्रणिधान ¦ २३॥ [ विवरणम् ] तत्राभिमत्रोपायानां तीत्रस॑वेमानामासन्नः समाधिरामः समाधि फलं च ॥ २१॥ तेषामपि मृदुमध्यतीत्रोपक्रमतया विरशिष्यमाणलवत्तते(ऽपिविशेषः साधनानुष्ठानसंस्कारस्य | तद्िशेषादपयुत्तमस्य समापिखामः प्रस्यासीदतितयम् ॥ एतदस्य सूत्रस्य प्रयोजनम् योगप्ताधनाुष्ठानं प्रति योगिनः कथमुपव्रहितो- त्साहा भवेयुरिति । यथा लेके हुततरं सीमान्तं परिप्रति]धावतमितत्फरं भवतीति तद्त् । अथवा- मन्दमन्देतदेपक्रमाणामपि योगिनामभिमतफडावप्ति- प्रकाशनादनसनचेतसतः प्रवर्तरन्निति । इतरथा तीनरतरायास्तजनितमीतयेोऽवीदे- युरिति ॥ २२॥ | किमेतस्मादेवाप्नतरो भवति ! अथ (तस्व) अस्य कमे भवः
न्योऽपि कश्चिषुपायो न वेति । उपायान्तरमस्तीत्याह-- ईेथरप्रगिषानद्वा । ृरशष्दारथपुत्तरत्र म्याद्यास्यति । प्रणिधान॑मिह व्याचे-भक्तिविशेषा-
समाधिपादः प्रथमः ५३
[ भाष्यम् | [घ [क ९ ४१५ मि प्रणिधानात् भक्तिविरोषादावर्जित ईरः तमनुगह्णायभिध्यान- मत्रेण । तदभिष्यानमात्रादपि योगिन आपन्नतरः समाधिलाभः स॒माधिफटठं च भवति इति ॥ २३॥
अथ प्रधानपुरुषव्यतिरिक्तः केऽयभीश्वरो नामेति ।
[ सूत्रम् | देशकमविपाकारायैरपरागृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४॥
[ भाष्यम् | अविद्यादयः शाः । ईशलाङ्कश्राति कमणि । तत्करं
विपाकः । तदनुगुणा वासना अशयाः। ते च मनसि वतमानाः पुरुषे व्यपदिश्यन्ते । सहि तक्फठस्य भोक्तेति । यथा जयः पराजयो वा योद्धृषु ततेमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते । यो ह्यनेन भोगेनाप्रामृष्टः स पुरुषविशेष ईरः ।
[ विवर्णम् ] द्ावर्जित इति । अनुग्रहं प्र्मिमुखीभावमपादितः तं मक््यतिशययोमिनं योगिनम्, अमिध्यानमात्रेण परमेश्वरत्वदिव् निरायासतया सप्यसंकल्पत्वात् अनुगरृह्णति । तदनुग्रहादपि प्रल्याप्रज्नतरः समाधिलाभः फे च इति ॥ २३ ॥
अथ प्रधानपुरषव्यतिरिक्तः कोऽयमीश्वर इति सांस्यशान्ञे प्रसिद्ध मावादीश्वरसद्भवि चेपपत्तिमवदईयमनवगतेश्चरवरिशेषो वा पृच्छति । तत्र तावत् प्रतिजर्नति-ङ्धेरकमेविप।काशयेरपरामृष्टः पुरूपविरोष ररः ॥
छ्ेश। इति। अविधयादयः हशयन्तीति ढेशाः। तपूर्वानुितानि कुशला- कुरालानि कमणि । कुशखानि चङ्ुशलनि [च ऊुशकुरखनि] चेत्येकशेषः । कुरशट कुराानीति कुशककुश्विभिश्राणीति यावत् । त्फटं विपाकः जात्याघरुमोगलक्षणः । त एव ङ्केशादय अ। निव(गच्छेरत इति शकः विपाका आद्याः । यदि वा इ्रादीनां रारापः कशकमविपाकाराय।ः ॥
ते मनसि वतमाना मनोदृत्तिप्रमवलात् पुरुप व्यपदिश्यन्ते ।
च चे, (न कस्मात् £ सु हि तत्फर्स्य भोक्तेति । यथ। राजनि जयपराजयौ योधेषु वक्षमानत्रपदिश्येते तत्फरं राज्तबन्धि इति ॥
५४ पातज्ञलयोगसुत्रभाष्या्िवरणे
१ [ भाष्यम् |
केवल्यं प्राप्तिं ? सन्ति च बहवः केवठिनः ।
ते हि त्रीणि बन्धनानि च्छि्ला कैवल्यं प्राप्ताः । ईश्वरस्य च तत्सम्बन्धो न भूतो त भवी। यथा मुक्तस्य प्रौ बन्धकोटिः प्रज्ञायते नेवमीश्वरस्य । यथा वा प्रकृतिलीनस्योत्तरा बन्धकोटिः सम्भाव्यते नेवमीश्वरस्य । स तु सदैव मुक्तः सदेकेधर् इति ।
योऽप्तौ प्रक्ृष्टसच्वोपादानात् ईश्वरस्य शाश्वतिक उर्कषः, स के सनिमित्तः! आद्दोखित् निनिमित्तः? इति- तस्य शास्रं निमित्तम् । नि , { विवरणम् ]
या यनेन मोगेनापराभृष्ट हति उच्यते । न क(ठविवक्षा, उपटन्नणाथल्ल- न् परामृश्यते न्[पि परामृ्ष्यते न[[प प्रराबृष्ट इ।त | शकम ` विपाकाडय्यसबन्धी(न्धयेगी)त्ययः ॥
[१
सूर यविदद दुर्वनाह-केवव्ये प्राप्तस्त्हीति । छेराधपरामरौस्य कादाचि्कतयाऽपि सैमवात । सन्ति बहवः केषलिनः किं तदी[तिऽपी]घरा इति ? । परामर्शस्यापि संभवान्न त ९कान्तेन क्शादिभिरपरामृष्टाः । परामरापरामरशौ हि स्तः तेषाम् । शशरप्वपरामृ्ट एव । न द्यनवधृतः शब्दार्थो लक्षणव्वेनो पायः अपरामृष्ट इति । तसमाध एकान्तेनापरामृष्टः स एवापरामृष्ट ह्युच्यते ॥
“` तेहि त्रीणि बन्धनानि प्राङृतवैकृतदा्िणानि सभ्यग्दरशनेन हित्वा कैवल्यं प्रा्ठाः । ईश्वरस्य तु तत्तबन्धः छेशादिसेवन्धो न भूतो यथा मुक्तस्य वा बन्ध रोरिधुक्तसोपपतेत ज्ञायते। । बन्धपूर्विकरा हि सुक्तिः। नापि भावी। यथा प्रकृतिलीनस्य । तस्य ह्यनारन्धसंसारस्य उत्तरा बन्ध कोटिः सम्भाव्यते । प्रवृत्तसंसारस्य चाप्रकृतिखीनचित्तस्य सा(समा)धिकारत्वात् पूर्रोत्तरबन्धकोदी समवतः । तदिदं सर्वमत्रपरागृष्ट इति काठाविवक्षप्रदरौनार्थम् । स तु पदैव मुक्तः सदे वेश्वरः ॥
तत्र पुरुषविशेष ईश्र इत्युक्तत्वात् , ईश्वरस्य पुरुषस्थानैखर्यपमलात् , चित्तस्य चैश्व्यधर्मलात्, निरातिरायेश्््य च प्रकृष्टचित्तसबन्धपेक्षत्वात् व्रा्तमेवेत्तराधपरुवदति-- योऽपो कृष्टपच्वापादानादीश्वरस्य -शाश्वतिंक
[¢
उत्क इति । नित्यनिरतिशयसव्ञनैशयेराक्तिसम्पत्तिरेकषः ॥
समापिषादंः प्रथमः ५५५.
[ भाष्यम् ] शास्त्रं पुनः किज्निमित्तम् ? प्रकृ्टपर्वनिमित्तम् ।
[ विवरणम् | तत्र प्रतिज्ञाविशयद्धवयं प्रन्नपूर्षमुपक्रमते-- प फ सनिमित्त आहोस्वि त्रिनिमित्त इति । निमित्तशब्दः कारणपयौयः । स किं सकारण अहेस्वि- निष्कारण इति । किंश्चातः १ यदि तावत् सकरारणस्तदा सदैवेश्वर इत्ययुक्तम् , अनिदयघ्वात् | अथ निष्कारणः, तथा चोत्कर्षस्य कायत्वादसत्वप्रसङ्घः । न हि निष्कारणं काथ द्दयते लोके ॥
चत्रोच्यते-- न निष्कारणः शाक्ञतिमित्ततात् । शाक्ञ ज्ञानम् । रालस्य हेतुत्वात् । यतः सर्वविषयं ज्ञाने नित्यं दरन्यस्वमावत्ताध्यसाधनभ्यवदहित- विप्रकृष्ट स्षदम् ॥
ययेवं ज्ञानस्यान्यतोऽधिगमपूवैष्वास्रागनुर्कषः प्रतत इत्यत आह- दाख पुनः किन्निमित्तमिति । यदि स्वाभाविकं ज्ञानं, मततोन्मत्क्ञानवदनुत्कर्ष- हेतुत्वम् । अथ पुनः सनिमित्तकं, निमित्तात् प्रागनु्कध इति मन्यते ॥
न तावनिर्निमित्तम । यतः प्रकृष्टस्वनिभित्ते ्रकृ्टसतत्वाश्रयमिति यावत् । अत एव स्वभवज्ञानदोषमावः ॥
किञ्च- स्वाभाविकज्ञानसेऽपि न मत्तादिज्ञानवदपकषहेतुत्वम् । नित्य मक्त्केशादिसच्ाश्रयत्रात॒ । तत्र यथेव . ज्ञनपेस्कारस्मृतिप्रवन्धानानन्येन्य्-
|
निपित्तनैमित्तिकमव्रेन बीजाङ्कुरषदनादिसंबन्धः, तथेव २ जप्रकैयोरीश्चर- चेतति नित्यप्रबृ्तप्रबन्धख्पेण प्रवतमानयोरनाचन्तः संबन्धः । तत्रेत्कर्षो ज्ञानस्य करायमेव । ज्ञानमपि तस्य कारणमेव ॥ _
अन्येषां! व्य्यानम्- निमित्तशब्दः प्रमाणवाच । तस्य श्चास निभित्ते प्रमाणम् , तेन हि तदुत्कषेः प्रमीयते । दाः पुनः विप्रमाणकम् ! .ईंरनिर्म- सखप्रमाणम् । विडुद्धत्खप्रणीततवाद्धि शा्ञस्य प्रामाण्यम् › यथ। मन्वादीनाम तथा च श्रुतिः श्यकिचिन्मनुरम्यवदत्तद्वेषजम्" इति । यथा. च छेके गुरणाऽभिहितीमति ॥ ` क ५ व्याख्यातारः । : ` - ए `
५8 पातञ्ञटयोागसूत्रभाऽयविवरणे
[ भाष्यम् | एतयोः शान्नोकरषयोरीश्वरसच्वे वतैमानयोरनादिः सम्बन्धः । एतस्मादेतद्धवति- सदैवेशवरः सदैव मुक्त इति । तच्च ॒तध्यैशव्ष साम्यातिशयनिनिगरक्तम् । न तावदेश्वयन्तरेण तदतिशय्यते । यदेत्रातिशायि स्यात्तदेव तस्स्यत् । तस्मात्र कष्ठाप्रा्िरेर्थस्य स ईश्वर इति । न च तत्समानमेश्वयंमस्ति । कस्मात् १ दयेोस्तुल्ययेरेकस्मिन् युगपत्
[ विवरणम् ] एतयोः शाक्ञत्कपैयोः प्रमाणप्रमेयतया निराचन्तः सम्बन्धः ॥ ननु च नेवेश्वरसच[आ]र्तमानेन शान्ञेण तदुर्कर्षैः प्रभीयते । नैष दोषः । तस्प्रभवत्वात्तत्र वेत॑मानम् । वरत(मान)त एव तल्रमवमपि शाज्ञं तस्मिन् सर्वज्ञसवदेव । ठोकेऽपिं यते यत््रभवति वर्ते तत्तस्िन् , यथा तन्वादिष पटादि । तल्मभवत्वमनुमानागमाम्यामवगम्यते । शाक्लप्रमाणकः उत्करैः, ईघरप्रमाणकं
न कभक
शाल्नमिति भिनाश्रयत्वाच्छाक्लोव्कर्षयोर्नेतरेतराश्रयत्वम् ॥
ननु च उाह्ञादीश्वरपरामाण्ये, तघ््रामाण्याचच साच्प्रामाण्यमिति स्यदन्यो- न्याश्रयत्वम्--उष्यते-{श्वरप्रामाण्यस्यानुमानेन सिद्धव्वाददोषः ॥
एतस्मादेतद्धवति । कस्मात् ! ईरपरकृष्टसच्ाश्रययेर्निरतिशयक्ञानो- त्करषयो; कायैकारणद्ये प्रवन्धनिलतया नि्यवदेतद्भवति--स तु सदेव मुक्तः सदैवेश्वर इति । (इयतराह) तच्च तस्यैश्वयं॒साम्यातिशय वियुक्तमिति वक्ष्यमाणव्रमाणफलम् । एतत्सूत्रपिण्डार्थो वा ॥
अतिरायविमुक्ततां व्याचे-- न तावदैशर्यान्तरेण तद तिशय्यते । कुतः? यदेवैशवर्यान्तरं तद तिशयानं मन्यते तदेव तत् रें मथाऽमिदितम् । कतरैवे- शर्यन्तरातिशायि भवधयश्वै स एवेश्वर इति यावत् । न च तत्समानमेशर्व- मि । समानधमप्रकषोसेमवात् ॥
न द्येकस्मिन् रथ्ये दयोः समवो रज्ञो; । एकस्य वा दवै र्ये । तथा प्रतिपादयति- तदृदरयेस्तुल्पलवं प्रसक्तम् । न धेकः्यान्यतसत्र प्राकराम्यमनाधित्वा अन्यतरसिमन् प्रवृत्तिरुपपद्यते । दयेश्च युगपदेकाथयोरेकस्य प्राक.म्पेण श्रचत्तितव नास्ति | प्रकामिते वस्तुनि समानप्रकर्षस्याथस्य विरुद्धत्वात् । येन च समानव्रकषेता तस्य तेनैव स बध्यते | (तेच) तच्च न वाचा बाधर्नमितरध्य खूपातिराया आद्ृस्यतिरायाश्च विरृध्यन्ते । सामान्यानि लतिशयेः सह् वतन्त इति वक्ष्यामः ॥
समाधेपाद्ः प्रथमः ५५७
[ भाष्यम् ] कामितेऽयै गवमिदमस्त॒ पुराणमिदमस्त॒ शइयक्स्य सिद्धो इतरस्य प्राकाम्यविषाताद्नलं प्रसक्तम् । द्वयोश्च तुल्ययोयुगपत् कमिताये- ्राधषिनासि । अर्थस्य विरुद्धत्वात् । तस्मात् यस्व साम्यातिशवे- विनिधक्तमैश्वयं स एवेश्वरः । स च पुरुषविशेष इति ॥ २४ ॥ [ सूत्रम् | त॒त्र निरतिशयं सवंज्ञबीजम् ॥ २५ ॥ [ भाष्यम् ] कि --यदिदमतीतानागतप्रलयतसन्प्रयेककषुचयतीन्दरियग्रहदणमल घहिति सर्वज्ञवीजमेतदविवधैमाने यत्र निरतिशयं स सवैज्ञः । भसि काष्ठप्राप्षिः सवज्ञरीजस्य, सातिशयस्वात्, परिमाणवत् इति । यत्र काष्ठाप्रा्िज्ञीनस्य स सर्वज्ञः । घ च पुरुषविशेष इति ॥
[ विवरणम् ] तसाधस्य साम्यातिङयविप्रोषितमैश्ययं स रर इति प्रधानपुरुष- व्यतिरिक्तः पुरुषविरोष श्वरः सिद्धः ॥ २४ ॥
यथप्रतिज्ञातस्येश्चरस्य सिद्धो प्रमाणमुपन्यस्यते- तत्र निरतिशयं स्वै ज्ञबीजम् । तत्र तस्मिन् यथप्रतिज्ञातलक्षण ईश्वरे निरतिशयं भव्रितुमर्दति । करं तदिति ? यदिदम् अर्न्यमि चारि प्रलक्नातुमानज्ञानम् अतीतविष्रयम् अनागत- विषयं (वतेमनकालगप्रस्युसन्न[बिषय]मतोतदि पमुच्चयविषयम् अतीद््िय- विषयं च । अतीद्धिययोरतीतानागतयोः सभव।दतीन्दिय[ग्रहणा]मिद्युच्यते ॥
तच्चातीन्दियग्रहणं त्रिविधम्--सुक्ष्मविष्रयं व्यवहितविष्रयं विप्रकृष्ट विषयश्च । अल्पं बहति । यथप्रतिद्धमेतद्विव्मानं सातिरायतेन सर्वैज्ञवीजं यथा धूमविज्ञानमभ्निविज्ञानस्य । कथम् १ यत्र प्रकपकाष्ठ प्रतिपधते । ज्ञानस्य ज्ञत्रा- श्रयघ्रात् यत्रेति ज्ञातोच्यते--यसिन् ज्ञातरीति । स॒ सृप्रज्तः सिद्धः॥
तथा शक्तिरपि सातिशयेन विवधमाना यत्र काष्ठां भ्रपोति, प सवेशक्तिः । तेन जगननिमीणस्थापनोपपंहारादिकतृखसतिद्धिः । तथेश्वयस्थापि वर्धमानस्य यत्र काष्ठाप्राप्तिः, स परमेश्वरः । ततश्च अशाक्त्यादिविपर््यदोषा. भवसिद्धिः ॥
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५८ पातञ्ञखय।गसूत्रभाष्यविवरणे
अथापि स्यातू--अज्ञानस्यापि `विवर्धमानस्य स्वमवसिद्धस्य काष्ठा- प्राप्तस्य तस्मिननीश्वरे सिद्धिरिति-न--ज्ञानषिरोषात् । न हि ज्ञानज्ञनयो- विरुद्रयेरेकसमिनभिसंयेगोऽस्ति | न हि ज्ञनि प्रकषेवति तत्राज्ञानं संभवति ॥
यत्र हि अयोतिर्विवधते तत्र तमे।ऽपकृष्यत एव । विपयैयोऽपीति चेत्- तच्च न- सति ज्योतिषि तमकोऽनुपलम्भात् । व्रियमानं हि तमो अ्योतिषा तिरस्ियते, न कदाचिद्धिधमानं अ्योतिस्तमसाऽभिभूयते ॥
यदपि जल्धरोपरोषात् प्ादृषि खेरददीनम् , तदपि दृष्टिन्यवधानमत्रम् | न पुनः प्रकारा एव तिरोधीयते तमेावत् । तस्मान, यत्र क्ञानविव्ृद्धिस्तत्राज्ञानस्य मावः सवितरीवर तमसः । निदयाघ्यन्ततिरोहितस्जस्तमेगुणप्तच्वोपादानात् ॥
किश्च-- नात्ञानस्यावरस्तुविषरयताद्विबृद्धिः संमव्रति । ज्ञानस्य ज्ञेयवस्तु- विषयत्वादभिच्द्धचुपपत्तिः । अज्ञानस्य हि वस्तुविषये ज्ञानतप्राप्िः ॥
यश्चापि स्यावरादिषवज्ञानप्रकषे इति, नाततौ प्रक; । अ्यन्तज्ञानामावा- पक्षया हि स उच्यते | अह्नस्य प्रक्ष हि सलयज्ञानसहल्तस्य न ज्ञानेनैकेन बधः स्यात् । तथादि]हि प्रल्ञानं ज्ञनेनेष्पनेनानेकेन नाधनं स्यात् । तस्माना- ज्ञानस्य प्रकर्षः स्वरूपेण ॥
यस्य हि सातिशयं तस्य काष्ठप्रापि्सयते । यथा फठादिपस्िणाना- माकाशपर्न्तता । तथा स॒तैज्ञनीजमपि परां काष्ठा प्रप्तुमह॑ति ॥ -
समस्तं व्यस्तं च स्थं वस्तुजातमेकस्य प्रयक्ष, ज्ञेयत्वात् , घटादिवत् ॥
ज्ञान विषयत्वेन पुरु्राधत्वात् , घटादिवदेव ॥
उत्पत्तिमती च परथिवी, सावयक्तर(त् , षटादिवत् ॥
प्रणिक्मैततसाधनफलविभागविदेक(गधैक)निष्पादितं जगत् , तदुपभेग्य- स्थान।दिरचनाविशेषकव्खात् , प्रा्तादादिवत् ॥
अनेकप्राण्युपभोगविज्ञानवदेकनितिता प्रथिवी, अनेकप्राणवदुप- भोग्यत्वात् › बीहियवादिवत् ॥ -
अनेकप्रयोजना्थिना एकेन निर्मिता परथिवी, गृहादिवदेव ॥
सर्व्रण्याश्रयो गिरिनिदीपमुदायः तन्निवाक्षिपस्िगयेग्यविज्ञानवदेक- कुराखेत्पादितः, प्रकृतदेतुनिदरोनाम्यामेव ॥
समाधेपादः प्रथमः ५९
अनेकप्राणमकूप्रकादादिसामथ्यज्ञानवता शएकेन निवेतितः सवितः, प्रकारा्मक्रलात् , प्रदीपादिवत् ॥
नियतकालमादिव्योदयास्तमयादिसश्चरणम् पएतत्थ्रयोजनज्नानवदेकप्रयुक्त, परतिनियतकाठत्वात् , कृष्यादिवत् ॥
ुद्धिमदेकेरपरयुक्ता सूर्थप्रदचन्द्रनकषत्रादि ्रहृत्तिः, प्रबृतेदःखास्मकवे सति नियतसमयघवात् , ध्रिष्यमृद्यादिशदृत्तिवत् ॥
चन्द्रमसो वृद्धिक्षयौ तिध्यादिकालक्ञानवतकेन प्रयुक्तौ, कालपरष्छिद कत्वात् , धटिका[हिरा,दिवत् ॥
कारपलिनठेदज्ञानवतैकेन निर्वर्तितशवन््रमाः, दृद्धिक्षययुक्तताव् , ` धटिकादिषदेव ॥
बुद्धिमदेकस्वामिकं अगत् , अन्योन्यविरुद्धसंहतनेकप्राणिन।यकाषिष्ठित- बहुमण्डलत्वात् , इत्थजातीयककराञ्यवत् ॥
सप्रमेतत्साधनसाप्यन्य(पारावरस्येप्रद्यक्नं कस्यचिदेकस्य, अवान्तरत्रिरोधानु- प्रहवत्तयेकग्रयोजनतरात् , सांभ्रामवस्तुवत् ॥
सेहतत्वात् , कुखाडादिवस्तुवत् । सेव प्रतिज्ञा ॥
युमपच्च सव प्रलक्षमेक(त)प्य, अनेकते (त्व) सलयन्योन्य्बन्धात् , परसिद्धसम्बन्धानेकाथैवत् ॥ अश्नित्रादिसाधनसधनीये कस्यचिस्मलक्षे, साप्यक्ताधनरूपलात् ,
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मुजितृक्तिवत् ॥ ध सवो; शक्तयः कस्यचित् प्रद्यक्षाः, वस्तुलात् , घटादिवत् ॥
अ[वान्तरप्रतिन्धामावे सर्वं वस्तुजातं नैरन्तर्येण कस्थचिव प्रयक्ष, डान्दादिम्वेन सम्बन्धात् , द्राषीयत्तीमिव शष्डुरीं मक्षयनः शब्दादयः ॥
स्वतन्त्रतया केनचिदेकेन सव प्रसक्षत उपरम्यते, ज्ेयतवेनाभिमतत्वात् , नाख्यवस्तुवत् ॥ न ~ -.;:5
1
अप्रतिबन्धेन कस्यचित् श्र्यक्षोपरुम्यं सर्वम्, :अनेक(स्ते)ते सलयन्योन्यसंवन्धात् , नाव्यत्तबन्धिनर्तकादिवत् ॥ ` --- > ~.
६० पातन्ञटयोगसूत्रभाष्यविवणे
सेसाररहितः सहः, अज्ञानामाबात् , मुक्तासवत् । छेदादिरहित ररः, अप्रतिबन्धज्ञानल्वात् , सिद्धयोगिवत् ॥
एतेन देशादिग्रतिबन्धाज्ञानरदहितघेन चक्षुरादीद्धियप्रामनि पेक्षपर्ब- विप्रयज्ञानवं सिद्धम् । स्वाधप्रहणत्मथस्य परमेश्वरचित्तस्य सवव्यापिनो युगपत्््षविषययेोगित्रातु । ९वं सति समस्तवस्तुग्रहणामवि कारणामा(बानु)-
बोपपतिः ॥
नापि मूर्तिमल्रतिवन्धोऽप्याकाशवदेव सर्वविषययोगिनोऽपि चित्तस्य | विषयानवस्थानादाविभावतियेभावस्पृतिसकल्पानवस्थितत्वोपपत्तिः । विषया- कारतया बृत्तिखाभादर्कप्रमावत् ॥
न हि ज्ेशाघयावरणवच्छनं चित्तसत्म् , तस्याधर्मादियोगात् । सर्वगतस्य स्वार्थस्यापि सवस्याधर्मादिप्रतिबन्धकनिरुद्धस्वकीयप्रवृत्तिमार्गत्।दिन्दियादि- दरारपिक्ित्वमुपपयते । यथा अपवरकाधावरणाद्रतः प्रदीपस्तदावरणगत- च्छिद्रदरिण बहिः प्रकादायति | प एव तु प्रदीपः प्रमिन्नापतरकत्ररणः सन्नन- पक्ष्य तत्तच्छिद्रमा्गं समन्ततः प्रकाशयति ॥
तथेवेश्वरस्षख डशावावरणयेोगाभावाद सति विषयत्रिरेषनिरोधिकारणे युगपदरेषाथंग्रहणम् । ततश्च स्वातिलङ्खनानतिरङ्कनादिदोषामावः ॥
सर्व॑स्य विषयत्वात् सकमेकेश्वरं जगत् , परिपाल्कपेक्षस्थानायनेकवस्तु- विरोषत्वात् , प्रसिद्धवंभूतेकराञ्यवत् ॥ तथा, नियतस्थितिद्वतनकेपकरणवच्ात् , अन्योन्याभिमवनीय- प्रमूततरदुगैयुक्तनिकदेरालात् , अभङ्गुरन्यवस्थशरीरभेदवस्वाच्च, प्रतीतेव॑- विधेकराञ्यवत् ॥
अनेककर्तूमोक्तृक्रियासाधनफठप्बन्धविरेषज्ञ।नवदुपदिष्टानि वणश्रमा- पनुष्ठानानि, फलार्थिभिः प्रलवायभीरमिस्तश्वायुषठायमानत्वात् , भेषञ्यरसायनाथ- नुष्ठानवत् ॥
तथा तदुपदेशाः) परथेतरात् , उपदेशात्, विद्रन्छुद्धेयत्वात् उपदेशाइते भदुभ्यानवगम्यात्वाच, भेषञ्यायुपदेरावत् ॥
शरीरेन्द्रियाणि सवेतस्रयोजनविदेकनिमित्तकारणामिनिप्र्तितानि, नियत- क्रियास्थितिद्ेतुसाघनवस्वात् , प्रसादगृदद।रुयन्त्रादिवत् ॥
समाधिपादः प्रथः & १
नियतप्रयोजनरचनावचाच, तद्देव |
तथेन्दियाणि, करणात् , वासीब््षादानादिवत् ॥
तथा स्र, कयनियतेपादानल्वात् , मेक्त्र्थत्वात् › भोगसाधनत्वाश्, घटादिवत् । उत्पत्तिमेऽप्येते हेतवः ॥
एव ध्यमपसिणत्वात् , अनेकविनारहेतुसब्रन्धयोग्यत्वात् , भोगाधिष्ठानलात् , क्रियाफलपसाधनतदरूपादिमसराच) आअधीयमान।पचीयमानपूरय- माणापनीयमानदद्यमानमिधमानानेकदेरात्वात् , विनश्वरी पृथिवी ॥
शरीरादिवन्श्चराणि पृथिभ्यदि भूतानि, अन्योन्यनााकराक्तिमखात् , रान्चपुरुषदिषत् ॥
तथेव विरोधात्, पुरुषविपरीतत्वाच्च, उत्पत्तिविनाराधर्मकमाकारं, साक्षादुपकरणत्वात् , घटादिवत् बह्यन्दियग्रह्यगुणाश्रयत्वाच्च ॥
तस्मान्निरतिरायराक्तिज्ञनिश्वषैः परेश्ररः सिद्धः ॥
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अत्रोच्यत-ईश्वरशब्दाथः सवेज्ञो न भवति, प्रमेयत्ववस्तुत्वशब्दाभिषे- यत्वासत्रपाघनपेश्षोपछभ्धृष्वादिम्यः, अस्मद।दिवत् ॥
ईश्वरशब्दोऽपि निरतिशयज्ञनयुक्तमिधायी न भवति, शब्दत्वात् , घटादिरब्दवत् ॥
सर्वजञपर्वेश्वरसू-यं जगत् , अनेकप्राणिन्यपाश्रयलात् , अन्योन्यविरुद्धाने- कनायकराञ्यवत् ॥
भूतभविष्यत्काल्योरपि इदा्न।मिव सर्वज्स्यानुपटन्धारः सर्वप्राणिनः, प्रागित्वात् › अस्मदादिवत् ॥
वाचन्तरपारिकधस्पितः सर्वज्ञः सर्वश्रश्च नस्ति, अनुपलम्यमानत्वात् , दाराविषाणवत् ॥
तथा अपतवज्ञोऽनीश्वरश्च, अरशैरत्वात् , सुक्तासवत् । सशरीरशेद्धमी- धपेक्षरारीरते, तथा च संसारित्मस्मदादिवदेव । अशरीरसमेवेति चेलगत्कर्त- तवानुप्राहकवाधनुपपत्तिः, मुक्तत्निदशेनेन ॥
विरिष्टपरिभोगयोग्यजगद्रचनाविरोषोपपनत्तिः स्वभावादेव, कण्टकतीक्ष्ण ख कुमुदकमलक्तङ्कोचविको चादिवत् । निशाकरदिवाकरत)रकादिगमनागमनाधपि स्वाभाविक, रोहायस्कान्तमणिवत् ॥
६२ पातञ्ञलयोगसुत्रभाष्यविवरणे
अत्रामिधीयते--सखामाविकी तावन्न भवति प्रयिव्यादिरचना । टृ्न्तो नेव तव्साधनस्य विधते | कण्टकादीनां च तिक्षण्यं न स्वाभाक्रिकमम्युपेयते ॥
अगन्यादीनामिवौष्णयादि स्वभावो वस्तुधर्मत्बाद्धेनोः ` परयिन्यादिरचनेति चेत्-- प्रासादादिस्चनाय। वस्तुधर्मवात् स्यादनैकन्तिकत्वम् ॥
अथ स्वामाविकल्वादिति चेत्- असिद्धम्, जगद्रचनाय। धमाीधमे- फलोपभेगायप्रयुक्तववाम्युपगमात् । कतृधमाधमाप्तिमुपरिषटात् स।धयिष्यते ॥
तस्मात् प्रथिष्यादिप्चन। स्वाभाविकी न भवति, प्रण्युपभागाथलवात् , प्रसादादिरचनावत् । चन्द्रादिप्रबरत्तिनं स्वामाषिकी, प्रवृत्तितात् , अस्मदादि- प्रवृत्तिवत् ॥
अस्मदादिभ्रवृत्तिरपि स्वामाविकीति चेत्-न-- अग्नयुष्णल्वान्नेयव्- ्रसङ्ग।त् । न ह्यन्नयुष्णलं स्वाभाविकं सन्नियते निमित्तमात्मलभाय कांति
धर्मिसत्तान्यतिरेकेण । क्रियाफर्रचनादीनां तु पिरिष्टनिमिचाका्घणमत्म- प्रतिरम्भयिति न स्वामाविकत्वम् ॥
। नियतनिभित्ताका्वणमपि प्रास्तादादिरिचनानां स्वभाव इति चेत्-- अस्तु तथात्रिधस्वमावतम् । तथाऽपि प्रथिन्यादिस्चनाया नियतनिमित्ताकाह्ण- स्वमावघ्वं प्रा्ाददिवदेव । ततश्च नान्न विप्रतिषत्तर्म दोषाय, कारकान्तरपि- कषत्वादिति प्रतिज्ञा प्रतिरूपकरिणी च ॥
भवद्धिरुक्तनि [भनुमानानि) लोकानुमागमविरोधात् {अप्रमाणानि] | अनुमान विरोधं तावत् सातिशयत्वादिम्यो ब्रमः ॥
आगमविरोधं च ५यः सवज्ञः' संवित्" “एकोः वक्ष” शेवमादिभ्यः समाचक्षपह ॥
{
समस्तलोकव्रिरोधंः चापि .।. सतै ` एवानाशनेपाठं संव्यवहरमाणाः सततं शिवनारायणादिनान्न प्रणिहितचेतसः प्रतिषेधत्सलपि संभिन्नवुद्धिष अकर्णीकितः तद्प्तिषरेधविषयपह्वा; परेश्वरं प्रणतमूधंनः कुषुमाञ्चटिप्रमतिमिः्चयन्ति फलं चापि तत एव प्राथयन्ते ॥
1. - मुण्डकोपनिषत् 1, 1. 9. 2. कठोपनिषत् 5. 12. र
समाधिपादः श्रथम॑ः. ६३
अथ चेदूनूयात्-- सव्ञाभावभ्रतिपादिभिरसमदयुमनिरितपरतिज्ञान। विरोध इति--अतरोच्यते-- , नैतान्यनुमानानि कथम् १ प्रथमं तावत् श्रनिङ्ञैव दुष्टा | यदि तावदीश्वर- राच्दाथः स्ज्ञे न भवतीति युष्मदभिप्रेत ईश्वर उच्येत, तथा. च सिद्धप्ाध्यता स्यात् ॥
अयास्मदमित्रेतः, तथापि युष्माकमतिद्धत्रिशेष्यता भवेत् ॥ अयेश्वरत्वस्यापवेज्ञतवमुच्यते, तथपि सिद्धं साध्यते ॥
तथेवाम्युपगमत्रिरोधोऽपि । कथम् ? र्र्यसःरज्ञवीजत्वयोर्विवधमानलात् काषठाप्रातिः पल्मिणवदेवाम्युपगमनीया । तथा काष्ठप्रततैश्चयैसवेज्ञतववाचिनावपी- श्ररसर्वज्ञशब्दवेषितव्यौ | काष्ठाप्रति श्च निरवधिकत्रम् । यथा परिमिाणादीनमातसा- काराधनन्तपरिमाणन्तत्वम् । तथा चानुमानाभ्युपगमस्ववचनविराधाः स्युः. ॥
किश्चान्यत्- काष््रपिश्चरत्वस्य च ङब्दार्भस्य परिद्यगे शब्दार्वादः प्राप्नोति ¡ न हि शन्दः पस्िक्तमिषेयेकदेडा उचरितः
अथ परिमाणदेरपि निखधिकनिष्त्वे नेष्यते--सिद्धान्तविरोधः .-। आसाकाशादीनां हि सपरगतत्वामवि, मध्यमपरिमाणलानिव्यलादिदेषप्रसङ्गश्च | अथाप्यात्मनः सवत्र ॒कार्यदरोनात् स्गतत्वम्, तत्रापि शकुन्याबाणनां मनुष्यगो चराकाशादिगतष्वे सामान्यतोद्टदेवानुमानात् स्यात् । तथा चेहापि सामान्यतोदृष्टानुमानघं केन वायते ॥
अथानुमानविरोघान्नावधार्य॑त इति चेत्--आध्मादीनामपि प्रमेयत्ववस्तु- त्वादिम्ः प्रयिग्पादिवदियनुमानविरेषेोद्धावना शक्यते [करम् | वक्तुम् । न-च तावताऽतरानुमानकिरोधितम् , अनुमानमवप्रङ्गात् ॥
तथा अनुमानाभाव इष्यत इतिं चेत्--प्रलयक्षेऽप्यनाश्वासतः स्यात् । अथ निश्वीयमानबुदध युत्त; प्रद्यक्षप्रमाणलम् , अदुमानस्यापि तर्हिं निशित- बुद्धिसमुद्धवादस्तु प्रामण्यम् -। -अथ दृष्टतम्बन्धधूमादिविषयमेवानुमानमिति चेत्-तत्राप्यनुमानामाव एव-अनभ्चिः धूमवान् प्रेदशः, प्रष्यक्नानुपठम्यमानाधि- सम्बन्धे सति प्रदेरव्वात् ,. अप्निद्यन्योपलम्यमनप्रदेरावदिति ॥
अथ प्रमाप्रान्तरसेवादाददृष्टसम्बन्धतरिषयेऽयुमानस्यानुमानलतमुष्यते, ्रव्यक्षमपि प्रमाणन्तरसंबादात् प्रमाणे भवेत् , प्रमाणत्वात् , अनुमानवदेव ।
६४ पातञ्जलयोगसून्नभाष्यविवरणे
अप्रमणे स्यात् , प्रमाणान्तरसवादाभावात् , सामान्यतोदृ्टादिषदिति ¦ तस्मान्न सामान्यतोदृष्टस्य प्रमाणत्वं निश्वितवुद्धिताद्वाधेतं शक्यम् ॥
किं च-सामान्यतोदृ्टस्य मानत्वमनभ्युपगच्छतः स्वशरीरमरण्तम्बन्ध- ठक्षणस्यानुपलन्धपूरवत्वात् सर्पादिभ्यो मयातुपपत्तिः । व्याधिप्र ५काराय चिकिरपादिभ्रयोगो न घटेत । मरणङङ्ाक्रारणामावात् | तया जन्मनोप्युपलम्मा- मावादा्मराशरस्याजतवै चिन्त्यत । हानोपादाननियेोगाभावश्च स्यात् ॥
तस्मात् सामान्यतोषरष्टपस्ििणत्वादिसातिरायत्वसामान्यादीग्वरज्ञाननिर्वधि-
कलि्धः ॥
कविं चान्यत्-- दैधरसरवज्ञःवस्य प्रतिषिद्धयमानत्वात् साम्युपगमः, अ(नुप)पदार्थस्य प्रतिषेधासम्भवात् । न हि केवलो नेति (न) प्रयुज्यते । ईरः सर्वज्ञो न मवतीव्युच्यते । तत्ने कचित् सर्वज्ञत्वमम्युपगतं भवति ॥
तथथा--राशस्य विषाणं नास्ति, वन्ध्यायाः पुतो नास्ति, कुषुममाकारास्य नास्तीति कचिद्िवमानानामेव विषाणषुतकुषुमादीनां शशादि- संबन्पेन प्रतिषेषः, तद्वदिहापि स्यात् ॥
किं च--ईरः सधैक्ञो न भवतीति, ईरशब्दाथसवैकञत्वसम्बन्ध- प्रतिषेधादिना ईश्वरादन्यस्य सवैज्ञताम्युपगमः । सम्बन्धिनावनम्युपगम्य सम्बन्धप्रतिषेषो हि न राक्यः कतुम् ॥
स॒ एष युक्तः सम्बन्धः प्रतिषिध्यते, अयुक्तशाम्धुपगम्यते | तद्रि श्रममात्नम् । ईश्वरसरङ्ञयोः प्रतिद्धपदा्योरप्रतिषेधात् । न ्यनन्तपरिमाणमाकां न भवतीद्याकाशस्य॒प्रसिद्धमनन्तपरिमाणल्वं प्रतिषिष्यप्रपिद्धानन्तपरिमाणःतवेषु घटादिषु तत् व्यवस्थापयितुं युक्तम् ॥
अथ सन्बन्धिनवेवेश्वरसर्व्चत्वे श्रतिषिष्येते, स्ववचनविरोधिनी परतिज्ञा स्यात् । रश्वरपर्व्॑ञतवयोरीघरसवज्ञराब्दाथतवाम्युपगमात् । न हि मवलयग्निरपनिराब्दाथौ न भवतीति ॥
अथाप्रमिद्धपदार्थव्रीश्वरपर्वज्ञराब्दो, तथाऽपि -तदर्थप्रतिषेधानुपपततिः । | कय ^ ।
अप्रतिद्धस्या्धस्य प्राप्यमावात् । न हि रकिचिदयप्रपिद्धमेतश्छिखरे मेषकुटुम्बिन प्रतिषेदधुमईति । किं च शब्दोपादानानर्थक्ये च । अप्रतिद्धपदाचत्वात् ॥
समाधिपादः प्रथमः ६५
अथ प्रसिद्धा्योरीश्वरस्ज्ञराब्दयोर्निरवधिकेशवरपर्वज्ञतवाम्यामप्रधिद्धाभ्यां गगनस्येव कुषम; सबन्धः कैथित् कल्पितः, स प्रतिषिष्येत--तथाऽप्यम्युपेतार्थ- प्रतिषेधात् स्ववचनविरोधिन्येव प्रतिज्ञा स्यात् । सातिरयनिरतिरयनेकेश्वरसम- जञन्यक्तिमस्सामान्ययोरीश्वरस्ज्ञशब्द।थवेनाभ्युपगमात् ॥
प्रसिद्धं हि टेक ईशरसरहशब्दयोरुत्कपीपकर्षयुक्तानेकग्यक्तिविषय- बुद्ध-युत्पादकत्वम् । न हि म।माधिपतिरीश्वर इति द्ित्रिग्रमविषयापिपतय उत्तरोत्तेश्ररा न भवन्ति । यो वा कुटुम्बाधिपतिरीश्ररे न मवति स्तश्वासावथे- वानीश्वराब्दः ॥
तथा बवैयकरणः सर्वज्ञ इव्युक्ते नाधिकक्िज्ञानयुक्तो न भवति| निखधिकौ सावधिकौ वेश्वरसर्वज्ञावीश्वरसर्वज्ञशन्दयोरयौवम्युपगम्ययाताम् । अत- स्तघ्रतिषेधादम्युपगमविरोधिनी प्रतिज्ञा स्यात्, असाकाश्चादीनां महस्तस्य महच्छ्दायैखप्रतिपरेधवत् ॥
अथेश्वरसवेज्ञो निखधिकौ न स्तः, अनुपलभ्यमानलात् , अनीवरदवितीय- शिरेवदिद्युच्येत, तथाऽपि शब्दा्थीम्युपगमादम्युपगमिरो धिनी प्रतिज्ञा ॥
सातिशयतादिभिरेर्यपवज्ञघबीज।दिलिङ्धर्निखधिके्चरसतरज्ञतयोऽ१- लम्यमानत्वान्निखधिकपसििणलत्रदिवयपिद्धिरनुपर्न्धेः ॥
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अथ अविरोष्यैवेश्वरशब्दाथः सधरज्ञो न मवरतीद्युच्येत वस्तुत्वादिदहैतु- भिरस्मदादिदिति, तदा पत्रप्रमाणविरोधिनी प्रतिज्ञा स्यात् | प्रतिदधेरशब्दाथस्य- प्राकृतसरवज्ञतस्य सर्वप्रमाणत्िद्धलात् । यथा इश्वरशन्दाथः [सर्वज्ञो न भवति] प्रमेयल्वादिमिर्ैतुमिषेटादिदिषयक्ते यत् ब्रुथात्तदेत्ाहं वक्ष्यामि ॥
इह सुपरह्नदयुन्यं जगत् । कारो वा दिश आकारां वरा प्राणिमहेरो वा प्राणिनो बा सव सप्ज्ञसून्याः | प्रमाणानि वा सर्वाणि सर्वज्ञाविधयाणि | प्रमातारो वा सर्वज्ञस्याप्रतिपत्तारः, इवयेवंजातीयघ्ठु प्रतिन्ञाष्चु निरखधिकेश्वरे सज्ञे वा ग्रतिषिव्यमने, प्रतिद्धे्रसवन्ञशब्दायाभ्युपगमविरोधाः प्रतिज्ञादोप्रा वचनीयाः ॥
नलु च वन्ध्याुतो नास्तीति, तच्छरन्यं जगत् काटो वेति, प्रतिज्ञायमाने यथेक्तप्रतिज्ञादोषप्रापिभवेत्- नैष दोषः- बन्ध्याघुतप्तत्तालक्षणस्य प्रति. बेद्न्यस्य वाक्यार्थ्येश्वरसरवत्तशब्दाथैवदप्रसिद्धवात् केवटशब्दभ्रा पितसनिधान- बुद्धिमात्रप्रतिपनने पदथ[पदा्॑प्रतिेध)]भ्याप्राचेऽस्तीति बन्ध्याघुतास्तित्वस्य (वा नास्तित्वस्य) नाभ्युपगमोऽस्ति । ततो नाभ्युपगतप्रतिषेधदोषः ॥
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६६ पातञ्ञल्योगसूत्रभाघ्यविवरणे
ननु चेश्वरः सर्वज्ञे न भवतीव्यत्रापि बुद्धिमात्रं प्राप्माणे प्रतिषिव्यते, न कचिदपि प्रप्नुद्रस्तु (न) प्रतिषेदधं शक्यते प्रतिहस्तिनेव हस्ती । यदि च नञ वस्तु निराकरिष्यत, नजुमनेणेश्चरवादिपन्षलमपि[पक्षोऽपिनिराकस्प्यिते, (अतः) तस्मादिहपि बुद्धिमान्नप्रतिषेध इति नाभ्युपगतग्रतिषेधः प्रतिज्ञादोषः ॥
सत्यमेवम् । कि त्वस्ति विशेषः । प्रमाणसिद्धवस्तुविषया बुद्धिस्न्तरे कालविदो वा प्रतिषिध्यते वस्तुसामान्यात् प्राप्नुवत यथा घट नास्तीति । कवचिद्धिनप्यर्थन बुद्धिरेव शब्दग्रस्युपनीतसन्निध।ना कल्ितवस्तन्तरा प्रतिषिध्यते | यथा बन्ध्याघ्ुतो नास्तीति ॥
यत्र तु प्रमा णान्तर्यप्द्वसदस्तुप्रतिषेधस्तत्रापि[स्ति]अभ्युपगतार्थप्रतिषेध- दोषः | यथा ईंशवरदाब्दार्थः स्ज्ञो न भवतीति । ईशर पभज्ञशब्दयोरभिव्धंमनेश्वर- सधज्ञन्यक्व्यनुगतसामान्यवचनवेन लिङ्गेन निरवपिकेश्चरसर्वज्ञसत्ताववोतिलवं तिद्धमेव । महद्रहुसर्वानन्तपसिमाणादिरब्दवत् ॥
ययैवेते महदादिशब्दाः प्रपिद्सातिरायमहदाधनुगतसामान्या्थाभिघापिनः सन्ता निरवधिकमहद्रहुसवौनन्तपसिमाणव्यक्तीनामस्तिष्ावयोतनटिङ्गा भवन्ति | महद।देसामान्यानां सातिशयप्यक्ध्यनुगतानां निरवपिकमहदादिव्यक्तेग्यापन (रव्याक्षीण)रक्तित्वात् | न हि सन्तं व्याप्यमर्थं तद्बपिकः सनर्थो न व्यप्मोतीति | निपवधिकत्ति परो व्याप्यो नास्तीति व्याप्य सामान्यस्य क्षयः व्याप्य्रिषयत्वेनैव परसिद्धतात्तत्र । तस्मात् प्रमाणत्िद्धस्वादीशख्रसतरन्नरव्दाययेरभावं साधयतोऽभ्यु- पगताथप्रतिषरध प्ति दुष्टा प्रतिज्ञा ॥
न चेश्रसर्व्शन्दयोरतदश॑लमन्यायतवे वा कतु [वक्तुं] शक्यते । तथा दात्तिज्ञानैश्चयीणां प्रतिपुरुषं समुच्चितानां सातिशयानां निरधिकं तच
(५
अतः[नानुन्त्तः| प्रतिबद्ध मुत्सहेतेवयनुमानविरोधिचं प्रतिज्ञायाः ॥
कि चान्यत्- परिपर]कल्पितस्येश्वरस्य प्रतिषेधं कुन्तः प्रयक्षपरचित्ता- नष्टाः प्राप्तुबन्ति । परवक्यादिति चेन - सातिरायत्वादिसव्गप्तापकलिङ्ख- प्रतिपादकवदविरिष्टव्यात् परवाक्षयस्य । ताद्दावाक्याथप्रतिषेधे चाम्युपगत- प्रतिषेधः, पूवेवदेवानुमानविरोधश्च ॥
वि च--प्रमेषत।दिहैत्ना५पि असतिद्धत् | कुतः ? अस्माभिनिरतिराय- ज्ञ नै श्वयविरिष्टसस्याभ्युपगतत्वात् । अथ स्वयमपि ताद्रामम्युपगच्छेत्तद सर्वज्ञपिद्धिः, अम्युपगतवात् ॥
समाधिपादः परथमः ६७
किं चान्यत्--अम्युपगततादकूप्रतिषेधे, यथा घ्रटो घटो न भ्रति, वस्तुत्वात् , पटवदिति, एवमिहापि स्यात् ॥
किं च-निरवधिकस्यानम्युपगमे, प्रमेयल्वादीनाम् [अ] पक्षघमेत्वमाश्रवा- सिद्धत्वं च । तदम्युपगमे हि किं साध्ये भ्वेत्? यो हि तृ्तवन्तं ब्रूयात् माज्त्रास्छीरिति, किं तेन कृतं स्यात् ॥
अथापि स्यात्--निरवधिकमीखरममित्न्धाय तस्य सर्वज्ञसं निषेधामाति । नेदतपि युक्तम्- सम्ज्ञघस्यपि निखधिकलात् ॥
अपि च सातिशयैशर्यसरषज्त्वधोरुत्कधीनुत्करपतिषयवेन व्यभिचाराने- आरसन्तशब्दमुए्पामिषेयत्वम् । यथा महदादयः रब्दा व्यमिचरितमहदििषु धटादिष्वमुख्याः, नाकारादिषु, तथैवात्रापि निरतिक्चयंमेश्वयं सवैज्ञतवं चन्यमि- चारीति स एव सुस्यः शब्दाथः । न च पुख्यनिराकरणं स।धिमानमृच्छति ॥
कि च-- यथा भवता अनुमानागमप्रिद्धे्रस्य प्रमेयत्वादिधमीविकल्पतया सवैज्गतरे निराक्रियते, तथेव प्रमेयत्वा दिमिरचेतनत्वमपि धटादिवदेव प्राप्तुयात् । अविरोधात् । यथा प्रमेयत्वं [अ]्षसेन व्याप्तमेव्मचेतनरल्रादिमिरपि ॥
भ (9 | ® कनक.
चेत्-इहापि अनुमानागमविरोधं किं कटक्षेणापि
५
नापि च प्रमेयत्वादिधभप्तामान्येन सपक्षे पिप्रक्ते वा किश्वित् कचिदध्या- रोपयितुं राक््यम् । वस्तुविषये सवत्र प्रमेयलादौनामत्तिखात् । न मतिमोहनाथः परमेयत्वादयुषन्य।सः ॥
अथ आसलादिति चेत्, सुक्तामवदज्ञवप्रसङ्गः स्याद्रषदीश्चराणाम् । { # 2 क,
परयक्षादि विरोध इति चेत्--अत्रप्यनुमानादिविरेधः पूर्ववदेव ॥
भूतमव्िष्याकराल्योरपि रईश्रस्यानुपटन्धार इतीदानीन्तनेश्वराणानुपे- लन्धरमिरनेकान्तिकं प्रागिलादिव्यादि । कवि च भतीतानागतक।छ्योरपि सातिशयतादिटिद्गैरुपलग्धवन्त उपरुप्स्यमानाश्च प्राणिनः प्रमाणङ्ुरालाः, प्रमाणकुराङत्वात् , अस्मदादिवत् ॥
अथ अरारीरलादसवक्ञः, सक्ता काशादिषत् इति चेत-न-सरररारतात् | = (५ ¢ [न [4 [ (4 (क व्यक्ताग्यक्तं हे सवमङरीरं सरारीरत्ादनियेश्वरतवं धर्मयपेश्षप्ठ दिष्युक्तसवादिति
६८ पात्यो गसुत्रभाष्यविवरणे
चेत्-न-अरारीरत्वात् । सरारीरारारीरतषिरोध इति चेत-न~मुक्तमुच्यमने- कत्मनोऽरारीरत्वसरारीरप्वदनात्त् ] तत्र भिनक्रारत्वादविरोध इति वचेत्-न- अत्रापि भिनकाल्म्युपगमात् ॥
कै च-युगपदीश्वरत्रादेव इयसम्भवः | सकरणता अकरणताऽपिं ईशवरत्वादेव युक्ता । तथ। च श्रुतयः--"“ अशरीरं शरैरेषु"" इति । तथा ““यः सर्व भूतेषु तिष्ठन्?” इति । तथा भ्यः सर्वज्ञः स्वित् इल्यादयः ॥
श्रुतीनां विप्रतिषेधाय॑लादीश्वरप्र्यायकतम् इति चेत्-न-अनन्य- दोषत्वात् । न हि क्मैरोषवे श्वुतिलिङ्गादीनामन्यतमदपिं प्रमाणमस्ति ॥
स्वाध्यायविधिपरिप्रहादरौपूणमाप्तादिशेष इति चेत्-न-अ्योतिष्टोमादिष- द्िष्यन्तरस्य भावात् । यथेव ञयोतिष्टोमादोनां (यमग्र पृथकप्रकरणादि- कारणादन्योन्यरेषरेषिमावो नारित । तथेव मन्तव्यो विदिष्याितव्यः'“ दस्य दिविषयतानाभ्नहोत्रादिरोषतवं युक्तम् |
फल।भाव इति चेत्-न- “सर्वाः लोकानाभोति सर्वाश्च कामान्य- स्तमात्मानमदुविदय विजानातिः" इव्यादिफलपुदिदय विधानात् ॥
~ (५.
अथेवमप्युपासनाविधिशेषरत्वात् स्तुतिरेति चेत्-नादयन्तमप्तता सतुतिरस्ति । न हि “वायु क्षेपिष्ठा देवता इति बयेोरक्षपिषठचम् । कचिदसताऽपि स्तुव्यादिसम्भव इति चेत्-न-अनुमानसिद्धस्येहेपादानात् ॥
अथ स्वैका्यकरणयोगादीश्वरस्य सवप्राणिघुखदुःखदिसेबन्ध इतिं चेत्-न-निमित्तभदात् । धमादिनिमित्तः सप्ाशिणां शरीरादिसम्बन्धः । धमादिनिमि(त्तानाँत्तो दुःखादियोगः । नेश्वरस्य धमादयः । निरतिश्येशर्यादि- हेतुवाच्छशरादिकायेकरणसंबन्धस्य । यथ। ग्रहतदाविष्टयोः ॥
अथ चश्षुरदिकरणलादस्मदादिवत् सानुपरलन्धिरिति चेत्-न- सवैविषयप्रहणप्तमथीनां प्रतिवन्धक।रणामव्रात् । सवगतनां हि करणानां [आ]धर्मादिसंवरणेन स्वविषयसङ्कोचः क्रियते । यस्य पुनररणं प्रतिबन्धक[म]- घमोदि न विदयते, तस्य तदभावाद ञेषस्वविषयग्रहणानि करणानीति न दुष्यति ॥
1. कठोपनिषत् , 2, 21. 4. च. <. 2. 4 5. 2. बृ. उ, 3. 7. 13. 5. छा, उ, 8. 7, 1. 3. मु, उ, 1. 1. 9.
समाधिपादः प्रथमः ६९
अथ वा सर्प्राणिकरणैः [ईरः] एथगामनः करणामविऽग्यविशग्रह इव सवेमनुमवति । न च प्राणिशयन्यो विषयः कश्चिद्िधते, "यः" पृथिव्यां तिष्ठन्' ध्योऽप्पु तिष्ठन् इयेवमादिश्ुतेरन्त्यामिनाम्न ईश्वरस्य सर्वष्ववस्थिततवश्रवणात् ॥
शपि वा प्रकृष्टमेव सकं नित्यानतिशायितरततिज्ञानेश्वरसरधमेकम् , सगतल्वादाकारवत् सर्वयोगि, स्ीयैत्वात् स्ैविषयप्रकाशकम् , धमोधमीदिवि- प्रयोगादप्रतिबन्धशक्तेकं च इति अकायानिद्धियत्वपक्षेऽ्षीश्चरसवैज्ञत्रपिद्धिः ॥
चक्षुरायवेक्षमेव चित्तस्य खूपादिग्रतिलम्भसामध्यमिति वचेत्-न-- रेश्यैधमीचमावाम्यां परिहतत्वात् ॥
अपि च चक्षप्रह्यध्यापि चक्षुषा अग्रहणं छोके दृयते । चक्षुर सत् सव॑ तमः सन्निमीठितलेचनेरपि स्वस्थान्तःकरणैरुपरम्यते । तदेष
चान्धतमसं विप्फास्तिनयनैर्यन्यगतचित्तैनैव गृह्यते | यथा गृह्यमाण एवाकशि प्रकाराः ॥
अथापि प्रकाजञामावमात्रमेव तम न वसिति ब्रूयात्-तच्च न-अभावस्य
[कभ
वस्तुतिरेधानसामध्यामावात् ॥
अथ प्रहणनिमित्तस्य प्रकाड्यस्याभावदिव घटाचग्रहणं, न वस्तुतिरो. धायकं तम इति ब्रुवीत-न-चक्षुषः प्रकाशकत्वात् प्रकारसाह।यकपे- ्षानुपपत्तिः । असति भिनजातीये वस्तुनि वस्तूनां तिरोधातृणि तत्र या च यावती च मत्रा प्रकाराकवाचक्षुषा प्रक्यित | न हि प्रदीपः प्रदीपान्तर- दैतीयकधिश्ः प्रकाशयति ॥
कि चान्यत्-- चक्षुषः प्रकाशान्तरस्हायत्वपिक्षतायां च निङायामपि ताराधिपतिप्रकाशद्वितीयेन चक्षुषा दिवस्त इव ख्पादिगप्रहणप्रसङ्गस्तिरो-
+ (
धानस्यासति निमित्ते ॥
कि चान्यत्--अभावश्ेत्तमः, चन्द्रमाघ्ु निशायां भा(मव)न्तीषु तमस्ता मन्देन न प्रवर्तितव्यम् । सवौतनैव हि तेन विनशनीयम् । मातां भावात् । मासां तु व्तुवान्मन्दखपाटव।दिविशेषो घटते, न(मावस्य)अभावस्य निर्विशेषत्वात् ॥ |
७० पातञ्जर्योगसूत्रभाष्यविवरणे
किं च-सहायामावाचचक्षुष उपट्न्धिसामध्यौमावादग्रहणगिलेतदपि व्यभिचरति । यथा सलखपि विद्युहुनाप्रकारे तीव्रतरे विदुहठताविर मे च कि तदृदृष्टिनीपलभते। न हि विधुतः सहायके दष्टचकिनत्वेना्रहणं विरोधाभावादुक्तम् ॥
किंश्च - चिकिःसाशाच्े छया मधुररशीतच्च्युच्यते । न ह्यवस्तुनो मधुरशीत्त्वम् । तथा चाक्षिपति पथ्यलम् । नभवस्य पथ्यपिध्यलं ब्रूयुः ॥
प्रदीपच्छयोपटब्धेश्च । अभावश्ेत्तमः, प्रदीपप्रभामण्डठे प्रदीपच्छाया कथं भवेत् । वस्तुखेऽपि बिरोधादयुक्तमिति चेत्--न--विषसरपैयोरिव संभवात् । यथा प्राणविधोगकरमपि विषं पन्गप्राणवियोगाय न पयौप्रोति, तथा प्रदीपतच्छाययोरपि ॥
तस्मादरस्तु तमः, प्रकषोपकर्षवस्वात्, प्रमावत् । विरोधिद्रन्पापने-
, यत्वाचच, घटवत् । उपलब्धृग्यवधानकरत्वाचच, भित्तिवदिति ॥
इतशवेन्दियनिरपेक्षप्यन्तःकरणमिन्दियविषयग्रहणाय समर्थम् । पिहित- कणविवर्र्य घोषोपलंमात् । न च पिहितकण॑संपुट्य प्रोत्रान्तरमनुमातं शक्यम् । वधिरस्य।पि पिहितश्रोत्रपुटस्य तदम्रहणात् ॥
किश्च--प्रतिज्ञाज्ञानेनपि ख्पादिग्रहणमिन्दरियनिरपेक्षं ददयते ॥
किंञ्चान्यत्--स्तेश्वानुपपत्तिः स्यात् इन्दियनिरपेक्षस्य चित्तस्य सातिरयप्रहणत्तामर्ध्यऽपि । स्पष्टाश्च स्पृतयः स्वपा ख्पादिविषयाः ॥
यदि चक्षुराचन्तःकरणाम्यां समन्वित।म्यां रूपग्रहणं पूवेमपि (५.९ श {४ [क भ १, 6 | ५, निवर्तिष्यते, स्वप्रादावपि सपुचित।म्यमिव प्रदीप्य । न चैवमस्ति । एुखादि- प्रहणे स्वातन्त्र चित्तस्य सर्वप्रपिद्धम् ॥
तसम।दारोकस्थानीयानीद्धियाणि चित्तस्य विषयग्रहणे स्वतन्त्रस्यैव
सतः । तदुक्तम् ""इन्द्रियप्रनाडिकया' इति । तथा श्रुतिरपि-- "मनसाः ह्येव परयति मनसा भृणोतति' इति ॥
1 १.1 2 आव -2 =. 1 8;
समाधिपादः प्रथमः ७१
अथोच्येत--इन्द्रियाणामालोकपिक्षावत् अन्तःकरणमपीन्दियसाहायकपि- क्षमेव प्राहकमिति --तन्न--ग्यमिचारात् । रत्रिश्वरा्णां विमिनन्यारोक- देतीयकेन दिवस इव रूपग्रहणम् । स्यपि प्रकारो न पस्य प्रहण- मुर्कादिभिर्दिने ॥
किष्च--साधनपेक्षस्य विक्ञानसाधनादतेऽपि तुलादौ दरौनमातरेणैव घुब्णाीदिपरिमाणज्ञानं दृस्यते ॥
अथ चेदूनूधादानथक्रय॑चक्षुरादीनामिति-- स वक्तव्यः--तुलादिव- देवान्यत्रार्थवखमिन्दियाणामिति | यथेव तुलादिविषयवैमल्यप्रकर्षात् पुरुषस्य विनापि तुखादि साधनेन दररनमात्रदिव कनकादिवस्तुपरिच्छिदकोशरं, तयैवान्तःकरणस्या- नपेक्षितचक्षुरादिसाहायकस्यापि वेमल्यप्रकरषीदुपादिग्रहणसामर्ध्यं॑न विहन्यते ॥
नापि ह्यनेकनिवतनीयं क्रियाजातमेक्रेन नाभिनि्वैते । दृदेयन्ते च बहभिरुत्तोल्यमान शिलादिकमद्ितीया हस्तिपुरुषादयः केचिदुत्ताल्यन्तः ॥
तथेवेन्दियसहायेनान्येषामन्तःकरणेन गृद्यमाणा पादयः परमेश्वरचित्त- सखेनानाक्रख्ति(वकर्णित)चक्षुरादिपस्सिन्देन केवलेनेव गृह्यन्ते । काष्ठागत- त्वादवेमल्यराक्लेश्वप्रकरस्य ॥
संसारिणां ततो निकृष्टलादषिचदिमलेनैश्धराक्तिज्ञानादीनामिन्धियसह- करिपिक्षिलमन्तःकरणस्य । शिखदिसपुत्तोठन इष हीनत्रकनाम् ॥
ये(षा) पुनः संक्षारिण एव सन्त ईश्वरीमवन्ति बुद्ध्षभादयः, तेषां निएति- रायराकतिज्ञानेश्वयानुपपत्तिः । कार्पखच्छिवलात् । अभ्युपगच्छन्ति च तदरेनश्धिनः काल्पच्छिदनीयक्र तेषम् | ।
नास्मदीशरस्य काट्पर्च्छिवता । तत्करङिस्तदाधकाठैश्च बुद्ध।दिभि- रपल्जञितेश्वयादिसातिदायलादिलिन्धैरुभय एवा्ौ । न।पुमिन् काट उन्न उत्पद्यत उत्पपस्यमान इति त्रिधा कैश्चिदनुमीयते । निरतिरायत्वविरेधो हि तथा{दा]स्यात् ॥
तस्मात् बुद्धादीनां सिद्धधमेक्षत्वात् , पत्बुद्धानां काल धिक्यप्रतिरुत्तरकाङ- बुद्धस्यापि न निरतिायदाक्लश्चयन्नानसे विरुद्धम् । अथ तुल्यरात्तिज्ञनिश्च्याणा- मेव तेषां समनराज्यराजानामिवरासमानकाकुतमिति ब्रुयात् , तथापि बुद्धन्तर- कार्य व्याप््यमिलरदिधातानिरतिशेश्वश्रीवभावः ॥
७२ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भाष्यम् ] सामान्यमात्रोपसेहरिे च कृतेपक्षयमनुमानं न विशेषप्रतिपत्तौ समथेमिति । तप्य संज्ञादिविशेषप्रतिपत्तिरागमतः पर्ैन्वेष्या । तस्यासानुग्रहाभविऽपि मूतानुग्रदः भ्रयोजनम् › ज्ञानधर्मोपदेशेन कसप्रख्य- महाप्रययेषु संसारिणः पुरूपानुद्धर््यिामीति । तथां वचोक्तम्-- आदिविदयान् निमीणचित्तमधिष्ठाय कारुण्यात् मगवान् परमर्षिरापुरये जिज्ञासमानाय तन्त्रं प्रोवाचेति ॥ २५॥
( विवरणम् ] भमिरुषति हि कश्चित् बुद्धान्तरं वरीकर्तुम् , तद्विषयं च ब्यापतुम् । अनियतत्वादिच्छायाः । बुद्धन्तरावशीकरणे च सवशि ही(नी)येत ॥ अथ चेदुव्येत, बुद्धान्तरस्याननुग्राह्यतवाद्रागाचयभावाच्च तद्विषयभ्याप्तावन- भिरप्र इति--अत्रोच्यते-- यथैव प्रापतब्ुद्धलस्य कंचित्काठमवस्यानममिलाष- पूवैकम् , तथ। बुदधान्तरकाकावस्थानाभिङुबेणावङ्यं भवरित्तम्यम् ॥
अनुग्राह्यप्राण्यन्तरभावाच क।लन्तरावस्यानाभिख्ेण युक्तं भवितुम् । न च भविष्यता बुद्धेन सव प्राणण्रतेऽनुग्रहीष्यन्ते ॥
[क
बुद्धत्रस्य च॒ दुःखाचासकतरेऽपि प्राण्यनुग्रहायलादृबुद्धस्यितेः काछन्तरावस्यनेच्छया भवितव्यमेव । सिद्धेश्च प्रागविचयादिपरामरशौत्, नुद्धस्वख्पस्य च दुःखदयूनयाचाप्मकतस्य, तेरभ्युपेततरात् › बुद्धषमाचन्यत्तीथ- करणात् [करत् ]निरतिशयराक्तिन्ञनि शथनुपपत्तिः ॥;
कालानवच्छेदात्तु मैते दोषा अस्रदीशवरे क्रमन्ते । शक्तिज्ञनिशव्थाणां तु निखधिकत्वानुमानात् सातिरायत्वानवस्थिततवादिदोषरः नालसाकाशादीना-
भिवातिशङ्कनीयः ॥
तया च दरीयति--सामान्यमात्रोपरंहरि कतेपक्षयमनुमानम् इति । निरतिशयशाक्तिजञनि खयेयुक्तपुरपरविरोषप्तस्वस।मान्यमात्रोपसंहर कतोपक्ष्यं कृत उपक्षयो यस्यानुमानस्य॒तच्छृतेपक्षयं सातिरशयत्वादिति ।
तदुक्तमनुमने-- यत्र प्रातस्तत्र गतिमात्रमिति । तस्मन्नेश्वरसक्ञागुणादि- विदो सतामपि प्रतिपादने समर्थम् । सामान्यमत्रोपपंहारपरलात् ॥
समाधिपादः प्रथमः ७३
तदेतदुक्तं मवति । यदेवं सतामपि गुणानां सामान्यप्रतिपादन- कृतक्षयलान्न प्रतिपादकमनुमानम् , किमङ्ग पुनरव्यन्ताप्षम्भान्यमानसनिधीन।- मनुमेयधमैविरुद्धानामशक्तयज्ञानघर्माधर्मानिश्वयदानां [न]त्प्रल्यायकमिति ॥
भत एव च त्रिरुद्धभरतिंसाधनानुपपत्तिः । स्धज्ञास्तितानुमानवत् प्रथमं तदभावप्रतिपादकानुमानाप्रवृचतेः . | न ह्यतुमानस्य परोक्ध्युदीक्षाघमैत्वमस्ति | न हि धूमदरौनेन।गन्यनुमाने वक्नरन्तरोक्तिरुदीश्षयते ॥
न च स्वयमेव सवै्ञासितये नास्तिल॑वा बुद्धि (प्रति)पूर्वमाशङ्कधते । घट दिवत् सेज्ञसद्धावध्य स्वयमनम्युपगमात् । न द्यनिधौरितिशश्चस्वरूपः दारो विषरणमस्ति नास्तीति कश्चिदाशङ्कते ।
परवास्यात् प्रतिपवाङशङ्कत इति चेत्- परेणापि कथमप्रसिद्धेश्वर- सद्भवन।राङ्कितमिति वक्तव्यम् । अथ परस्य भ्रान्तिरिति चेत्-न सामान्या. तुपटम्भे भान्तिकारणमस्ति । न हि शुक्तिकायां पिकभ्रमः "कस्यचिदुपजायते । तस्मादाह- संज्ञादिविरेषप्रतिपत्तिशगमतः पर्य॑न्वेभ्या इति । वेदेतिहात- पुराणयोगधरमशाल्रा्यागमतः पर्यन्वेष्या ॥
तस्यामानुग्रहामावेऽपि तस्थालार्थमवाप्त्यामावात् सूतानां चाविया- पङ्कनिमम्रानां संसारपागरेत्तरणे।पायपुतरोपदेर्यन्तरस्याभावत् तदनुग्रहः प्रयोजनम् । ज्ञानधर्मोपदेरेन येऽनन्यरारणास्तसिन् सव्रोसमना निवेदितासान- स्तान् कलपप्रलयमहाप्रलयेषु ईशवरानुगृहीतागमन्ञान विरेषेष्वाचयष प्रलीनेषु पुनःपुनजातकारृण्यामृतः सन् उद्धर्ि्यामीति प्रवतेत इति बाक्यरोषः ॥
~ ~
तथा चोक्तमादिविद्रानिति- अदौ वदान् आदिविद्रान् रजस्तमो- म्यामनमिभूतक्ञान इयथः । ज्ञानधर्मीदि वा तत आदीयते इत्यादिः, आदिश्वापौ विद्वांश्च ` आदि विद्वान् निमीणचित्तं संकल्पमात्रनिभितं योगिनित्तम् अवेरग्रह- वदुपदेशनार्थम् अधिष्ठाय भगवान् परमपि: परमदर्खन इव्यथः । परमलं चागमतः । दरौनार्थस्य वा गद्यर्थस्य वा घातोः ऋषेश्रहणम् । परमर्षिरीश्चर
एव्र कपिरनारायणादितंक्ञः आसुर्ये प्रोवाचेति ॥
तस्मात् प्रधानपुर्षभ्यतिरिकिः सर्वप्राणिभावकमफलपरिस्फुरणक्ञानात्त- दनुग्रहकारणम् ईश्वरः सिद्धः । स प्रकृ्टसचधनोपादान ईखरः कथं कत ? कथं च नुगृह्णाति £ इष्येवमादि न चोदयितव्यम् । आगमतः पर्न्वेभ्या इव्युक्ततात् । अनुमानस्य च तद्विषयस्यानुपपत्तिः विशेष्तबन्धाम्रहणादिति ॥ २५ ॥ 10
७ पातञ्जखयो गसूत्रभाष्यविवरणे
| भाष्यम् ] स एषः-- [ सूत्रम् | क [९ व (स) पूवषामपि गुरूः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥ [ भाष्यम् ]
पूर हि गुरवः कलिनावच्छिघन्ते । यत्रावच्छेदार्थः' काटो नोपावतते स एष पूर्ैवापपि गुरुः । यथ्।ऽस्य सर्गेस्यादो प्रकर्षगया सिः, तथाऽतिक्रान्तसगादिष्वपि प्रयेतव्यः ॥ २६ ॥ [ विवरणम् |]
सः यथोक्तद्पः परमेश्वरः पूर्वैषामपि गुरूणाम् अभ्युदयनिःशरेयस- सव॑साधनसाष्यषबन्धेपदेरिनां गुरः तेषामपि ज्ञानोपदेस्य कर्तेत्यथः । तदु- द्ववत्व।त् सव॑ज्ञानानाम् | यथ। उलनल्वणजरपिस्मुद्धवा विष्फुटिङ्गटवणकणाः ॥
तस्य चादिविद्रत्तमवोचाम काठेनानवच्छेदादिति । अतीतानागतप्रत्यु- पादीयमानलक्रि््टन काटेनान्ये गुखोऽवच्छिदयन्ते । स॒ वीश्वरः सर्वदा मक्तेशवरसरेन तैरप्यस्माभिरिवातुमेयः ॥
कस्मात् पुनस्तस्य वस्तुले गुरुखसामान्ये च सति नावच्छेदकः काठ इति चेदाह-- यत्रावच्छेदाथेः कारो नोपावतैत इति । यस्मिन्नीश्वर विषये अवच्छेदा्ः भ्रस्थादिवत् " परिन्छिदकरः नोपावतैते न परिष्छेदकतननेश्वर विषयीकरोति सपरपररिणापरिवस्छवच्छेदकरो ऽपि सन् ॥
ननु चेश्वरकृष्टसखस्य प्रधानकार्य॑तात् , प्रधानकार्यस्य च काल- वच्छेधत्वात् , क्मात्तःसत्ं नावच्छिचते पुरुषस्वरूपं हि सर्वेषामेव कालनवच्छेव- (मिति नाशाङ्कनीय)मपरिणामिलात् पुरुषस्य ॥
अथ मन्येथाः--तन्त्रान्तरप्रसिद्धेश्वरवत् सच्वनियेक्न ईश्रर इति- तदयुक्तम्- श्रकृष्टस्वापादानाम्युपगमात् ॥
अथापि मर्न्व।थाः--ईश्रसच्नात् प्रवृत्तमेष कायमवच्छिनत्ति का नेश्वरसचमिति- तदप्ययुक्तम् ग्यक्तस्य परिच्छेवत्वात् | व्यक्तं चेश्वरसखम् ॥
1. अयं विवरणानुत्तारी माष्यपाटः । इदान)न्तनमुद्रितम्रन्थघ्थः वाचस्पति. सम्मतश्च पाटस्नु यत्रावच्छेदार्थेन इति ।
समाधिपादः प्रथमः ७५५
अथाप्यमिसन्दधीयाः-- प्रधानवस्थमेवेश्वरसमिति- तदनुपपनम् -- ्ञानामुपपत्तेः ॥
अथापि प्रतिपथेथाः-- सत्कायम्युपगमाद्रौजफल्बष्ठरीक्ुष्ठुमादिवज््ञाना- दीनां प्रधानावस्था यत्सच्वमेवेति- तच न साघु-ग्यवहारयोग्यत्वात् | सर्वषां च तथा सल्यनवच्छयतेवं ज्ञानादि सत्तामात्रसम्बन्धात्रिरोषात् प्राप्नुयात् ॥
अथापि व्रुवीय।;ः- न्यक्तवे सल्यपि कायाणां कस्यचित् परिच्छेत्य काछान कस्यचिनेति-- तच्च न--न्याप्रिरोधात् ॥
अथापि प्र्यवतिष्ठेथाः, इश्चरत्वप्य कारपरिच्छिवत्वमागमपिद्धमिति- तच्च न -- अवघोतकलादागमस्य ॥
अधाप्याचक्षीथाः-- विद्यमानस्यैव क।रपल्च्छियत्वस्याज्ञातस्यावधोतक अगम इति -तच्वपि न --निरोधादिसमनुषठाननिमित्ततात् कार(न)वच्छे्यो वेमह्यादनवच्छेयश्चेति विरुद्धं स्यात् ॥
नवे
अत्रोच्यते-रश्चरसचयेमल्यप्रकषं पक्षत्वात् कालनवच्छेयतस्यादोषरः ॥
यथा अन्येषां गुहूणां योगधमादिसमनुष्ठाननिमित्ततात् काटानवच्छेवो वैमल्यप्रकषेः, तथा न मगवतः । कथम् १ सव॑दाऽत्यन्ततिरो भूतरजस्तमस्वा- दनपेक्षितधमादिनिमित्तं सकटाथौवद्योतकरं काङानवच्छेथ सच्छस्वरूपव द्रगवत्सचचे ज्ञानम् ॥
तथा ततकार्यमप्युत्कषः काटेन नावच्छिदयते । यथा चद्निरष्णप्रकाशभन कालानवच्छेवै, तथा मगवत्सच्वस्य वैमल्यज्ञानग्रकप॑स्तत्सचे कारनवच्छेवता- मुपयन्तीव्येतदपेश्नयामिहितं यतावच्छेदा्थैः कालो नोपावर्तत इति । न त्वकार्यपिक्षया ह्युच्यते |
गुरुत हि नावधिमत् । तदवाह-- यथाऽस्य सगेस्यादो ज्ञानवैमल्य. प्रकर्षमलया सिद्धः सग॑दिजन्मनामनुमेयतया सिद्धः आगमतश्वाज्ञायि, तथाऽति- क्रान्तसर्गादिष्वपि तच्कालजन्मनां ततः प्राक्तनानामपि तिद्धः । तथा भविष्य- त्काठेऽप्यनुमानागमाम्यामवगम्यते ॥
अस्य च सूत्रस्येदं प्रयोजनम्---यथा दृष्टा गुखो ज्ञानघमोदुपदेशिला- दनन्य शरणैरनवरतमुपास्यन्ते, तथा मगवानयमपि सर्वगुङूणामपि गुरुतरत्ततोऽपि विरोषरेण नारायणादिनामा(दीनाम)नन्यचेतेमिः स्वहदयेनानिरो ध।रयितन्य इति ॥
७६ पातज्ञखयोगसुन्नभाष्यविवरणे
सूत्रम् | तस्यं वाचकः; प्रणवः ॥ ९७ ॥
| भाष्यम् |] व्।च्य॒इशरः प्रणवस्य
[ विवरणम् ] यथा दृष्टगुख उपासनेनाभिमुखीकृत।स्तदुपासनपराननगृहन्ति, तथाऽयं परमगुरुरप्यभिव्यानमत्रेणानुग्रहं करोति । तथा च शतिः --
८ यस्य देवे पररा भक्तेर्यथा देवे तथा गुरौ । तप्येते कथिता ह्यथौः प्रकाशन्ते महासमनः ॥" इति । सस्मृतिरपि- - ८ मकम॑क्रन्मत्परमो मद्धक्तः सङ्कवर्जितः । निवेरः सर्वमूतेषु यः स मामेति पाण्डवं ॥'” इति ॥ २६ ॥
इश्र्रणिधानादिध्युक्त, स कथं प्रणिधातमव्यः ? कि च तस्रणिधान- साधनम् ? येन प्रणिधाता प्रनिधत्त इति तद्रणिधानस्ताधनप्रतिपादनाथमाह-- तस्य॒ वाचकः प्रणवं इति । तस्य ईश्वरस्य यथेक्तरक्षणस्य वाचकः अभिधायकः प्रणवः साल्लादिमत इव गोराब्दः ॥
वकि ४ ०९ च क, [+ [® ५ [९ प्रकषण नूयते स्तूयते अनेनेति प्रणवः । यदि वा, प्रणोति स्तौतीश्वरमिति प्रणव ओङ्कारः । प्रणिधीयते चानन मगवान् प्रणिधातृभिरिति प्रणमन्ति वा
अनेनेति, प्रणिघत्ते वा तेन भगवन्तं चेतसीति, धजो वकारोपजनं कृत्वा. । शब्देन हि परोक्षाणामर्थोनां मनसि प्रणिधान मेररिदढ इति यथ। ॥
तस्य चोङ्करस्य वाच्यः ईश्वरः । अन्वर्थं खल्वपि निवेचनम्. । अव्रते; रक्षणाधरथान्मनिष्टिछोपश्वेति । प्रणिघातृन् सेसतारादवतीति, गमयति वा संसारिणं निर्वाणमिति, निरतिशयं वा प्रीणयति, समाघ्या्नुप्रहेणाकगमयति वा
परमा्मिदयेवमाचर्थानुगतम् सवधा तु नेदिष्ठ प्रियं नाम भगवतः ॥
1. सुव्रारोपानषत् | 2. श्रीमद्भगवद्रीता 11. अध्यायः 55, शोकः ।
समाधिपादः प्रथमः ७७
[ भाष्यम् ] किमस्य सृङ्ेतछृते वाच्यवाचकत्वम् १ अथ प्रदीपपरकाशवद- स्थितम् ? इति ।
स्थितोऽस्य वाच्यस्य वाचकेन सह सम्बन्धः । सङ्कतस्त्वीश्वरस्य स्थितमेवा्थममिनयति । यथा--अवस्थितः पितापुत्रयोः सम्बन्धः सङ्कतेनावदोदयते “अयमस्य पिता" अयमस्य पुत्रः" इति ।
| विवरणम् |
तेन हि मनप्ि सतते प्रणिधीयमानः प्रसीदति । तथा चनेकराः ्रुतयः--.ओं खं ब्रह्म' “ओमिति ब्रह्म इत्यादयः । स्मृतयश्च “ओं तस्सत्' इति । “ओं ¶विश्वं विष्णुः" इव्यादयः । ओंशन्दध्य कृदन्ते यन्मान्तमि- व्यव्ययत्वाद्धिभक्तिनिवृ्तिः ।
किमस्य सद्कतक्ततं वाच्यवाचकसवं ? अथ प्रदीपप्रकाश्चवदवस्थित- मिति । कि चातः? | यदि तेन भगप्रता अन्यैव संन्यवहाराथमस्य नामिद- मस्िविति संकेतितम् , ततऽस्य प्रागोरान्दाबाच्यल्वादसब्देन वा प्रणिधातारः प्राण्यधिषत, अन्येन वा नामान्तरेणाघीतवन्तस्तथेदानीमप्यस्तु, किमोङ्कारविशेष- वचनेन । अथापि प्रदीपप्रकारवदवस्यितं, तथाऽपि प्रथमश्रवणिऽपीश्चर उपलभ्येत यथा प्रकारेन सविता ॥
किं च--सङ्कृतोऽप्यनथकः स्थितप्तम्बन्धलात् | अथापू्वं॑सङ्केयेत, परवोक्तदोषभ्रसङ्ग इति मन्यते ॥
अत्रोष्यते--स्थितोऽस्य वाच्यस्य वाचकेन सम्बन्धो यदि निलयः राब्दो यदि वा अनिलः, सङ्खतस्तु तमेव स्थितं सम्बन्धमवञ्वछ्यति ॥ प्रघयाय्यप्र्यायकस्तम्बन्धः शब्द्ाथये;ः स्थितोऽपि सनिन्ियिण गृह्यते यथेन्दरियाथयोः । अप्रयक्षे हि वाच्यवाचकरशक्ती |
ननु चोक्त-- स्थितश्वेत् प्रथमश्रवः) ऽपि तं प्रतीयुरिति । उच्यते---न हि |
ततश्च येनोच्यते शब्दादर्थोऽनुमेय इति-- तदसत् । सम्बन्धाम्रहणाव् । परप्रयोगव्यड्ग्यत्वाच सम्बन्धस्य । न ह्यनुमानं परश्रयोगमपेक्षते ॥
1. 3, भ. गी. 12. 23,
४, 1, 1. 8. 1. 4. विष्णुसहसलनामस्तोत्रम्
1. त्र, उ, 2 ते, उ.
५ सूः [दा ७८ पातज्ञटयागसूत्रभाष्याविवरणे
[ भाष्यम् | सगान्तरेष्वमि वय्यवाचकशक्लयपेक्षस्तथेव सङ्केतः क्रियते । सम्प्रति- पत्तिनियतया नियः शब्दाथंसम्बन्ध इलयागमिनः प्रतिजानते ॥ २७ ॥
[ विवरणम् | अथ त्रूयादनुमितात् संबन्धादर्थानुमानमिति । स वक्तम्यः कथमनुमितः शाब्दा थंसम्बन्धः ? इति ॥
स चेत् व्रूयात्-क॑द्नादर्थं हि प्रतील पश्वादवुमिनोति तस्संबन्धम् । यथा चक्षुरा खूपपुपलम्य चक्षुस्पंवन्धमिति ! स प्रतिवक्त्यः--सिद्ध तर्हि वरिनाऽनुमानेन सब्दादेव प्रतिपत्तिरिति };
यो हि प्रष्टपकेनेव कृताथ; ङं तस्य किङोरिपाकेन | अपाप्तकृत् परयोगदरनाद् गृह्यते सम्बन्धः, यथाऽभ्निधूमयोरिति चेत्-- नतुत्रूमःनदहि सहस्नेष्वपि ग्रयोगे९ प्रक्षेण शान्दाथये; सन्धो गृह्यते यथाऽप्निधुषयोरादात्रपि संवन्धो गृह्यते । वाक्येऽप्ययमेव ॥
तस्मादवस्थितमेव वाच्यस्येश्वरस्य वाचकेन प्रणवेन सम्बन्धमवद्योतयति सङ्केतो यथा स्थितं पितापुत्रसतवन्धम् । सङ्केतोपायपिक्षवात् प्रथमश्रुतान्नाधः प्रतीयते । यथा चक्षुष आलोकामवि ॥
ननु च शब्दानित्यत्वपक्ने कथपनिल्ये सनन्धिनिं निलयः संबन्ध इति । न द्यनिखयो रञ्जुषटयोः संवन्धो निष्यः स्वात् । उच्यते--यथा प्रमाणप्रमेययो- रिन्दियविष्रययोश्च क्रियाकारकाणां सं्रन्धः स्थित एवानियेष्वपि संबन्धिषु, तद्रदत्रापि स्थित एत्राम्यमिचपिण सबन्धः सर्गादिष्वपि व।च्यवाचकडक्य- प ०५ पक्षः सङ्खतः ॥
यथेव ॒ रूपचक्षुषरप्रद्यप्राहकरशक्तथपेक्षयैव सगदो सर्गस्तयेहापि
#४ = (~ अ
वाच्यवाचकरकत्यपेक्षयेव सङ्केतः करियते ॥
सम्ध्रतिपत्तिनिद्यतय। ब्रृद्धपरम्परयेव गम्यगमकमभावेन रशब्दाधयो; संप्रतिपत्तिर्निल्या नान्यथेति भगमिनो वेदवादिनः प्रतिजानते । सम्ध्रतिपत्तिश्च रब्दाथसवन्धस्य हेतुस्तदेषाम् ॥
तदेतदुक्तं भव्रति--यदागमिपक्षः स्यादथान्यपक्षः, सर्वथा स्थित एव सबन्धः पितापुत्रयोखि सङ्कतेन।भिभ्यञ्यत इति ॥
समाधिपादः प्रथमः । ७९,
[ भाष्यम् ] विज्ञातवाच्यवा चकखस्य योगिनः--
॥ [ सूत्रम् ] तज्ञपस्तद्थभावनम् ॥ २८ ॥ [ भाष्यम् | प्रणवस्य जपः, प्रणवाभिधेयस्य चेश्वरस्य भावनम् । तदस्य योगिनः प्रणवे जपतः प्रणवार्थं च भावयतः चित्तमकामरे सम्पचते । तथा चोक्तम्--
«५ स्वाध्यायाच्योगमासीत योगात् स्वाव्याय्मामनेत् । साध्याययोगस्तम्पच्या परमाम प्रकाशत ॥'” इति ॥ २८ ॥ किञ्चास्य मवति-
( विवरणम् ] वाच्यवाचकयोरस्थितसबन्धते तु प्रणवस्येणामिमुखीभव्रतीश्चर इति नावकल्पते । न हि पाच्यपाचकसंबन्धे न च स्थिते पाचकाग्न्युपादाने पाकार्थ कल्पते । स्थिते तु बाच्यवाचकक्षव्न्धे भगवद्।राधनताधनस्य प्रणवस्योपादान- मवकल्पत इति तव्परतिपादनार्थं सथ भाष्यम् ॥ २७ ॥
एवमवगतव।च्यवाचकरसंवन्धस्य योगिनः परमेश्वरप्रसादनं कथे क्रियत इति तदथमाह-- तञ्जपस्तदथमावनम् तस्येश्वरवाचकस्य प्रणवस्या्भचतुरमातरस्य त्रिमात्रस्य वा जपः मनसोपां्च वा आवर्तनं जपः, तदर्थस्य चेश्वरस्य प्रणवेन वाचकेन समपितस्य बुद्धे समारोपितस्य भावनमभिष्यानं तद्ैभावनम् । कतैग्यमिति वाक्यशेषः ॥
तदेवमुमये कुवैतो योगिनः चित्तमेकाग्रं सम्पद्यते । एकाम्रसम्पत्िं च तदाराधनफलं दरोयति- तथा चोक्तम्--स्वाध्यायादयोगमा (तिष्ठत् )सीत स्वाध्यायात् प्रणवजपादीश्वर प्रह्यवनतचित्तः सन् योगमाप्ीत । तद्मीश्वर ध्ययेत् । (रस्ययत् )तदथध्यानाचप्रचठितमना; स्वाध्यायं प्रणवमामनेत् मनसाऽभिजपेत् । मानक्षोऽभिजपः प्रास्यते ध्यानस्यासननतरतात् । मा विषयप्रवणचित्ता भूदिति । एत्वे स्वाध्याययोग्तम्पच्या तद्विरोधिना प्रययान्तरेणानमिषातः स्वाध्याययोगस्रम्पत्तिः । तया च प्रणवजपपरमेश्वर- ध्यानसम्पस्या पर् आता पसेष्ठी प्रकाशते योगिन इति ॥ २८ ॥
८० पातञ्ञल्योगसुत्रभाष्यत्रिवरणे
सूत्रम् ] ततः प्रत्यक्ूचेतनाधिगमोऽप्यन्तरायामावश्च ॥ २९ ॥
[ मध्यम् ] ये तावदन्तराया व्याधपिप्रभूृतयः, ते तावदीश्वसणिधानान्न भवन्ति । स्वरुपदरनमप्यस्य भरति । यथेवेधरः पुरुषः शुद्धः प्रपञ्चः करेवछेऽतुपत्मः, तथा अयमपि बुद्रैः प्रतिसवदी यः पुरुषस्तमधि- गच्छति ॥ २९ ॥
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अथ केऽन्तरायाः ? ये चित्तस्य क्क्षिपाः | के पुनस्ते? कियन्तो वा? इति-
| तरिवरणम् ] किश्चास्य भवति ? पूवैपूत्रे चित्तमेकाग्रं सम्प्यत इ्युक्तमेकं फलम् , तदेपक्षया किञ्चेति चकारः । किंञ्चान्यदप्याप्ति फलम् £ आदहोस्िचचित्तेकाग्रत्व- मेवेति; तत्राह- ततः प्र्यकूचेतनापिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च । ततः तस्मार्दश्नर्रणिधानत् प्रयक्चेतनाषिगमः प्रयक् स्वबुद्धि चैतयत इति प्रयक् चेतन आत्मा, तस्य अधिगमो यथावत्छरूपतवेदनम् ॥
ननु चाधिगत एव प्रयातं पुरुषोऽहं खी दुःखी चाहमिति । एवं प्रसिद्धं, ततः क्रि विशेषेणोच्यते इति । सप्येपवम्-- रिं वविरिषटोऽसौ प्रययश्चित्तस्य व्या । किंञ्च-- सुखी दुःखी चाहमिति षुखिदुःखिक्तामानाधि-
। क
करण्यदिदहाहप्रलयस्य चित्तद्त्तिविषयत्वादविद् प्र्यय एव प्रसिद्धिः ॥
कथं तद्यष्याधिगम इव्याद--यथेवेशवरः पुरषः शुद्ध; डेशादिमल- वर्बितस्तत एव प्रसन्नः स्वच्छस्तत ए केवलो निल्ञिगुणस्तत एव निर्प- स्स्तापत्रयवर्जितः प्रकृष्टसचप्रति्तमेदो च तथाऽयमपिं मदीयः पुरुष; शुद्धः
प्रसन्नः केवलो निरुप बुद्धेः परतिसेवेदीयवगच्छति ॥
यथा तयेति च दृान्तदाटन्तिकनिर्दशादीश्वरकषेत्र्ञयोर्भद उक्तो भवति । बद्धमुक्तोपपत्तेश्च । प्रधानस्य पारार्थ्योपपत्तेः । क्षत्रज्ञानां चात एव परस्परभेदः ॥
सभाधिपादः भ्रथम॑ः ८१
[ सुत्रम् ] व्याधिस्यानसंशयप्रमादारुस्याविरतिभ्रास्तिदशनान्ध- भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ ३० ॥ [ भाष्यम् ] नवान्तरायाश्चित्तस्य विक्षिपाः । संहते चित्तवृत्तिभिभैवन्ति । एतेषामभवे न मवन्ति पूर्वोक्ताधित्तवृत्तयः । ग्यापिः धातुरसकरण- वेषम्यम् । स्यानम् अकर्मण्यता चित्तस्य । संशयः उभयकोटिर्क् विज्ञानम् 'स्यारिदमेवे नेवं स्यात्" इति । प्रमादः सम।षिसाधनानाममाव- नम् । आलस्यं कायस्य चित्तस्य च गुससवादभरवृत्तिः । अविरति; चित्तस्य विषयपम्प्रयोगास्मा गर्षः।
[ विवरणम् ] किश्चास्य भवति १ ये तावदन्तराया व्याधिप्रभूतयो वक्ष्यमाणास्तेऽपि चास्येश्वरप्रणिषानान्न भवन्ति ॥ २९ ॥
तत्र कै तेऽन्तरायाः ? कियन्तो वेवाह--व्याधिस्यनेयादि । संषयया तवन्नवान्तरायाः । स्वद्पेण च व्यत्यादयः । व्याधिषातुरसकरण- वैषम्यम् । धातवो बातपित्त्ेष्माणस्तेषां विषममावो वैषम्यं, त वातपित्श्ेम्मभूविष्दरव्योपयोगादिम्यो जायते । स्वयोन्यागमे हि धातूना बरद्धिमाचक्षते ॥
रस॒ उपयुक्ताारस्य परिणामविशेषः; । स च सप्तधा, रसकर्यतवादरप इत्युष्थते रसलोहितमेदोमांसास्थिमनश्युङ्का्यः । तस्य वेषभ्यं बरद्धिक्षयौ । करण- वेषम्यमन्धनधिरतादि ॥
स्यानमकर्मण्यता चित्तस्य स्तिमितम् । संशयः स्यणुवी पुरुषो वेति विरुदधोभयकोटिसपक् प्रययः ॥
प्रमादः समाधिसाधनानामभावनमदील्नम् । भारस्यं कायस्य चित्तस्य च गुरुतवादप्रवतेनम् । भविरतिशित्तस्य विषयसम्प्रयोगस्वभावो विषयस्प्रयागनिमित्तो वा गद्धंः अभिका तृष्णा ॥
11
८२ पातञ्चख्योगसुत्रभा्यविबरणे
[ माष्यम् | ` अन्तिदशेनम् विपयेयज्ञानम् । अरन्धभूमिकतवं समाधिभूेरलामः। अनवस्थिततं यष्ठन्धायां मूमो चित्तस्याप्रतिष्ठा । समापिप्रतिरम्मे दहि
सति तदवस्थितं स्यात् इति । एते चित्तविक्षेपा नव॒ योगमलाः,
ष [नकप विप ध
योगग्रतिपक्षाः, योगन्तराया इलभिधीयन्ते ॥ ३० ॥
| सूत्रम् व विक्षेपसहभुवः ॥ ३१॥ | भाष्यम् ] दुःखम् आध्यालिकमापिभौतिकमापिदेविकं च । येनाभिहताः प्राणिनः तदपेवाताय प्रयतन्ते तदुदुःखम् । दो्मैनस्यम् इच्छाविषातेतसः
[ विवर्णम् । +भ (~ © * ५ न [+ प्रानितिदशंनं विपर्ययज्ञानं योगसाघनेषु तन्मर्म षा विपरीतद्ृत्तिः । अरुग्धमूमिकत्वं समाधिभूमेरखामः । भूमयो वितकौदयश्चित्तस्य धमेविरेषा उक्ता वक्ष्यमाण।श्च । अनवस्थितायामपि समापिभूमौ ततः कथमपि प्रचलितस्य
चित्तस्य पुनस्तत्रावस्थितत्वेव स्यत्तदलामस्वनवस्थितस्वमुच्यते ॥
तदेते तवान्तरायाः । अन्तरं वरव विच्छेदं कुन्त आयान्तीलन्तरायाः ्षेपाः, प्रतिपक्षा: योगप्रतिरपस्तणीः । एते च सह चित्तवृत्तिमिमैवन्ति । त्तं॑विक्षिपन्ति विषयेधिति चित्तविक्षेपः । क्षिप्रं ते क्षिपन्ति] सहेते
तिभिः पञ्चतयीमिरन्योन्यप्रयेज्यत्रयोजकमावेन भवन्ति । अथेषामभवि व्याधिप्रमृतीनाममवि सहायवलामावान्न भवन्ति पूरवोक्ताःप्रमाणादय-
4 क न
ध्रित्तव्रत्तयः । तद्धावम।वित्वात्तुल्यग्रल्ननीक। वृत्तिविक्षेपा इव्युक्तं भवति ॥ २० ॥
॥५|
दुःखं येनामिहताः प्राणिनस्तदपघाताय प्रयतन्ते चेष्टन्ते । तच्च त्रिविधम् । आध्यात्मिकम् + अधि भास्नीलध्यात्म् , तत्र भवमाव्यालिकम् |
(५ (+
तच शारीरं मानक्तं च । सरीरं धातुरैषम्यादिनिमित्तम् | मानसमिष्टविधातादि- हेतुकम् । आधिभौतिकम् अपि भूतेष्विदयधि भूतम् , तत्र भवमाधिभौतिकम् । तच्च पञ्यमृगादुपनिपतितम् । आधिदैविकमिंति अधि देवेभिल्यधिदेवम् तत्न भवमापिदेविकम् । भध्यास्ादिभ्यष्ठक्' इत्युपसंख्यानात् ठक् 1 अनुाति-
कादिलादुभयपदघरद्धिः । तच्चापि वातवषीदिनिभित्तम् । तदेकमेव सन्निमित्तमेदेन ` रजोरूपं भिघते |
समाधिपादः प्रथमः ८३
| भाष्यम् || क्षोभः । यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदज्गमेजयतवम् । प्राणों यदद्य वायुमाचामति स श्वासः । यक्कौष्ठवं वायुं निस्सारयति सर प्रशवासः। एते विक्षेपसहभुवः । विक्षि्तचित्तस्येते भवन्ति । समादितचित्त्येते न भवन्ति । अयते विक्षेपाः समाधिप्रतिपक्षाः ताभ्यामेवाभ्य।सवेराग्याभ्यां निरेद्धव्याः ॥ ३१॥
तत्राभ्यासस्य विषयमुपसंहरन् इदमाह-
[ सूत्रम् ] ततप्रतिषेधाथमेकतच्वाम्यासः ॥ ३२ ॥ [ भाष्यम् | विकषेपप्रतिषेधारथमेकतसारम्बनं चित्तमभ्यपेत् । [ विवरणम् |] दोमेनस्यमिच्छाविधाता्रेतसः क्षोभः अकुरछामावः सश्वरुनम् । यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदज्गमेजयसवम् । (न् तच्च प्राणायामा्धाम्यास- परमवश्वासतावपि तथा समुद्भवः) यद्राह्यं वायुमाचामति बाह्वायाराकरण- ब्ाहुट्कं [स्यम् ] निष्रमणमन्दता च शासुः । तदिपरीतन्यपारः प्रधासः-- यत्कौ्ठवं वायुं निस्सार्यति । एते विक्षेपसहभुवः विक्षेपैः सहते विक्षि वित्तस्यैव भवन्तीति विक्षेप्हसुवः । समाहितचित्तस्यैते न मवन्तीति यावत् । यावदावच्चेतः समाधीयते तावत्तावन्न भवन्तीति । ताम्यामेवाम्यास- वैयग्याम्पापरपरामपितम्याः ¡ नान्यं प्रतिपक्षमयेक्षन्ते ॥
अम्यासवेराप्ये मुक्ला न हि प्रसेश्चरप्रगिध।यिन्यः[म्यः प्रभावे मवतीति गम्यते । "अन्त्रायामावश्चः शइ्युक्या प्राक्तनादपीश्चरणिधानादन्तराया निर्ष्यन्ते ॥ ३१ ॥
अम्यप्षवेराग्याम्यां तन्निरोध ह्युक्तम् । तत्र वैराण्यविषयः प्रतिपादितः । इदानीमम्यापतस्य विषयमुपतंदरनाह--तसरतिषेषारथैमेकतत्वा- भ्यास इति । तेषां विक्षेपाणां प्रतिषिधाय तसखतिषेषार्थम् । रकं त. मेकतसम् । तच्चैकं तत वस्तुलान्नाम्यसितुं॑राक्यम् । न द्यात्भादिवस्तुनां
1, यो. षू. षा. 1, दु. 29
५५ > म ८ पततिज्ञखयागसूत्रभाष्याववरण
[ माष्यम् ] यस्य तु प्र्यथनियतं प्र्ययमात्रं क्षणिकं च चित्तं तस्य सरवैमेव वचित्तमेकाम्रम् । नास्येव विक्षिप्तम् ।
यदि पुनरिदं सवतः प्र्याहय एकस्मिन्नर्थे समाधीयते, तदा मवस्येकाग्रमिलतो न प्र्थेनियतम् ।
[ चिवरणम् | रीर्ने वक्तुं राक्यते । स्वमाह्यभाग्यावस्यितानि हि तानि न चित्तमत्रानि । वस्तूनां ॒तु॒ चित्ततन्त्रतां प्रतिषेधयिष्यति- (न॒ वैकचित्ततस्त्रं वस्तुः इत्यादिना । तस्मदितदाशङ्कमानो माप्यकार आह--एकतत्वारम्बनं चित्तममभ्यसेदिति । सूत्रेऽप्येकतच्ाम्यास इति समासादयम्थै उपात्त ए ॥
ननु नैकं चित्तमवस्थितमस्ति, यस्यैकतत्वावरम्बनः प्रयय अपद्यत । ्रयय। एव चित्तम्, ते च प्रलथै नियताः क्षणप्रणाश्चिनश्च । प्रयातमसंवेधं च प्र्यानामनवस्थितत्वम् । नपि प्रल्यम्यत्तिरेकेणावस्थितं प्रययि चित्तं नापो- पटम्यते । योऽप्यहमेवाहमिति प्रययः सोऽपि समानप्तन्ततिपतितच्ा- {सादृश्यनिबन्धनः । यथा स एव प्रदीपः त एव केरा इति ॥
तदप्याह-- प्रह [प्रति प्रघ्ययं प्रलय भिनः, प्रप्ययेम्योऽव्यन्तपरस्पर- भिननेम्योऽनन्यत्वात् । एकैक्रसययस्वरूपसद्रतंमानादहेप्रद्ययविधयः प्रलययी भूतभविष्यत्काराहंप्र्ययविषयात् प्रलपिनो भिनः, भिन्नप्रलयविषयत्वात् + घटात् (घ) पट इव । यदि वा--मिन्नकार्त्वात् , विनष्टमविष्यद्वटाम्यां वतमानो घटः [इव] । अर्हप्रयया वा स्वै भिनाङम्ब्रनाः, प्रलयत्वात् + घटपट(दिविषयप्र्ययवदिति ॥
अत्राभिधीयते-स्वशरा्ञषिरोधोऽपि स्यदेव त्रुवत इत्याह- क्षणिकं च यश्य चित्ते ठस्य स्वेमेव चित्तम् एकाग्रम् विक्षेपामावदेव नास्सेव विक्षिप्रमिति स्वैचित्तेकाम्रवाद्िक्षेपप्रास्यमावादिक्षेपप्रतिषेधाय शान्लोपदे- दोऽनथकः स्यात् । अस्ति च चित्तपरिकमयं कैतयाुपदेशः । स च विरुष्येत इत्थ॑धर्मं चित्तमम्बुपगच्छतः ॥
ननु च तवापि वृत्तिषृत्तिमतोरमेदादतुपपनो विक्षेप इति तस्परति-
^~
पेधोपदेशान्थक्यम्- नैष दोषः-- वर्तिवृत्तिमाम्युपगमात् ॥
समाधपादः प्रथमः ८५
[ भाष्यम् | योऽपि सद्यप्र्ययप्रवाहेण चित्तमेकाग्रं मन्यते, तस्य एकाग्रता य॒दि प्रवाहचित्तस्य धर्मः, तदा एकं नासि प्रवाहचित्तम् ; क्षणिकत्वात् ।
[ विवरणम् | यदि बृत्तय एव परस्परभिनाः स्वतन्त्रा इत्तिमतोऽ्न्तमिन्ना जायेरन् प्रदर्थनियताश्च, तत एष दोषः स्यात् । न चैवमभ्युपेयते ॥
कथं तर्हिं £ दृत्तिमदरपेणेकमनेकार्थं च तदृढ्तीनां विषथमेदादवस्यितं च सदसतोर्विपर्ययानभ्युपगमादिलेवमाप्पक्षे समन्ञसतां दर्चयति- यदि पुनरिदं चित्तं दृत्तिमेदननिकधा (म्मिङावयवद्धि) प्रतं साङ्ए्ययोगवादिन इव तवापि स्वेतः सवभ्यः विषयेभ्यः प्रह्याह््य प्र्यानीयेकस्मिनासराचर्थे समाधीयत स्यप्येत तदा भवयेकाग्र पुरुषग्रयासभाग्यलाहमिवयर्थः ॥
ततो युक्तस्तत्पर्किर्मणे शाज्ोप्देरः । (अते न प्र्क्षम् ) अतोऽस्मात् कारणात् तत्परकिमविषयशाखेपदेशात् सांस्ययोगव।दिवत् क्षणिकवबादिनोऽपि एकमनेका्थमवस्थितं च चित्तं न प्रयथैनियतं (व) पश्वादम्युपगमनीयम् । अन्यथा शास्रविरोधः स्यात् । योऽपि सद्शप्रत्ययप्रवारं चित्तमकात्रे मन्यते सदाः समानः प्रलयप्रवाहो यस्येकस्यां सन्ततौ तच्चित्तमेकाग्रम् । तद्विपरीतम् असमानप्रलययप्रवाहं॑विक्षिप्तम् । तथा चैकाप्रता विक्षेपप्रतिषेषेनोपपदते,
तदर्थोपदेरश्वेति कुतः शाच्लपिरोध इति ॥
इतर आह--न प्रवाहचित्तस्येकस्य धर्मिणोऽनभ्युपगमात् । न हि प्रवाहचित्तं नमेकमर्ततवतंमानमविष्य्प्रलयानां धर्मिणमभ्युपगच्छति । यदि ह्यभ्युपगच्छेत् परिक्तः स्वपक्षः ] कस्मात् ! प्रवहचित्तस्याक्षणिकतवात्तदेवैकं नास्ति, यस्थैकाप्रता घमः | प्र्ययनेव हन्येन्यसहतान् पिपीठिकापङ्किकल्पानसाव- म्युपगच्छति ॥
अयेवं मन्यते, यथय्येकं नास्ति तथपि सरवषमिव प्रययानां सद्श- प्रवाह्मणपिकाप्रता धमः प्रदीपार्चिषामिव प्रकाश इति- तत्राद--नायुगप- त्कारोदत्तित्रिनारानां समाहारः सम्भवति । दष्टन्तस्य च साध्यविकसर्ूत्वात् । न हि बहीनामर्चिषामेकः प्रकाराः । प्रलविषमस्य भेदात् । नचापि प्रकाशस्य
विषां चैको धर्मो नामास्ति ॥
८६ पातज्ञलयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भष्यम् |
$. © अथ प्रवाहांशस्येव प्रलयस्य धर्मः, स सवैः सद्श्रययप्रवाही वा॒विसदराप्रययप्रवादी वा ्रर्थनियतत्वादेकग्र एवेति विक्षिप्तचित्ता-
नुपपत्तिः । तस्मदिकमनेकाथेमवस्थितं चित्तमिति ॥
यदि च चित्तेनकेनानन्विताः स्वभावमिन्नाः प्रयया जायेरन्,
अथ कथमन्यप्रयय््टस्यान्यः स्मता . मवेत्, अन्यप्रययोपचितस्य च कमाशयस्यान्यः प्रय उपमेक्ता भषेत् ॥ | विवरणम् |
अथापि मन्यते प्रवाहांशस्येव प्रयस्य कस्यचिदेकाप्रता धर्मः; यथेकस्यां पिपीलिकासन्ततव्रेकापि पिपीरिका लोहितेति- तच्च न--पूरवदोषा- नुषक्तेः । सवैः प्रययः प्रवाहाः सद्वादी विपद्शवादी वा पूरवैवत् प्रयथनियतत्वादेकाग्र एषेति विक्षिप्तचित्तानवष्पिः । तस्मादकमनेकाथ- मवभ्थितं च चित्तमम्युपगन्तव्यम् । यदि राल्चेण चित्तपरिकिरमोपदेकष्यते ॥
करं च-- यदि चिततेनकेनानन्विताः करणेन स्वभावमिन्नाः प्रयया जायेरंस्तदा बूहि कथमन्यप्रययदषटस्यान्यः प्रययः स्मर्ता मवेदेवदत्तदृ्टस्थव यज्ञदत्तः । अन्यप्रस्ययोपचितस्य वा कमीरयस्यान्यः प्र्यय उपभोक्ता ॥
न हि भविष्यपपुत्रः पित्रा रचितकर्मारायफङं स्वर्गदि प्रत्युपसुक्षीतं । अथ त्रयात् विरिष्टमविष्यदपुनविज्ञानार्थं॑विनरयघ्रङृत्तिविज्ञानमारयवि्ञान- संस्कार कञश्चनाधत्ते इति- नैतदेवम्--आल्यप्रवृत्तिविज्ञानयोरयन्तमेद।द- वप्तुत्वाच्च ॥
यथाल्यविज्ञानान्न तत्महत्तिविज्ञानं, तदा तदेव तदिति नाममात्रमेदः+ तथा च संस्काराघानयुक्तवात् स्मृत्यनुपक्टटपति; । अथाप्यन्यत्-एवमप्यन्यत्प्रबृत्ि- विज्ञान मायविज्ञनि संस्कार नादधीत, भिनत्वात्। यथा सन्तलयन्तराख्यविज्ञाने ॥
विच--य्पि संस्कारमाधत्ताम् , तथापि प्रदृत्तिविज्ञानापादितसंस्कार- माटयविज्ञानं देरकालन्तराक्षमम् । तस्यापि क्षणिकत्वाम्युपगमादविनश्यत्च {` (~
तावलेव नेत्तरविज्ञनोपकाराय पयापरोति । देशकाकान्तर्यवहितं चेदुपकुर्बीत, तदा भिननतन्तानान्तरजन्मनाप्युपकतेग्यम् || |
समाधिपादः प्रथमः ८७
अथ कालान्तरावस्यायि, तदा क्षणिकत्हानिः । क्षणान्तरं चेदवतिष्ठेत, दौैकाठाबस्थायिषे क्य स्यादक्षमा ॥
अथापि ्रदृत्तिविज्ञानसं(कारविरि्टस्यान्तरारुभाविन आममतदरास्य भविष्यत आख्ययिक्ञानस्य संस्कारमाधाय पू्वमाख्यविज्ञानं विनद्खुथतीति--
तच्च न- संस्कारान्तरामावात् । अस्ति चेदनवस्थाप्रसङ्गः । अय नास्लयाधारः,) तत्र कि प्रद्त्तिविन्ञानस्याख्यविज्ञानकल्पनया संस्क।राधानाय । यथा आच्यविज्ञानमुषित्तिष्यमाणस्य तत्काकमसतः आल्यनिज्ञानस्य संस्कार- माधत्ते, तथा प्रवृत्तिविज्ञानपपि उपि्षिष्यमाणस्य ततकालमप्ततः प्रदृत्तिवि. ज्ञानस्येव संस्कारमाधत्तामनयपेश्ष्याख्यविज्ञानम् ॥
न च विनर्यत् अन्यस्य भाविनस्तत्क।छमविधमानस्य संस्कारमाधत्ते इयस्य दृष्टान्तो दृरयते । नापि माविन्येव संस्कारं कुर्वत । पूर्वेण मविष्य- त्तस्रियते, भविष्यति चेति विरुद्धम् । तत्कालं चेदसद्गविष्यत्संक्रियते, कि तुल्यातुल्यसन्ततिकल्पनेन १ असंबन्धाविशेषात् सर्वै सवण संस्क्रियत ॥
नापि मविष्यद्धिनरयतोयुगपदुसत्तिविनाशवक्षणिकलप्रसङ्गात् । भय तुलन्तयोखि नघ्युनती युगपदपततरिनाशोत्तरसमुपत्ती स्याताम् (न) वस्तुनारिति चेत्-न-अम्युफगमविरोधात् । नहि वैनारिकेनोत्पत्तिविनाशक्रिया- व्यतिरेकेण कारकमन्यदिष्यते । अभ्युपगमे च सिद्धान्तविरोधः ॥
किच--अन्यत्वे च .करियाकारकयोयावत्कियोत्पत्ति कारकेणावस्थातन्य, ततश्च क्षणिकवहानिः। अ[न |वस्थाने च क्रियायै ततः[तस्य] उपादानमनर्थकम् ॥
किं चान्यत्-- क्रियाथा एव कारकत्वे कारकस्यापि क्रिया करियाकारकरान्दौ पयौयौ स्याताम् । ततश्चाद्छुरो जायते, देवदत्तो जायत
¢ ¢ (~
इ्यङ्कुरदेवदत्तयोः पथायत्वं स्यात् । तयोजंनितक्रियामात्रत्वात् ॥
अथ अन्यजनिक्रिया देवदत्तविशिष्टा अन्या चाङ्कुरविरिषेति चेत्-- अभ्युपेतं तहिं विरोषणे कारकं, न हि स्वख्पेण रकिचिद्िरिष्ट स्यात् ॥
अथोच्येत, स्वद्येणवेत्प्तित्रिय। उदत्तिक्रियान्तरादिशिष्टा यथा स्वलक्षणानि रूपादीनि इति--तच न- मवाभावयेरिकरवभप्गात् । इद्ाङ्कुरो जायते नस्यलङ्छुर् इति च य॒ एव॒ जायते सु एव॒ नर्यति तत्राङ्कुरजनन्,
८८ प।तञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भाष्यम् | 'कथशच्धित् समा्धीयमानमप्येतत् गोमयपायसीयन्यायमाक्षिपति । किंच-- स्वारानुमवाप्ह्ववः वचित्तस्यान्यतवे प्रभोति । कथम् ? '्यदहमद्राक्षं॑त्स्पृशाभि' भ्यन्चास्परक्षं तस्पश्यामिः इयहमिति प्रयः
[ विवरणम् | मङ्कुरविनारनमिति जननं विनाश ॒इ्युक्तं भवति । अद्रे हि क्रियेव कारकमिति वेच्येत (चितः) ॥
अथापि स्यात्--अन्ये(न्यस्येवाङ्कुरजननक्रियाया अङ्कुरविन।रा- त्रियेति- तयाऽप्यङ्कुरजननस्य निद्यतप्रसङ्गः । विनाशस्यन्यत्वदिव ॥
अथापि नाश्चजननवद्रस्तु राबरमिति, तथाऽप्यभावस्य इाबल्त्व प्रस्तभ्येत । कथम् ? क्रियाभ्यतिरिक्तस्य कारकस्यामवेऽपि नादा एव जननवि- नाङ्ावान् जननमेव जननविनाशवदिति । न ह्यभावस्य शनख्तादिविदेषो निर्विरोत्मवाद्भावाभावयोश्वाविरोधात् प्रयक्षानुमानानुपपत्तिः ॥
यदप्युच्यते- तुखन्तयेन॑मेनामाविति- तत्र युक्ता तुखन्तयोरेक- कालयोर्विवमानत्वादन्यतरस्य वस्छन्तरगोखनिमित्ता आनतिरन्यतरस्य चोन्नति, | इह पुनर्मवद्भविष्यत्कालयोर्वजञानयोनीशोत्पत्ती तुानामहेतुवत्ततीयस्य निमित्तान्तरस्यामावदेककारं नोपपद्येते । विनश्यदेव विज्ञानमालसस्री जनयतीति न राक्यं वक्तुम् । न हि देवदत्तो प्रियमाण एवाससमानं पुत्र जनयति विनारोनाक्षणलात् ॥
अथ मूतिण्डो यथा घटपुतादयन् विनदथति, तदिति चेत्- तच्च न-- मृदवयवानामेव घटाकरण परिणतघात् । एकैव हि मृिण्डवटादि- बहुधयोगिनी ॥
यच्चपि भीजेषु द्रन्थान्तरवाप्तितेषु वास्तकद्रब्यानुविधायितव बास्यद्रव्यस्येति- तदप्यक्रारणम् वास्यवासकयेरस्थितत्वात् । अवस्यितान्येव हि बीजेष्वङ्कु- रादीनि वास्यन्ते बीजवसनेन । तदन्यखात् वाप्तकद्न्यस्याप्यवयवाननुप्रविष्टः सूक्ष्मा विधन्त एव । तस्माद्विथमानान्येवद्कुरादीनि बीजवाप्तनया वास्यन्त
{. विवरणरीत्या इदं पदं भाष्ये नास्तीति भाति |
समाधिपादः प्रथमः ८९
[ माष्यम् | स॒वेस्य प्रयस्य मेदे सति प्रययिन्यभेदेनोपस्थितः । एकप्र्पि- विषयोऽयमभेदासमा अहमिति प्रययः कथमलन्तभिननेषु चित्तु वतमानः सामान्यमेकरं प्रयपिनमाश्रयेत । स्वाुभवम्राद्यश्वाय- मभेदासा अहमिपि प्रलयः ।
[ विवरणम् ] इति युक्तम् । असतां हाविषाणादीनामुपस्यभावात् । असतां चेदुखत्तिः स्याद्रास्यवाप्तकयेर्विनष्टवादवियमानलाविरोषे वासक्द्रन्याननु विधापि नोत्पयेत । अन्यद्र। हस्तादि ॥
यदि वा, अलन्तास्तदेव शङाविषाणाद्ुपयेत । अतो विरिष्टं हि त्रयाण- मस्ये वासिते बजि | तस्मादवश्ितं कारकं भूतभविष्य्कालनेकड्कत्तियोगि चाभ्युपगन्त्यम् । अन्यथा प्र्ययमात्रे क्षाणिकं चित्तमिति समथयमानस्य समाधीयमानमपि (समध्यैमानमपि) गोमयपायसीयन्यायमाक्षिपति ॥
ययैव बहुमिरपि गोविकारत्वादिदैतुभिः समीहमाने कृतटेपिनापि गोमयं पायसीकर्तुं न शक्यम्, तथा क्षणिकेन चित्तेन सारणादि सम्थयितुम् ॥
किंश्च- स्वासानुभवापहवः चित्तस्यान्यत्वे प्रययमात्रते नान्यदृष्ट- मनुस्मरतीति स्वात्मनानुभूतमपहूवरीत ॥
वि ल्मदक्षील्युक्तो दृष्टवानपि नाहमद्रक्षमिति ब्ुषीत । अन्येन हि तत्पक्षे तत् दृष्ट दर्॑यते | तदपहुत्र चानुभूतस्य प्रतिपत्तिः कथम् ? 'यदहमद्राक्षं तत् अहमेव स्पृशामि "यदहमस्पराक्षं तत् अहमेव स्मरामि' इति । सेषा प्र्यस्मरणयोरेककर्तवे सति घटनामुपटौकते प्रतिपत्तिः । अन्यथा मत्स्यो यदद्राक्षीत्तःसघ्योऽहं तं स्प्श्षामीति स्मरामीति च स्यात् । सर्वस्य पुरुषस्याहूमिति प्रयः स्ृतिप्र्ययेोरेकसिन् कतैरि वर्तमानः प्र्ययमेदे
पदयामि स्परञचामि स्मरामयदिप्रलयमेदे सति तेषां च प्र्ययानमेकस्मिन् कर्तरि प्र्ययिन्यभिन्ने चोपस्थितः प्रयक्षश्च ॥
नन्वेकप्रययविष्रय एवन्यः स्मृतेरेकवेऽपि कर्तुरहं प्रयेमि स्मराम्यहमिति नच न मवितभ्ये, प्रयेता स्मर्तेति शब्दभेद द्वद एव । तत्राह-न-प्रयक्षत्वात् ।
तदेव द्यति-- स्वानुभवग्राह्यश्चायमभेदास्मा अहमिति प्रयः ॥ । ४1
९० पातज्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे
[ भाष्यम् | न च प्रक्षस्य माहात्म्यं प्रमाणान्तरेणाभिभूयते । प्रमाणान्तरं च प्रयक्षचटेनेव व्यवहारं लभत ।
[ विवरणम् | अथ प्रलेता स्मर्तेति रब्दभेदात् प्रल्मयमेदाच्चाहम्प्र्ययस्य मिन्नविषरयत्- मनुमाविष्यत इति चेदत आह--न दहि प्रक्षस्य माहाद्यं प्रामाण्य चक्षुषो रप इवानुमानादमिभूयते बाध्यते ॥
वि च~ -प्रयक्षं प्रमाणमयमहप्रल्यो न तत् स्मृतिप्र्ययानमिकस्मिन् कर्तरि सामन्येन वतमानः । सचेत् प्रलक्षप्रमाणभूतोऽलुमानेनामिभूयेत) तदानीमतुमानस्यापि प्रमाणव हीयेत । तन्मूललादनुमानस्य । तदेतदाह-- प्रमाणान्तरं च प्र्क्षबटेनेव प्रामघ्यन्यवहारं मत इति । तेन ्र्यक्षविरेभेन अनुमानविदरेधन च प्रतिवादि(पादितीप्रमाणप्रतिज्ञदिभो व्यास्यातः ॥
अतीतानागतप्रव्ययसस्काराघारादनन्यः इदानीन्तनप्रस्ययसंस्काराधारः, एकसन्तामक्तबन्िवे सति बेघाघ्मकलात् , आमस्वरूपायथा ॥
भूतमविष्यलमत्ययतस्काराश्रयः वतेमानप्रत्ययसस्काराश्रयादनन्यः, एक- सन्तन पजन्य सति बोधा्मकत्ात् , आतमन इव स्वरूपात् ॥
वतेमानाहेप्रययी मूतभविष्यल्मघ्ययिभ्यापभिनः, एकंसन्तानयोगे सति प्रत्पयित्रात् , यथा स्वरूपात् ॥
भूतमविष्यसत्ययिभ्यामनन्ये वतमानः प्र्ययः) एकसन्तानप्तजन्धे सति बोधाप्कत्वात् , आतमरागस्वूपादिम्य इव ॥
भूतमविभ्यस्मव्ययेभ्यो नान्यो वतमानः प्रत्ययी, एकसन्तानसंन्धिवि सति बोधाप्कलात् , आत्मनो यथा सर्पात् ॥
भिन्नप्तन्ततिषु परस्परस्परतिप्रतिसन्धनाधनुपठम्भदिकपन्तानेषु च समर्थादिदरनदिव सिद्धमेकक्ततम् । तथा स््रमणेभ्यो गरीयसा प्रघयक्षेण प्रमाणेन | तत्र न रिंचिदनुमानेन साध्यम् | न हि कश्चित् करतरलान्छनदिद्क्षया दरपैणमादत्ते | तथाऽपि वैनारिकोपररचितानुमानापक्लदमप्तहमानाः केचित् प्रव्यनु-
समाधपादः प्रथमः ९१
[ माष्यम् | तस्मदेकमने ाथमवस्थितं च चित्तम् ! यस्य चित्तस्यावस्थितस्येद शस्त्रेण परिकर्म निर्दिश्यते ॥ ३२॥ तत्कथम्-- नी शत ॥ सतम् ] वि । करुणासुदितापेक्षाणां सुंखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातधित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥ [ भाष्यम् | तत्र पपप्राणिष्च युखसम्मोगापननेषु मैत्रीं भावयेत् । दुःखितेषु करुणाम् । पुण्यात्मकेषु मुदिताम् । अपुण्यश्ीटेषुपेक्षाम् । एवमस्य भावयतः शङ्को धर्म उपजायते । ततश्च चित्तं प्रसीदति । प्रसन्नमेका्रं स्थितिपदं लभते ॥ ३३ ॥ [ विवरणम् ] मानानि पेराखनि दर्शयन्ति । तथा चाह--तस्मादेकमनकाथमवस्थितं च चित्तम् । यस्येदं शाश्चेण परिकमं निर्दिश्यत इति--शाज्नोपदेरसम्बन्धिवव चित्तस्यावस्ितवे हेतुपुपदिरशति । न हि विीर्माणस्य घटस्य प्रक्षारन- परिवर्तनादितस्कारः कियते ॥ ३२ ॥ कथं चित्तपरिकम निर्दिद्यते ए तथेकतच्वाम्यास्त इति चोक्तम् , किं च तदेके तचम् £ यद्धिषयोऽम्यास इति । तत आह-- मेत्रीकरुणामुदितेपेक्षाणां सुखःदुखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनात- श्चित्तप्रसादनमिति । मेत्री मित्रबिषया भावना) ताशी सुविते घुखमदुमोद- यनतीमसूयादिवर्जिताम् । तथा दुःखितेषु कर्णां कृपाम्. अनु नानतीं दुःखम् । पण्यासमकगु मुदितां पुण्यशीर्तामनुजानतीम् । अपुण्यश्शीठेष्ु चेपिक्षाम् अपुण्यरारन्यापरिषूदाक्षीनतां च भाक्ेदिलयनुषञ्यते ॥
सकत्रैवमस्य भावयतः, शङ्क इति विञ्जुद्धः प्रण्युपघातादिवर्जनाच्छुकञो धर्मः ¦ ततः स धमे इव जातश्चित्त प्रसादयति । तेन प्रसन्नं चित्त- मेकाग्ं स्थितिपदं ठमते । एकाग्रतया समाधीयत इत्यर्थः तदुक्तम्--“प्रसन्न- चेतसो ह्या बुद्धिः पर्यवतिष्ठते' इति ॥
1, म, गी, 2. 63.
९२ पातञ्जलख्योगसुत्रभा्यविवरणे
| सूत्रम् | प्रच्छदनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ ३४ ॥
[ भाष्यम् | कोष्टयस्य वायोः नासिक्रापुराभ्यां प्रयज्ञविरेषात् वमने प्रच्छदेनम। विधारणे प्राणायामः । ताभ्यां वा मनसः स्थितिं सम्पादयेत् ॥ ३४ ॥
| सुत्रम् | विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिषस्धिनी ॥ ३५॥
[ विवरणम् ]
-तत्रेपरक्षाया अक्रियारूपववाद्धमीहेदते सति किमरथमिहोपादानम् ए उच्यते--उपेक्षानुपादाने चापुण्यशेष्वपि चित्तं व्यापारं यायात् । ततश्व तद्वयापारेपघानकादटुष्यानौतयादिभावनाया न योग्यं भवति । अपुण्यद्चील- निमि्तनैरमित्तकाकारव्यापारादर्मो वा मा संजनिष्टेति चित्तस्थितिरेवेोपेक्षेति
तस्या उपादानम् । चित्तस्थितिश्वेह सर्महिता ॥
तस्मादित्थ समाहितचित्तस्य मेत्रीकरुणाद्येकतच्चारम्बनं चित्तं रीलयतः
प्रागभिहिता अन्तराया न जनिष्यन्ते ॥ २३ ॥
प्रच्छर्दन विधारणाभ्यां वा प्राणस्य । वाशब्दो केत्यादिभावनोपायान्तर- त्रिकल्पाथः । मेत्यादिभावनायुपायानामन्यतमेन येन केनचित् चित्तस्थितिः सम्पादनीयेति प्रकरणा; । अनेकोपायग्रदरान कस्यचित् कचित् घुकरतमि- प्रियेण । प्रच्छदैनविधारणाभ्यां व्यस्ताभ्यां समस्ताभ्यां वा । प्रच्छर्दनम् कौष्ठ्य वायोरतमितोरुदमनं नाभिकाम्याम्, न मुखेन । विधारणं प्राणायाम. आतमितेरिव । यथपि ्रच्छदैनेनापि प्राणः आयम्यते, तथापि बहि्वत्तिनं निरुष्यत इति विधारणं प्राणायाम इति विच्ेष्यते॥ ३४ ॥
विषयवती वा प्रवृत्तिरुखन्ना स्थितिनिभन्थिनी । चित्तस्येति वाक्यदोषः । विषया गन्धादयो यस्या योगप्रवृत्ते्न्धादिसंवेदनलक्षणाया आलम्बनीभूताः) स विषयवर्तील्युचयुते ॥
प्रबतिर्नाम योगिनो योगमम्यस्यतः अमिमुखीमावं प्रतिप मानस्य योगस्य यः प्रथमोऽभिमुखीमावः प्रल्ययकरणो योगाुष्ठानं प्रदयुत्साह-
समाधिपादः प्रथमः ९३
[ भाष्यम् | नािकम्रे षारयतोऽप्य या दिव्यगन्धसंवित् स। गन्धभ्रवृत्तिः। जिहप्रे रससंवित् । तानि रूपपंवित् । जिहामध्ये सपश्ैसंबित् । जिह्वामूञे शब्द संवित्, ईइयेता। वृत्तय उदयन्न।धित्तं स्थितो निवध्नन्ति, संशयं विधमन्ति, समाधिप्रज्ञायां च द्वारी भवन्ति इति । एतेन चन्द्रदियग्रहमणिप्रदीपरदम्यादिपु प्रतृत्तिरुत्न्ना षिषयवदलेष वेदितव्या ।
यचि हि तत्तच्छास्रानुमानाचारयोपदशैरवगतमथंतचं सद्मूतमेव भवति । एतेषां यथामूता्प्रतिपादनसामर्थ्योत् । तथाऽपि यावदेक- देशोऽपि कश्चिन्न स्वकरणसंवेबो भवति, तावत् सवं परोक्षमिवाप्वगी- दिषु सृष्सोष्वर्थेषु न दां बुदधिमुत्ादयति । तस्ाच्छन्ञानुमानाचार्योप- देशोपोद्वलनाथैमेवावदयं कश्िदथेविशेषः प्रसक्षीकतेन्यः । [ विवरणम् 1 जनने निभेथ्यमानस्यप्नेति धूमसमुद्धवः, सा प्रवृत्तिः | सा च ताद्री
[क
रवृत्तिससन्ना प्रययरकरणात् ब्रहर्षयन्ती योगिनधित्तं स्थितौ निबधाति ॥
नासिकम्रे चित्तं धारयतो गरन्धसंवित् प्रह।दनकरघुरभिगन्धरवेदनं निरन्तरतया सम्भतसंयोगमिवाचक्षाणा जायते । सा गन्पप्रव्त्तिः । तथा जिहवादि§ । धारयत इति सम्बध्यते । ता एताः प्रवृत्तयः स्थितौ चित्त निबध्नन्ति । संरायं विधमन्ति समाधिप्रज्ञायाश्च दवारीभवन्ति ॥
एतेन रश्मिचन्द्रादियग्रहप्रदीपादिषु चित्तं धारयतो हृदयपुण्डरीके- वा॒.धारयतो वैषम्याद्रसिचन्दायकारा प्रघृत्तिरुयन्ना विषयवतीयेव वेदितव्या ॥
यथपि शाख्चानुमानाचरयम्योऽवगतमथैतत्वं तथाभूतमेव अव्यमिचारिखरूपमेव । तेषामन्यथाभूताप्रतिपादकतात् । तथाऽपि यावदेक- देशोऽपि स्वकरणसंवे्ो न भवति प्रलक्षो न भवति शाल्ञाधुपदिष्टस्यार्थ- सयैकदेशोऽपि, तावत् सर्व परेक्षमिवापवगीदिषु पृक्समष्रथेषु न ष्टां बुद्धि- मुत्पादयति । तस्माच्छान्चानुमानाचार्योपोदडनाथेमवद्यं कधिद्िरोषः परयक्षीक्ेग्यः ॥
~ व [न ९४ पातञ्जटयागसुतजरमा्य्रधिवरणे
[. भाष्यम् | तत्र तदुपदिष्टथैकदेरप्रयक्षत्वे सति स्वं ॒सृष्ष्मविषयमपि आ अपवगौत् श्रद्धीयते । एतदथमेवेदं चित्तपरिकम निर्दिश्यते । अनियतासु वृत्तिषु तद्विषयायां व्ीकारसज्ञायापुपजातायां समर्थं॑स्यात् तस्य तस्याथस्य प्र्क्षीकरणायेति । `
तथा च सति श्रद्धीयस्मृतिसमाधयोऽस्याप्रतिषन्धेन भविध्य- न्तीति ॥ ३५॥
[ सूत्रम् | विशोका वा उयोतिष्मती ॥ ३६ ॥ [ विवरणम् | तत्र॒ शान्ञादुपदिष्टयकदेशप्रयक्षतरे सति सव॑ सूष्ष्मविषयमपि आ अपवर्गाच्रद्धीयते। एतदरथमेवेदं चित्तपचिमै यदेतत् 'मेत्रीकरुणा' इत्यदिना प्रमाणुपरममहखान्तोऽस्य वकश्लीकारः' इयेष्मन्तन प्रकरणेन
त #।
यमनियमास्नविश्चिष्टस्य चित्तपरिकर्मोपदिद्यते ॥
तदेतदुक्तं मवति--एतत्प्रकरणोपदिष्टनामुपायानामन्यतमानुष्ठानात् प्र्क्षीकृतैकदेशतय। विधूत (पिध्मात) संशय. त॒ अआ अपवर्गात् द्टावस्थितश्रद्धा- नादि प्ररान्तनहिगत्ति उपस्थितवशीकारसंज्ञविराग्यं तस्य तस्य तर्वयपदो- पदिषटपरिमन्यददरथस्य प्रलक्षीकरणाय समर्थं स्यात् ज्ञानविभूलयादि- प्राप्य्थमिति । ततश्चैवमर्थं चित्तपरि्मपदिद्यत इति प्रकरणाथैः । तथा च भाष्यकारः प्रद्रितवान्--“एतद थेमेवेदं चित्तपरिकर्म' इयेवमादिन। ॥ ३५॥
विशोका वा ब्योतिष्मती प्रवृत्तिरुसन्ना मनसः स्थितिनिष- न्धिनीति प्रकृतममिस्तवध्प्ते । ्योति्ैस्यां विते प्रवृत्तौ पा ज्योतिष्मती । सा च शोकं व्यपगमयतीति विशोका नाम ॥
सा च कथमुपजायत इव्याह--हृद यपुण्डीके धारयतो बुद्धिसवि- द्वति स्वरूपप्षवेदनम् । बुद्धिं हि किंर्पमिलयह--बुद्धिसत्च हि प्रभास्वरं प्रभास्तनरील्माकारचकसपं व्यापि । यत्र यस्िन् बुद्धिसच्े ॥
समाधिपादः प्रथभः ९५
[ भाष्यम् |
क _ (+ ~ _ (५ क) | भ
रव्तिससन्ना मनसः स्थितिनिवन्धिनीलनुवतैते । हृदयपुण्डरीके धारयतो या बुद्धिक्षवित्, बुद्धिस दि प्रमास्वरमाकाश्चकृखम् , तत स्थितिवेशारयात् प्रवृत्तिः सुयैन्दुग्रहमणिप्रमारूपाक्ररिण विकते । तधा अस्मितायां समापन्ने चित्तं निस्तरङ्गमहोदाधिकस्पं शान्तमनन्तमस्ि- तामात्र भवति।
यत्रेदमुक्तम्-““"तमणुमात्रमासानमनुविधासमीयेवं तावस्सेजानीति'' इति । एषा हयी विशोका विषयती; अस्मितामात्रा च प्रवृत्तिर्ज्थो- तिष्मवीद्युच्यते । यया योगिनश्चित्तं स्थितिपदं ठभत इति ॥ ३६ ॥
[ सूत्रम् | वीतरागविषयं व। चित्तम् ॥ ३७ ॥
[ विवरणम् ] स्थितिवैषम्यादिति । बुद्धिसच्वामतासाम्यानापत्तरिति । हदयपुण्डरीक एव धारयतः प्रवृत्तिज्योतिष्मती सूर्यन्दुमणिप्रभारूपाकारेण विकल्पते । तथा चास्मितायाम् अहङ्कर समापन्नं स्यात् बुद्धिस स्वल्पेण सम्यपत्त-
निप्तरङ्कमहोदपिकत्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं मवति ॥
यत्रेदमुक्तं यत्रासिित।समापत्तो । तं एतं प्रकृतमस्मित(सानमहङ्क!रम् अणु सृक्ष्मम् आत्मानमनुविच प्राप्य अक्मीयवैतावस्सं जानीत इति । याद्ररामा- ठम्बनस्वरूपं तावन्मात्रं सज्ञानीते । अहङ्करस्वरूपेणेव तदावुरूप्यादवच्छिधते, स्फटिकमणिखिपधानल्येण । एवं दयी विका श्रवृत्तिविंषयवती चासिता- मात्रा च । तत्र गन्धसंविदादिरास्मितामात्रान्ता सवा विरोकैव | उ्येतिष्मती पुनगन्धसंविदादिप्रवृत्तिपञ्चतयादन्यत्न । विषयवन्ती लह्ितामा्नात् प्रगित्रेलेवं विषयक्रिमागः । यया विशोकया ग्योतिषल्या योगिनधित्तं स्थितिपदं ` रमते ॥ ३६ ॥
वीतरागविषयं वा चित्तं वीतो रागो यस्मात् प्रययात् स वीतरागः रागदयुल्य इव्यर्थः । स एष विषय आहम्बने यस्य चित्तस्य तद्वीतरागाविषयम् ।
वीतरागश्च प्रलयः प्रतिद्धो छक । रागिणोऽपि हि पुरुषस्य रागकारणेऽपि विषये, यः द्वीषु मात्रादिषु । स एव प्र्ययः [तमेव प्रयये] वीतरागः [गं] आटठम्बनतवे-
1. प्ञ्चषिखाचार्येण ।
९६ पातञ्ञछयोगसूत्रभाष्यनिवरणे
भाष्यम् | वौतरागचित्तालम्बनोपरक्तं वा योगिनश्चित्तं स्थितिपदं ठभत इति ॥ ३७ ॥ [ सत्रम् | स्वप्ननि द्राज्ञानाम्बनं वा ॥ ३८ ॥ [ माष्यम् | स्वभ्रज्ञानारभ्बनं वा निद्राज्ञान।रम्बनं वा तदाकारं योगिनहिवत्तं
क
स्थातेपद् ठभत इति ॥ ३८ ॥
| सूत्रम् ]
यथाऽभिमतध्यानाहय ॥ ३९ ॥ [ भाष्यम् ] यदेवामिमतं तदेव ध्यायेत् । तत्र॒ ठन्धस्थितिकमन्यत्रापि
स्थितिपदं छमत इति ॥ ३९ ॥
[ विवरणम् | नाम्यस्येत् ; न तु तस्य यो विषयः आख्भ्वनम् | विषयाणां खल्लरात् । तत् बीतरागप्रययारम्बनोपरक्तं चित्तं तद्वदेव वीतराग प्रसन्नतरं स्थितिपदं लभते । रागदिखटीकृतं हि कृतखटीनमिव तुरङ्गमाननं प्रचरति ॥ २७ ॥
स्वनिद्राज्ञानार्नं वा । स्वभज्ञानाठम्बनं वा निद्राज्ञानारम्बनं वा चित्तं तदाकारमेव भवति । पएवंस्वमवं हि चित्तं यदालम्बते तदाकारं भवति । स्वप्रे च उान्दादिविषयदुन्यं ज्ञानम् । ज्ञानस्यापि स्वमाबोऽवभासकता । तत्रापि ज्ञानस्वूपमेवारम्बते । न तु सय॑माणविषयस्वरूपम् । सर्यमागेनापि विषयेण खलटीकारो ददयते । निद्राज्ञानं तु विरोषग्रहणात्मकममावप्रव्ययारग्बनं दान्तमनन्तमनुभूयमानाचठनधमंकम् | ततश्च तदाहम्बनं सचित्त स्थितिपदं ठमत इति युक्तम् ॥ २८ ॥ |
यथामिमतध्यानाद्रा । यदेवाभिमतमिति चित्तस्थव्योक्षया । चित्तस्थिते; प्रकृतत्वात् । न तु पुखाधयेक्षया । प्रतिषिद्धवाच-- “नन सेव विषयान् प्राप्य धारयेत कथंचन इति । तत्र रन्धस्थितिकरं करण्यं सत् अन्यत्र शा्ञयेषु अपि स्थितिपदं रभते ॥ ३९ ॥
समाधिपादः प्रथमः ९७
[ सूत्रम् | परमाणुपरममह्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥ [ भाष्यम् | सुमे निविश्षमानध्य परमाण्वन्तं स्थितिपदं कमत सति । स्थरे निविशमानस्य परममहचान्तं स्थितिपदं चितस्य । एवे तामुभयीं
रिमनुषावतो योऽस्याप्रतीघातः स परो वशीकारः । तदशीकारात् परिभू पोगिनधित्तं न पुनरभ्यासकृतं परिकमोपक्षत इति ॥ ४० ॥
[न्क
अथ रष्धस्थितिकस्य चेतः किंस्वरूपा किंविषया वा समापत्तिः इति--तदुच्यते-- [ सूत्रम् |
८
्षीणब्रतेरभिजातस्येव मणेग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तस्स्थ- तद्ज्ञनता समापत्तिः ॥ ४१ ॥
[ विवरणम् ]]
परमाणुपरममहखान्तोऽस्य वशीकारः । अन्तशब्दः प्रघयकं संबध्यते । सुषम निविशमानस्य परिमणे निविशमानस्य योगिना संक्षिप्य माणस्य । अभ्यासक्रारे खल्पमल्पतरं च क्रमेणालेचयत्परमाण्वन्तं संक्षिप्यते | स च परमाणुशचित्तस्य सक्ेपकोटिः । तेन तदन्ते स्थितिपदम् ॥
इस्यपुभयकोटिमनुषावतशित्तस्य रेकतेषं॒॑विस्तारं चानुमवते यः तद्विरोधिना प्र्यान्तरेण भप्रतिघातः स परो वक्षीकारः । पूर्वेऽपि परे ए । तथाऽप्यस्यायं विशेषः । तद्रशी कारात् परिणेम् अनत्रखण्डितं ग्धस्ितिकं न पुनरम्यासकृतं परिकिमंपेक्षत इति । पं त कियदपि परिकमंन्तरमपेकषन्ते ॥
तत्र संक्षिप्ता विशाखा विकरणी चेति त्रयी धारणा । तत्रोभयकोटि- ` स्परिनी विकरणी । परममहत्वान्तस्पृणिशचाछा । परमाण्वन्तस्रक् संक्षिप्ता | सा च त्रस्यपीह सूत्रोपात्ता ॥ ४०॥
अथ रन्धस्थितिकरस्य चेतसः अथ उक्तानामन्यतमेनोपयेन ठन््रस्यितिकस्य रिस्छष्पा विषया वा समाप्तिरिति तननिदिदशयिषयेद सूत्रं॑प्रषवृते- क्रीणवृत्तरभिजातस्येव मणेग्रहीतृग्रदणग्राह्येषु तसस्य
तद्न्लनता समापत्तिः ॥ 13
९८ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्याकिवरण
भाष्यम् |
्षोणव्ृत्तरिति प्रसस्तमितप्रययस्येयथैः । अभिजातस्येव मणेरिति दृष्टन्तोगादानम् । यथा स्फटिक उपाश्रयभेदात् तततदरूपोपरक्त उपाश्रयरूपाकारेण निभाते, तथा प्राह्याहम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राह्मपतमापन्न ग्राह्स्वरूपाकरेण निमीपते ।
मूतसृष्ष्मोपरक्तं सूतसृक्ष्मसमापन्नं मूतसृक्ष्मसरूपाभासं भवति । तथा स्थूलारम्बनोपरक्तं स्थूररूपसमापन्नं स्थूटरूपामासं मवति; तथा विश्वमेदोपरक्तं विश्वमेदसमापन्ने विशरूपामापं मवति ॥
[| विवरणम् ]
नलु च समापततेविषयं वक्ष्यति तृतयपदे “परार्थात् स्वा्थसेयमात् पुरुषज्ञानम् इव्यादिना । समापत्तिस्वरूपं च संयमस्वरूपं॒तत्काय॑निवै्तनेनैव सेत्स्यति । ततश्चानर्थकमिदं सूत्रम-नैष दोषः-पूर्क्तोपायवरीकारणार्थवस्व- प्रदरोनायैत्वात् । एवं ह्येष ॒चित्तवर्।कारोऽथवान् , येन म्रहीत्रादर्थसमापनं चित्तं तदाभास भवतीति ॥
किश्च-"वितर्कायनुणमात् संप्रज्ञातः इ्युक्तम् वितकीदिस्वरूपं चे दरयि- त्यम् । अनुक्तायां समापत्तौ वितकौदि स्वरूपे न शक्यं दशयित समापत्तिघमी (दि)वितकौदय इति । क्षीणवृक्तरिति प्रयस्तमितबाहयभ्रमणादिप्र्ययस्येलधः ॥
नमु सवै एव प्रत्ययाः प्रत्यस्तभिताः । सवरप्रस्यस्तमये हि अवतिताधिकारं न स्थूलसुक्ष्मादिकमारम्बते ॥
अभिजातस्येव मणेरिति द्शन्तोपादानम् । यथा स्फटिक उपाश्रय- मेदाततत्तदरूपोपरक्त उपाश्रयाकारेण निभौसते । तथा प्रह्चाठम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राद्यसमापन्नं परा्यघ्वरूपाकारेण निभौसते ॥
तथा भूतसूक्ष्मोपरक्तं तन्मात्रोपरक्तं भूतसूक्ष्मसमापन्नं मूतसुक्षषस्- स्पावभाप्तम् अवभाप्तते ॥
(तथा स्थूखारम्बन।परक्तं स्थूलरूपपतमापन्नं स्थूलदूपामासं भवति । तथा विश्वमेदोपर्तं विश्वमेदसमापन्नं विश्वरूपाभासं भवति ॥
तथा प्रहणेष्वपीन्द्रियेष्वपि द्रव्यम् । प्रहणारम्बनोपरकतं ग्रहणश्षमापन्नं प्ररणस्वरूपाकारेण निभासते ॥]
1, यो. सू. षा, 3. घु. 35.
समाधिपादः, प्रथमः ९९
| भाष्यम् ] तथा ग्रहगेष्वपि इन्दियेष्वपि द्रष्टव्यम् । प्रहणाटम्बनोपरक्त ग्रदणपमापन्नं प्रहणस्वहूपाकरिण निभीसते । तथा म्रदीतृुरषारम्बनो- परक्त ग्रदीतृपुरूषतमापन्नं ्रदीतुपुरुषस्वरूपाकरारेण निभौसते ॥
तथा मुक्तपूरष।रम्बनोपरक्तं पमुक्तपुरषपमापन्न मुक्तपुरष- स्वह्पाक्रारेण निपतत इति ।
| विवरणम् | तथा ग्रहीतृपुरषपमापन्नं बुद्धिवरोधकस्वसूयमिव्ययैः । गृदीतृष्व- ट्पाक्ररेण निभीसते ॥
तथा गुक्तपुरषालम्बनोपर््तमिति । स ए बुदधेबेद्धा यदा विषय- वृत्तीनां न बोद्धा भवति तदा सच्वपुरूषान्यताए्यातिपात्रवस्या ॥
यदा उदप्ीनो सुक्तपुरुष शव्युच्यते तदा हि सर्वङ्केशादिमुक्तं चित्तं, सेव हि पुरुषस्य पुक्तता, या छे शादिविमुक्तिश्चित्तस्य । अत एव सूत्र
#+
्रहीतृप्रहणमेव कृतम् । ग्रहीता पुस्षवरिरोष ९व पुक्तपुरुष इहामिप्रेत इति ॥
त[दाथा हि पुरुषग्रहणमेव कुयात् । परस्यां वरे॥कारसंह्ञायां जातायां न पुनः संसाप्योगो मवति । तथा चेक्तम्--“स॒लेवं चित्तसस्व पम्बन्धे देशादिसम्बन्धामावात् स तु सदैव मुक्तः सदेवेशवर्ः' इति ॥
तस्मात् सुक्तपुरुषालम्बनोपरक्त सुक्तपुरुषकषमापृन्नं युक्तस्वरूपाकरिण निमीपत इति । यो दि मन्यते निदृत्तसससम्बन्भेनैव युक्तेन पुरुषेण समापन्नं तदाकारमेव नि्मांसत इति-- तदयुक्तम्-- चित्तस्य स्वामप्रखय- प्रसङ्गात् ॥
निरतिशयसूक्षपश्च पुरूपरप्तततमसूष्मे प्रधानं तत्कार्यकाधकायं (निमित्त) स्तं, तच्चित्तं प्रधानं पुरुषं वा समापचमनं न स्थितेन स्वेन ख्पेण समापततुमुप्सहते । न हि धटे मृदवस्थामपरियक्तस्वरूपः समापवते ॥
नतु च कार्येणापि योगिसच्छेन महदहङ्करौ सत्रयावुष्येते । महति तावद्िप्रतिपत्तिः, संपरेयते न वेति । यदा हि सवेता प्रहीतृमुक्तस्वरूपवत् सबन्धविरेष उपपथते महदहङ्क।रये।रपि । व्यक्तौ हि तौ ततः संबन्धविशेषो
१०० पातञ्जलयोगसूत्रभाष्याक्रेवरणे
युज्यते | सबन्धविरोषाच्च थथा सपुरुषो ्र्ीतृस्वरूपश्च मुक्तश्च चित्तवृत्तिविरोष- सेबन्धात् गृह्यते तद्त् । न तु स्वात्मनैव महदहङ्कारयोरयि ग्रहणं महत्वरात् ॥
तयोरपि [तिबपि] यदि सत्रप्मना गृह्येयाताम् , चित्तसत्वमात्रातानौ जवेयाताम् , तथा च सति तद्विषयप्रहणमेव न स्यात् | प्रधानपुरुषयोस्तु तत्संबन्धस्य चव्यन्तमन्यक्तस्वरूपत्व। न खरूपग्रहणम् ॥
ननु चेश्वरस्यार्व्ञता, [यतः] प्रधानपुरुषतत्तबन्धा न भ्रवयक्षा इति । उच्यते-- प्रधानपुरुषसंबन्धेम्योऽन्यत्सर्वं प्रद्क्षमिदयत्र तावत् अ्रिप्रतिपत्तिः, निरवधिकप्रद्यक्षज्ञानाम्युपगमात् । (यत्र त्वनुमानागोचरः) [यत्त अस्माकमगो चरः तत्] स वेश्वरे ज्ञातुमहति । ज्ञेयं चेदि तत्सर्वमसौ यथावा तावा जानातीति निश्चयः । अज्ञातृकस्य ज्ञेयलानुपपत्तेः ॥
किञ्च-यदि प्रकृतिपुरूषे स्वरूपेण ज्ञेयत्वमा(ना)प्ेयातां तदा बुद्धिवद्वोग्यताप्रसङ्गः । ततश्च परार्थोऽपि स्यात् परश्वान्यः कल्प्य; स्यात् ॥ नयु पुरषाणामन्योन्यमोग्यतेति न परो भोक्ता कंल्यः-नैतदेवम्--
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समत्वात् पुरुषाणां विषयविषयितवानुपपत्तेः । न हि प्रदीपावन्येन्यप्ुपुरुतः ।
- किश्च--भोग्यत्वे पुखादिरूपत।प्रसङ्गश्च पुरुषस्य | तथा च सति प्रधानस्य निर्दैतुकलतप्रसङ्ग शेखेवमादयो भूयांसो दोषाः ॥
ननु च ° 'पशथात् स्वाय्तयमात् पुरुषन्ञानम् ' इति पुरुषभ्रयक्षत। वक्ष्यति-- सव्यं॑युक्तपुक्तम. । अत एवोच्यते पुरूषो न सरूपेण विषयी- मवतीति । येनेवं तत्रोक्तम् “न च पुरषप्रययेन बुद्धिसत्वारमना पुरषो हर्यते । पुस्ष एव ते प्रत्ययं स्वारम्बनं पयतीति । तथा दयक्तम्- विज्ञातारमरे" केन विजानीयात् ' इतीति ॥
ननु पुरष्रछम्ननोपरक्तं चित्तं पुर्ष्रस्य विषियः । तथा च सति प्र्यक्ष एव॒ पुरुषः । यथा धटाङम्ननोपरक्ते प्रत्यये पुरूषेणोपटम्यमने घट, प्रयक्ष उव्यते- नैष दोषः--घटवःपुरुषध्य चित्तेनाग्याप्यत्वात् । धटदिस्तु बाह्यशित्तेन व्याप्यते, न पुरूषः, आनन्ात् ॥
1. पा.सू. षा. 3. चर. 35. 2. ब्रू, उ, 2, 4, 14,